आज मैं तुम्हें अपनी आंखों में , बंद कर सो जाऊंगा । जो कभी , हकीकत में मुकम्बल ना हो सके । तू आयेगी क्या मेरे पास , मेरा सुहाना ख्वाब बनकर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
हूं करीब उनके मैं मगर , मिल नही सकता । मजबूरी है बहुत , मैं उन्हें कह नही सकता । खामोश हूं बेहतर है , वरना कहूं क्या उनसे । वो तड़प उठेंगे मिलने को , मैं उन्हें तड़पता भी तो , देख नही सकता । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
यादों में हम खोए खोए , गुनगुनाए जाएंगे । जिद्दी है तेरी यादें तो क्या , हम भी कम तो नहीं । तुम्हें ख्यालों में बसा कर , जिए जायेंगे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
देखा है दूर से तुम्हें , काश ...! पहले की तरह , पास आए होते ।☹️ आंखें बंद कर मैं....! तुम्हें अपने दिल में ,बंद कर लेता । करता गुफ्तगू दिल से तेरे , अपने दिल में रवानी भर लेता । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
कबूल कर लो अब , सलाम हमारा । घिर आई है शब ए नूर , इक खूब सूरत पैगाम लिए । अब हम तुम , शब ए खैर हुए हैं जाते । नई सुबह की मुबारक , शुरुवात के लिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी