सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

अगस्त, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हाॅं ठीक च , द्यखदौं तब मैं कुछ दिन रूसैकि । (गढवाली

 हाॅं ठीक च , द्यखदौं तब  मैं कुछ दिन रूसैकि । कब तक नि आली सिया, मी मनौण । वन्नु त मी , सासा मा नि छौ  अब... पर फिर भी । क्या जाण... ह्वे जाउ कुयि देवता दैंणू शैद ,  म्यारा मैत कु । कि , बैठी क वींका घट पिंड मा ,  जू....। मेरी खुदै की आग जगै द्यो । अर रौ जु सिया , सुलगणी मेरी खुद मा  यनु कुुई चमतकार, शैद कुुई  देव दिखे द्यो । ऐ जाउ बौड़िक पुराणा दिन ,  हाॅ सि दिन... हैंसी खेली , बीत्या जु ।  लौटीक एै जाउ मयाली स्या,  रौणभौण । ✍️ज्योति प्रासद रतूड़ी

ऐसे भीगे पलों में काश , कोई अपना होता ।

ऐसे भीगे पलों में काश ,  कोई अपना होता । वो होती बाहों में मेरे , या मैं...! उसकी , बाहों में होता । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी