मिला मुकदर में , कुछ ऐसा कि.... ना तो हम रो सके , न हँस सके । मिला साथ , तेरा यूँ के , न तो छोड़ सके , न पा सके । मिला मुकद्दर में कुछ....... माना पाया , तुझसे ही सब कुछ , बैभव शान , धन दौलत । जानी क्या सुख , इस भौतिक में । जब डूबी , इस नशे में सब शौहरत , । मिला मुकद्दर में कुछ.... तुझसे दूर मैं , जाना चाहूँ , मगर तुम बिन , खड़ूस ! मैं , रह न पाऊँ । घायल दिल में मेरे , दर्द भरा है । देख मेरी आँखों देख इनमें मेरे दिल का , हाल छुपा है । मन अतृप्त है सघन , घन अंधकार । आशा की किरण , ओझल । आएगी कब वो जाने , कौन घड़ी , होगी साबित । जब तुम होंगे , होश ओ हवास में , मेरे मन मुताबिक । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी