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होऊंगा कब मैं रुबरु तुझसे , सुना है तू बेवफा नहीं

होऊंगा कब मैं रूबरू तुझसे , सुना है तू बेवफा नहीं । मिला है ये जो मुकाम मुझे , न जाने बसर हो कब तलक । आए न जाने तू , कब तलक ये मौत ! मुझसे अब इस जहां में , रहा जाता नहीं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी "मलंग"  

एक वहम पाला था मैने...

 एक वहम पाला था मैने कि ,  बदल गए है वो अब । हमारा ख्याल हमारे जज्बात का ,  उनको होने लगा है एहसास अब । देखा जो आज उनको किसी गैर से ,  छुप छुप के बतलाते मुस्कुराते । हमारे पास जाते , हमीं पर चिल्लाते । वो वहम आज , दिल से दूर हो गया ।। अब तो नफरत सी हो गई है ,  मोहब्बत के नाम से । दगा बाज है वो ही जो कसम खाते थे कभी ,  वफ़ा के नाम से । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी (मलंग)

यादों के समुद्र में....।

  यादों के समुद्र में डूबा हुआ , इक सीप हूं मैं । कोशिश की बहुत जलूं मैं , उल्फत में , आफताब बनकर । हो न सका जो रोशन कभी , वो दीप हूं मैं ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी