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मार्च, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अपने अपने हिसाब से तीनों , पढ़ रहे है ।

 अपने अपने हिसाब से तीनों , पढ़ रहे है ।  अब किस को क्या समझ में आये , यह वक्त ही जाने । मष्तिष्क पर सिलबट्टे मेरे भी , कम नही है । ज्यादा नही तो , कम ही सही मगर । इंसानों से मुझमें भी , बुद्धि का असर  थोड़ा तो हुआ है । तनिक तुम दोनों , खोपडिया तो हटाओ ।  मैं भी तो देखूँ इसमें , ऐसा क्या छपा हुआ है । 😂😂 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी    

इक बार ही सही मगर , साथ मेरा.....!

इक बार ही सही मगर , साथ मेरा.....! कुछ दूर तक तो दीजिये । जिंदगी खुशनुमा बन जयेगी ज़रा ,  संग अपने.....! मुस्कुराने की इजाज़त तो दीजिये । आ गुनगुनाये , गीत कोई ।  राग कोई , प्यार का । संग मेरी आवाज में ,  अपनी आवाज तो दीजिये । माना कि बहुत खुश है तू , बनकर चाँद...! सितारों की महफ़िल में । इक बार ही सही मगर , जमीं पर उतर कर....! खिदमत का हमें , मौका तो दीजिये । इक बार ही सही मगर , साथ मेरा.....! कुछ दूर तक तो दीजिये । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

न मेरे गम से है कोई , मलाल उसे अब ।

 न मेरे गम से है कोई , मलाल उसे अब । न मेरी खुशी से ही है कोई , सरोकार उसे । बस यूँ ही बँधा है अब , उनसे बंधन जिंदगी का ।   जैसे सुखी बेल हो बंधी , किसी तिनके से । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कर तो लूँ मैं कलमबद्ध तुझे अपनी शायरियों में मैं मगर ।

 कर तो लूँ मैं कलमबद्ध तुझे अपनी शायरियों में मैं मगर ।  मैं नही चाहता कि तुझे , मेरे सिवा  कोई और पढ़े । हो न क्यों मुझे रश्क भला , चाँद सी बला की सुंदरता जो तूने पाई है । मुद्दतों से की इबादत जब , खुदा की मैने ।  तब तुझ सी हसीना , इस दिल में समाई है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हर चीज़ का सौदा होता है , यहां यारों !

 हर चीज़ का सौदा होता है , यहां यारों !  कौन कहता है कि यहां , मोहब्बत नही बिका करती ।  देखा है मैंने घर उजड़ते हुए , औरों की चमक देख कर । होंगे कोई किस्मत वाले , वफ़ा जिनको यहां रास आयी । वरना हुई है यहाँ  तबाह , वर्षों की वफ़ा  मुफलिसी में रह कर । गरज़ नही मुझे के कोई , इत्तफाक रखे मेरी जुबाँ से । दिल ने जो जाना , समझा महसूस किया । वही अल्फाजों में ढाला है हमने , जो दुनिया ने हमें है दिया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

तकलीफों से वास्ता , जमानों से है ऐ दोस्त !

 तकलीफों से वास्ता , जमानों से है  ऐ दोस्त ! अब तो अल्फाज भी , नही उतरते बयाँ होने को । एहसास हुआ दर्द , दिल के टूटने का आज । जब हमें नज़रंदाज़ करके वो , महफ़िल में औरों से मुखातिब हुए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

किसी को पाना मुश्किल है , खोने के बाद

 किसी को पाना मुश्किल है , खोने के बाद  ।  यह मालूम हुआ मुझे , तुझे खोने के बाद ।  दिल की आहें दिल में ही , दबी रही ।  रोये हम बहुत , मुस्कुराने के बाद । देखी है वफ़ा पल दो पल में , बदलते हुए । ठहरी है अब सिसकियाँ , रोने के बाद । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सिमट कर रह गए है अब , मेरी हसरतों के दायरे ।

सिमट कर रह गए है अब , मेरी हसरतों के दायरे । न चाह है अब  मोहब्बत की , न आरजू ही है कोई । यूँ तो मुझे मिले बहुत ,जिंदगी के इस सफर में ।  हर कोई मुझे , आजमाते गए । दिल जीतने की फिराक में , हर बार मैं ।  दिल अपना हारता ही , चला गया । अब यह सफर जिंदगी का , तन्हां ही गुजर जयेगा  । बने जब  मुकद्दर ही दुश्मन , तो कोई क्या करे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जाने वाले कभी , लौट के नही आते ।

 जाने वाले कभी , लौट के नही आते , फिर वो दिल से हो या, दुनिया से । फर्क इतना सा है के ,दुनिया से जाने वाले । अपनों के दिलों में याद बनकर , रह जाते है । और दिलों से , जाने वाले । दुनिया में होते हुए भी , मरे समान हो जाते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम आये तो मेरे , उदास मन में ।

 तुम आये तो मेरे , उदास मन में । आभा एक प्रेम की , चमक उठी । हो गए दर्श मुझे , मुख मंडल के तेरे । अंधेरा था मगर , मन की आंखों से  मैंने तुम्हें देख लिया   । मन पपीहा मोरा , नीर तुम । रहूँ दूर गगन में तुझे पाने की , आशा लिए । न जाने कब...कब समय सावन आये । न जाने कब.....कब तुम नीर बन कर ,  मेरे मन पपीहे पर बरसे । तेरी झलक ही , आसरा है मेरे जीने का । तेरा छुआ ही दवा है मेरे , दर्द ए सीने का । ले ले अपनी आगोश में मुझे , तू जो इक बार ज़रा । आएगा मज़ा फिर , शान से  जीने का ।❤️ ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जिंदगी की निश्चित , परिभाषा कोई नही ।

 जिंदगी की निश्चित , परिभाषा कोई नही । अनुभूतियों पर आधारित अलग अलग आयामों में , डालती बनती बिगड़ती है जिंदगी । दुःख से दुःखी है जिंदगी, सुख से सुखी है जिंदगी । परिस्थितियों पर , आधारित है जिंदगी । न तेरे हाथ में है ये  न मेरे हाथ में है ,  ये तो समय के हाथ की , कठपुतली है जिंदगी । मैं में बसी है तू में बसी है , हर किसी में  अलग अलग बसी है ।  किसी में शीतल है तो , किसी में तपिस है जिंदगी ।  @रतूडी

बहुत दुःखता है दिल जब कोई , अजनबी अपनों से भी ज्यादा खास हो जाता है ।

 बहुत दुःखता है दिल जब कोई  , अजनबी अपनों से भी ज्यादा खास हो जाता है ।  और अचानक छोटी सी , गलतफमी के कारण वो दूर हो जाता है । मगर दिल में रह रह कर वो , बहुत याद आता है । एक वो है सखी ! उन्हें मेरी कोई फिक्र नही । इक मैं हूँ उन्हें मनाने की कोशिश में , अभी भी लगा हूँ । मगर वो है नाराज़ सी , मानती ही नही । 😭 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मुझे आपसे यह उम्मीद , हरगिज़ न थी के हम रूठ जायेगे और आप ।

 मुझे आपसे यह उम्मीद , हरगिज़ न थी के हम रूठ जायेगे और आप ।  हमें मनाने भी , न आओगे । और मेरी छोटी सी भूल पर , तुम इस कदर नाराज हो जाओगे ।☹️ #सखी ✍️ज्योति प्रसाद रतूडी

जिये भी क्या इस तरह से के , खाक उम्र कर दी ।

 जिये भी क्या इस तरह से के , खाक उम्र कर दी । ढूंढते क्या मिलेगी अब , शोले बुझती राख में । चिरागों में कब तलक तो , रहेगी रोशनियाँ । सुबह के होते ही अक्सर , चिराग भी बुझा दिए जाते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आंखों का भ्रम था , जिसे हमने मय समझा ।

 आंखों का भ्रम था , जिसे हमने मय समझा ।  चखा जब उसे तो.....तो वो जहर निकाला। समझे जिसे हम प्यास ,  उफनाती हुए दिल के समंदर में ।  वो मोहब्बत की आड़ में ,दगा थी उनकी । मीठा जहर भरा था , उनके जहन में ।  ना तलास कर , कोई नही है यहाँ दर्द   बांटने वाला । चाल बाज़ है बहुत वो हमदर्द ,  चार दिन में ही बदल जाते है । मरहम के नाम पर , वो जख्म और दे जाते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वाह मज़ा आ गया जी 😘😘 , आपने जो पसंद किया ।

वाह मज़ा आ गया जी 😘😘 ,  दूर से ही सही मगर , आपने पसंद तो किया । दिल....दिल , बाग बाग हो गया । काश....काश , के तुम सामने होते । हम तुम्हारी और , तुम हमारी आँखों में होते । क्या होगा कभी ? मिलना हमारा तुम्हारा । क्या होगा वक्त ये ? कभी हमारा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 😘😘

इक तरफा इश्क की भी , अजीब दास्ताँ है ।

 इक तरफा इश्क की भी ,  अजीब है ये दास्ताँ  । किसी के लिए हम तो कोई ,  हमारे लिए है परेशां । वक्त की दरिया के ,  हम है मुसाफिर । इक जगह ठहर जाना ,  हमारे बस में कहाँ । आज यहां तो , कल वहाँ । छोड़ जाएंगे हम हर के ,  दिलों में अपने निशाँ ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मैं तो झाड़ हूँ तेरे उपवन में , मुझे क्यों अभिमान हुआ ।

 मैं तो झाड़ हूँ तेरे उपवन में , मुझे क्यों अभिमान हुआ ।  आज देखा , सोच , समझा , अभिमान मेरा चूर हुआ ।  देखा मैंने वृक्ष सघन ,डाली कोपल फूल फल । और चहक रहे थे  खग ,कूक रही थी मतवाली कोयल । मैं काग ना जाने सुर न ताल न छंद , बना मैं कवि सौदों , भ्रम जाल में मैं पड़ा रहा । बनी माला रस राग भाँति भाँति के , पुष्प कंठी में  पिरोए हुए है । मस्त झूमती लता बेल , और भवरों की गुंजन । ठाठ बाट नृत्य तितलियों के देख , झूम उठता मन । मैं तो झाड़ हूँ तेरे उपवन में , मुझे क्यों अभिमान हुआ । आज देखा , सोच , समझा , अभिमान मेरा चूर हुआ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी   

हम इंतज़ार करेंगे तेरा , इकरार ए मोहब्बत का ।

 हम इंतज़ार करेंगे  तेरा , इकरार ए मोहब्बत का । के जब तलक न हो जाये , तुम्हें मोहब्बत हमसे । हम तेरे गलियों से , गुजरना नही छोड़ेंगे । रहेगी आरजू उम्र भर , तुझे पाने की । तेरे नाम से दम भर , दम लेंगे आखरी सांसों तलक । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हो गयी चार दिन की ही , दोस्ती प्यार मोहब्बत और और खत्म भी ।

 😂😂😂हो गयी चार दिन की ही , दोस्ती प्यार मोहब्बत और.....और खत्म भी ।  क्यों 🤔सोचु यह मेरे साथ , पहली बार तो नही हुआ है ।  कर लो नज़रंदाज़ 👁️👁️हमें , कोई गम 😢नही । 😂😂😂😂हमें तो आदत हो सी हो गयी है अब , मोहब्बत में हार जाने की ।😏😏😏😏 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मेरे दिल में क्या है ? ये जानने की कोशिश न कर ।

 मेरे दिल में क्या है ? ये जानने की कोशिश न कर ।  देखा कितना खुश हूँ दर्द दबाए , दर्द को जगाने की कोशिश न कर ।  पाया है प्यार तुमसे चंद लम्हों में जो ,  तुम्हें उस प्यार का वास्ता ।  अपने प्यार को दबाने की कोशिश न कर ।  जीना कहाँ आसान है , बंद चार दीवारों में ।  भर उड़ान अपनी आशाओं की ,  मन को कोशकर , मन को उदास न कर । ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

आज मच्छरों की बारात में , न चाहते हुए मैं भी शामिल हो गया ।

आज मच्छरों की बारात में , न चाहते हुए मैं भी शामिल हो गया । खूब बजे बैंड बाजे डीजे , बेस बारीक था मगर । बड़े आनंदित थे वो सारे और मैं , दावत में उनके आगे रात भर परोसा गया । कभी पाऊँ कभी गाल मेरे , चूमते वो मेरे अंग प्रतिअंग । मैं खामोश सा कभी तड़पता भटकता कराहता । अपनी विवशता पर , आँसू बहता । उफ्फ कब कटेगी यह रात  , शमशान की सी शैय्या में लेटा हूँ । काश कोई , चमत्कार हो जाये । न एहसास हो मुझे उनके दंश का , और मुझे नींद आ जाये । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आये थे हम तेरे दर पर , आवाज दी तुम्हें ।

आये थे हम तेरे दर पर , आवाज दी तुम्हें ।  तुम आयीं मगर , नींद में बोझिल । अल्हड़ सी मस्त  आना तेरा । और अपनी आँखों को  हाथों से मशलना तेरा । बड़ी खूबसूरत सी , लग रही थी मानो ।  चांदनी में जैसे कोई परी , नहाई हुई सी । मेरे मन को पिघला रही थी , जैसे मोम की तरह । लौट आये हम वापस दर से तेरे , लुटे हुए सौदागरों की तरह । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आ जाओ मैं तुम्हे बाहों में भर लूँ ।

 आ जाओ मैं तुम्हे बाहों में भर लूँ । चुम लूँ अधरों को तेरे और , जीवन मे तेरे मैं रंग भर दूँ । साथ फेरे न लिए तो , क्या हुआ । बिन फेरों के बचन , सात पूरे कर दूं । लौट आये खुशी वो गुम हुई जो हमारी , अनजान खिवैये के हाथों । आ जाओ बाहों में मेरी , अधूरी पहचान पूरी कर दूं । ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आपकी ख़ुशी में ही , कही न कही मेरी खुशी भी शामिल है ।

 आपकी ख़ुशी में ही , कही न कही मेरी खुशी भी शामिल है । ये चंद घड़ी की मुलाकात है तो क्या हुआ । हर घड़ी में वर्षो की पहचान है । तुम हममें समा जाओ , हम तुम में समा जायें । रहे न गम कोई दिल में , आ प्यार की ऐसी समा जलाएं । तुम मुझमें समा जाओ , हम तुझमें समा जाएं । आ खुशियों का इक , संसार बसाएं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ज़रा संभल कर के , न एहसास होने देना अपनी खुशी बहारों को ।

ज़रा संभल कर के , न एहसास होने देना अपनी खुशी बहारों को । बड़ी जालिम है ये बहारे भी , अश्क देकर खुद मुस्कुराई करती है । मेरे गम का बोझ न सह सकोगे तुम , ऐ जान ए बफा । अश्कों के समंदर दिल मे समेटे हुए हूँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

👦क्या कह कर बुलाऊँ मैं , आपको ।

 👦क्या कह कर बुलाऊँ मैं , आपको । कह दो , अपने ही शब्दों में । जिससे पुकारा करूँ , मैं आपको ।। 👧जो जी चाहे आपका , पुकार लो जिस भी नाम से । हमें  स्वीकार है , आपके दिए हुए शब्द हमारे लिए ।। 👦 "सखी" से प्यारा न लगे , कोई शब्द तुझ पर । मेरी सखी हो तुम ! तुम मानो या ना मानो हमें , अपना मगर ।। दिल से हमने तुम्हें , अपना मान लिया ।। 👧 ना जाने क्या है तुझमे ऐसा तू जो , गैर होकर भी  अपना सा लगे । मेरे "सखा" तुम मुझे न जाने क्यों अपनों से भी प्यारा लगे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

ज़रा देखो तो इक नज़र , इधर भी करम फरमाओ ।

 ज़रा देखो तो इक नज़र , इधर भी करम फरमाओ ।(२)  जरा देखो तो इक नज़र....ज़रा देखो तो इक नज़र , इधर भी करम फरमाओ ।  के बैठे है हम सुबह से , तेरे दीदार की खातिर ।  अपने रुख से हाँ..हाँ , अपने रुख से इक बार , नक़ाब तो हटाओ । के बैठे है हम..के बैठे है हम तेरे दीदार की खातिर । तेरी महफ़िल की खातिर ...तेरी महफ़िल की खातिर हमने मयखानों में जाना भी छोड़ा । हर साँसों में बसी थी जो , जाम ए शराब वो पीना भी छोड़ा । तेरे महफ़िल के , चर्चे जो ये खास हुए । तेरे होठों के हसीं सुर्ख प्यालों में ।  हुस्न ए जाम का नशा खास हुए । पी जाऊं पी जाऊं न फिर , होश में आऊँ । इक बार ही सही , इक बार ही सही  दो घूट पिला दे । ज़रा देखो तो इक नज़र , इधर भी करम फरमाओ ।(२) अपने रुख से हाँ..हाँ , अपने रुख से इक बार , नक़ाब तो हटाओ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम से चंद घड़ियों की मुलाकात क्या हुई कि, मुझे ऐसा लगा ।

 तुम से चंद घड़ियों की मुलाकात क्या हुई  कि, मुझे ऐसा लगा । मानो वर्षों की तुमसे , कोई पहचान है ।  न जाने क्यों दिल करता है के , तुम ही तुम रहे और मैं गुफ्तगू में मसरूफ ।  और न कोई दरम्यां हमारे रहे । कुछ करीब तुम रहो , कुछ करीब हम रहे ।  दूरियाँ न बने , फिर कभी जमाने की ।  आओ तो कुछ , ऐसा समा बनाये । रहे आगोश में एहसास ए इश्क और , इक दूजे में हम खो जाएं ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

मुझसे मेरी खुशी की न पूछो रे , ऐ चमन वालों ।

 मुझसे मेरी खुशी की न पूछो रे , ऐ चमन वालों । मेरा यार मेरी जान , मुद्दतों से लौट आयी है । कैसे बताऊं उन्हें , दिन कैसे गुजरे है उनकी बिरह में । तिल तिल , जले है हम । हर शाम ए गम , हर तन्हाई में । रोको न मेरे कदमों को , थिरक रहे है ये थिरकने दो । आज मुद्दतों से मेरा , मन मयूरा झूम उठा है । गुनगुनाये जाऊं क्यों न भला मैं , गीत कोई मिलन का । के मुझे मेरी हर वो खुशी मेरी , आरजू हासिल हो हो गयी । थी जुस्तजू जिसकी तलाश उम्र भर , वो मेरी तलाश मेरी मुकम्बल हो गयी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दिल का दर्द मैं छुपा लेता हूँ , अपनी मुस्कुराहटों से ।

दिल का दर्द मैं छुपा लेता हूँ , अपनी मुस्कुराहटों से । दो घूंट पी लेता हूँ अश्क  , और जी लेता हूँ  । गुनगुना लेता हूँ गीत कोई के , थोड़ा तो सकून मिले । इसलिए कभी कभी अपने दिल से , दागा कर लेता हूँ । लो आज तो बहारों ने भी साथ दे दिया है , मेरी तन्हाइयों का । मैं यूँ  गुनगुनाया ही था के , साज़ वो खोए हुए थे जो कभी वो फिर से बजाने लगे । कुछ घड़ी ही सही कुछ पल ही , मुझे मेरे दिन वो बचपन के याद आने लगे । चल सफर में चल तू यूँ ही , ऐ अक्स मेरे । ख्वाबों ख्याल में बनकर वो मेरे उम्र भर , मेरी तन्हाइयों से लिपटी रहे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

पता नही क्यों ? वो ही भूल जाया करतें है , अक्सर ।

पता नही क्यों ?  वो ही भूल जाया करतें है , अक्सर ।  जो कहते थे कि ,  हम तुम बिन , जी नही सकते । आज कल नदारद है मेरे , दर्द ए महफ़िल से वही ।  रहता था जिन्हें सरोकार , कभी मेरे दर्द से । बदला ना जाने क्यों , मिजाज मेरे हकीम का । कई रोज से वो ,  इस तरफ से , गुजरे भी नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अब बरसात का इंतज़ार है , मेरी इन डब डबी सी आंखों को ।

अब बरसात का इंतज़ार है , मेरी इन डब डबी सी आंखों को । वो कह कर तो कुछ , यूँ ही तो गया था । के फिर बरसात में मिलेंगे ।  मेरे मन के चकोर की , चाहत कुछ यूँ न हो जाए के । तू चाँद सा हो जाए , दूर गगन में कहीं । मेरे नैनों के झरोखों से न झरे , शबनम की बूंदें कोई के तेरे विरह में । आ जाओ के कहीं सारंगा बनकर , तुझ बिन मर न जाऊं मैं । फिर फसाना बन कर , रहेगा हमारे इश्क का  ।  लोगों की जुबाँ पर   , क्या फायदा । कहीं बेवजह , रुसवा न हो जाऊं मैं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी     

काटी त खटाई , मिलाई त लोण । बचपन का दिन , बोड़ीक नि औण । (गढ़वाली )

 काटी त खटाई दीदों , मिलाई त लोण । बचपन का दिन भूलों , बोड़ीक नि औण ।  काटी त खटाई दीदियों  , मिलाई त लोण ।  बचपन का दिन भूलियों , लौटी क नि औण ।  माँ जी की खोकली , धरि त  सिरवाण । बचपन की  नींद  स्य , अब  नि औण । बचपन का दिन दीदो, लौटी क नि औण । काटी त खटाई भूलों , मिलाई त लोण । बचपन का दिन भूलियों, लौटिक नि औण । मांजी की पकाईं रस्वे , खाणे की रस्यांण । मॉं जी की  पकाईं दीदियों, अब कखन खाण । दिन बचपन का भैजियों , समळोंणिया रै जाण । भाई बैणियों की माया दीदों , याद रै जाण । काटी त खटाई  दिदों , मिलाई त लोण । बचपन का दिन भैजियो , बोड़ीक नि औण । बाबा जी की फटकार त , माँजी कु लाड । गैलियों की धौंस त , गैलाणियों की बात । दिनै की रूढ़ियों म तपणु , अर मयाली स्या रात । याद रै जाण भुलियों , ब्वे बाबू साथ । काटी त खटाई भुलों, मिलाई त लोण । बचपन का दिन भुलियों , लौटिक नि औण । दिनै थकान अर भूलों  , रात झट सै जाण । आँखियों मुन्जी क फिर , अदनिन्द म  खाण । माँ की मामता अर , बाबा कु लाड । मुंडाली फ्लोसी मांजी कु , काख मी सिवांळ । बचपन दिन सि...

समझौतों में ढली चुकी है , मेरी जिंदगी अब ।

 समझौतों में ढली चुकी है , मेरी जिंदगी अब । प्यार शायद गुजरे जमाने की , बात हो गयी है । याद है कुछ धुंधला धुंधला सा , वो फसाना मेरे इश्क का  । जिस पर जम चुकी है अब गर्त , बेबसी की । हाँ खुश हूँ अब भी , चलो इतना काफी है । अजनबियों की तरह ही सही ,  थोड़ा सी गुफ़्तगू काफी है । चलो चलते है , सांझ ढलने को है अब । तन्हाई का वक्त मेरा  , शुरू हुआ जाता है अब । आदत सी हो गयी है अब , खुद से खुद को बतियाते हुए । जिंदगी क्या है ? बहुत वक्त लगा यह सब खुद को समझाते हुए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी