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सितंबर, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

माना कि , तरसती निगाहों का ।

माना कि , तरसती निगाहों का । मुमकिन नही है , पा जाना दीदार ए यार....। जिंदगी ! ये क्या  तू भी ? रुख्सत हुई जाती हैं । ठहर तो कुछ देर , और सही ... आने की उनकी अभी , थोड़ी सी उम्मीद बाकी है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

औ दें कि अब त ज्याणी कु ज्याणी , बसंत कथगा चली गै ।(गढ़वाली)

 औ दें कि अब त ज्याणी कु ज्याणी , बसंत कथगा चली गै । मी जग्वाल म छों तखि मू , जख तू औण क बोलगी थै । औ दे कुछ छुई त लगवा यनि कि , जु रस्यांण ऐ ज्याली । भिण्डी दिनु कु खुदियूं मन , तेरा बिग़ैर.... जरा औ दें मुलमूल हैंसी जा दें कि ,   वरषु बटी कुंद मेरी मुखड़ी , दिखी त्वे हैंसी ज्याली । औ दें कुछ छुईं  त लगवा यनि कि , जु रस्यांण ऐ ज्याली । औ दें कि अब त ज्याणी कु ज्याणी , बसंत कथगा चली गै । मी जग्वाल म छों तखि मू , जख तू औण क बोलगी थै । ज्योति प्रसाद रतूड़ी......✍️

उतरा नशा , इश्क का अब ।

 उतरा नशा , इश्क का अब । के हाल  बे-हाल ,  सनम वो कर गए । शायद ! किसी की,  दुआ का  असर ही रहा ये ।  जो साँसों के. .. काबिल भी ,  तुम  रह गए । ज्योति प्रसाद रतूड़ी......✍️

तेरी इन्ही नन्ही सी , अदाओ से ही , तो है आबाद ।

 तेरी इन्ही नन्ही सी ,  अदाओ से ही , तो है आबाद । मेरी ये दिल  की , दुनिया  । वरना कसर , कहाँ छोड़ी थी । हमें मिटाने वालों ने , हमें  मिटाने की । ज्योति प्रसाद रतूड़ी.......✍️

हमने तो उनकी हर यादें ही , मिटा डाली थी ।

 हमने तो उनकी हर यादें ही , मिटा डाली थी । मगर , कम वक्त यह दिल है के ...... उनके तसब्बुर को , आज भी संजोय बैठा है । माना कि नही है अब , मलाल हमें कोई । उनसे बिछुड़ने का ..... कम वक्त यह आंखें है कि .... उनको ख्वाबों में , आज भी देखा करती है । कह तो गए थे वो हमसे के ,  मुझसे बेहतर हासिल है अब उनको । कम वक्त , ना जाने हमें ,  उन पर भरोसा  क्यों है इतना के ....... उनकी इस जुबाँ पर हमें यकीन नहीं है । ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️

देख रहा हूँ मैं....

 देख रहा हूँ मैं ,  काफी दिनों से , आपको ।  बदले बदले से हज़ूर ,  नज़र आ रहे है ।। न जाने क्या है बात , उनमें ऐसी । के तुम हमें , भूले जा रहे है ।  😭 ज्योति प्रसाद रतूड़ी....✍️

मिला मुकदर में , कुछ ऐसा कि हम ।

 मिला मुकदर में ,  कुछ ऐसा कि.... ना तो हम रो सके ,  न हँस सके । मिला साथ , तेरा यूँ के , न तो छोड़ सके ,  न पा सके । मिला मुकद्दर में कुछ....... माना पाया , तुझसे ही सब कुछ ,  बैभव शान , धन दौलत । जानी क्या सुख , इस भौतिक में । जब डूबी , इस नशे में  सब शौहरत , । मिला मुकद्दर में कुछ.... तुझसे दूर मैं , जाना चाहूँ ,  मगर तुम बिन , खड़ूस !  मैं , रह न पाऊँ । घायल दिल में मेरे , दर्द भरा है । देख मेरी आँखों देख इनमें मेरे  दिल का ,  हाल छुपा है । मन अतृप्त है सघन ,  घन अंधकार । आशा की किरण , ओझल । आएगी कब वो जाने ,  कौन घड़ी , होगी साबित ।  जब तुम होंगे ,  होश ओ हवास में ,  मेरे मन मुताबिक । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम बनकर प्रेम वर्षा , वर्षो मेरे , हृदय धरा पर

तुम बनकर प्रेम वर्षा ,  वर्षो मेरे  हृदय धरा पर । वर्षो यूँ के , कभी थम न पाए । रहे शेष न , तृष्णा मन की । अग्नि विरह की ,   कभी जल न पाए । तुम बनकर प्रेम वर्षा ,  वर्षो मेरे हृदय धरा पर । सघन काली घटा निराली , तेरे केशो ने कर डाली । रहे पड़े ये यूँ ही मुझ पर ,  सदा रहे ये शाम मतवाली । राधा तुम मेरे मन की ,  कान्हा मैं तेरा बन जाऊँ । आ डूबे ऐसे , प्रेम सागर में । तू मुझ में मैं तुझ में , समा जाऊं । तुम बनकर प्रेम वर्षा ,  वर्षो मेरे ,  हृदय धरा पर । वर्षो यूँ के , कभी थम न पाए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हमने अब जाना , तिलस्म क्या है...

हमने अब जाना , तिलस्म क्या है ,  तेरे इस हजूम का ।   हर एक के हाथ में है प्याला ,  और इंतज़ार है तेरी शराब का । ****     ******     ******* *** दावा तो यूँ है के ,  सताए हुए है ये सरकार । हमसे तो यही भले ,  पी खा कर मस्त से.....लेते ये डकार । ये आंदोलन है किसान का ,  दावा जबरदस्त है भारी ।  तेरी तू जाने ,अपनी तो , निकल पड़ी है , पटरी पर ।  मौज़ मस्ती की , गाड़ी । आजा आजा तू भी आज , पहन टोपी हरे वाला । खेती का तो , तू बन न सकेगा ,  हाँ बन किसान तू सड़कों वाला । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी #किसान आंदोलन

दिल को छूकर गुजरा वो , कुछ यूँ कभी ।

दिल को छूकर गुजरा वो ,  कुछ यूँ कभी । के अभी तलक दिल को , उनकी तलास है । गुजर गए कई लम्हें , जिंदगी के उनके बगैर । अब भी हमें उनके , लौट आने की आस है । आये न वो कभी ,  करीब रूबरू मेरे । मगर है वो करीब दिल के , जाने क्यों हमें , आज तक यह अहसास है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वक्त के तराजू पर , तुला मैं ।

 वक्त के तराजू पर , तुला मैं ।  भाग्य के बाट से झोंका गया.... कभी ऊपर उठा , तो कभी नीचे झुका । हिण्डोला सा ही , हिलता रहा मैं  अचेतन , अवस्था तलक । कब शांत हुआ. .... न जाने कब शून्य पर रुकी , चाहत कोटि की । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

तुझे क्या पता ? कि हम , रात भर न सोये ।

तुझे क्या पता ? कि हम , रात भर न सोये । मत पूछो क्यों ,  बस तुम जो , महफ़िल में थी ।  रूबरू , किसी ओर के ।☹️ दगा बाज़ भी न कहेंगे ,  हम तुम्हें । और वफ़ा भी तो नही । करके नज़र अंदाज़ हमें तुम , गैरों से मुखातिब हुए । ☹️☹️ ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी