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मुझे नींद नहीं आएगी ।

मुझे नींद नहीं आएगी अब ,  न जाने क्यों ? इक आग , बुझी बुझी सी अब । सुलगती सी , नजर आ रही है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कभी कभी दर्द भी हंस लेता है मेरा ।

 कभी कभी दर्द भी हंस लेता है मेरा , तेरी बेरूखी पर । के अंजाम ये वफ़ा का , क्या खूब हासिल हुआ हमें । इतने भी  गुस्ताख तो नही थे हम के ,सजा मुआफी के काबिल भी न हो । अफ़सोस होता है मुझे ,तेरी उन बेरूखी नजरों पर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी