हाॅं ठीक च , द्यखदौं तब मैं कुछ दिन रूसैकि । कब तक नि आली सिया, मी मनौण । वन्नु त मी , सासा मा नि छौ अब... पर फिर भी । क्या जाण... ह्वे जाउ कुयि देवता दैंणू शैद , म्यारा मैत कु । कि , बैठी क वींका घट पिंड मा , जू....। मेरी खुदै की आग जगै द्यो । अर रौ जु सिया , सुलगणी मेरी खुद मा यनु कुुई चमतकार, शैद कुुई देव दिखे द्यो । ऐ जाउ बौड़िक पुराणा दिन , हाॅ सि दिन... हैंसी खेली , बीत्या जु । लौटीक एै जाउ मयाली स्या, रौणभौण । ✍️ज्योति प्रासद रतूड़ी