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हाँ माँ सच तुम होती जो संग हमारे ।

 हाँ माँ मैने खाया आम कच्चा , मैं हूं तेरा लाडला बच्चा । एक आने के लिए फाल्से, दिए बाबा ने केवल चार । तुम भी होती संग नानी के , खाती तुम भी आम का अचार । नाना ने गाड़ी में बिठाया , मेला सारा हमें घुमाया । इक अन्नी का बजा मुझे , मुन्ना को गुब्बारा दिलवाया । नाना ने फिर टपरी में जाकर , चाय पकौड़ी और नमकीन खिलवाया । हाँ माँ ! सच तुम होती जो संग हमारे , चरखी , झूला , नाच कठपुतली का देख कर संग में बजाते ताली । शोर-शराबा कहीं हाथी भालू , नाच रही थी बंदरिया मतवाली । हाँ माँ मैंने खाया आम कच्चा ,मैं हूं तेरा लाडला बच्चा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

​​कुछ तो बात रही होगी, उम्र के इस पड़ाव में

  ​​कुछ तो बात रही होगी, उम्र के इस पड़ाव में, दुखाया होगा दिल, किसी अपनों के दिए घाव ने। या ये हुआ होगा "मलंग", कि चोट गहरी खाई होगी, "किया क्या हमारे लिए?"—बच्चों ने ऐसी खरी-खोटी सुनाई होगी। ​बिगड़ा हुआ होगा शायद, संतुलन मनोदशा का, कुछ तो बात उसने सीधे, दिल पर लगाई होगी। हुए लापता क्यों? ऐसी कौन सी आफत आई होगी, यूँ ही नहीं किसी ने, अपनी दुनिया भुलाई होगी। ​** गुमसुम से हुए हैं अब, जिंदगी के लम्हें, खामोशी में बंद हुए हैं, उसके लब अब। इक टकटकी सी लगी है नजर, किसी क्षितिज पर, न जाने किधर? ​दिल भटक रहा है, मंजिल की तलाश में, अंजान राहों का सा हो, जैसे कोई मुसाफिर। शुष्क हुई कभी थी जो, कोमल काया, बंद हुए द्वार दया के अब, न बचा धर्म, न बची माया। ​ — ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज फिर मन मेरा भर आया

 आज फिर मन मेरा भर आया ,  सदियां गुजर गई , मुझे मेरा गुजारा जमाना याद आया । आज फिर मन मेरा भर आया । बहुत खेले है खेल बचपन में ,  सोए भी खूब गोद में , मुझको मेरी माँ का , वो सहलाना याद आया । क्या क्या न ख्वाब बुने थे हमने , जवानी के जोश में । पंख लगा कर उड़े थे हम , बेपरवाह होकर । उम्मीद बांधकर चले थे , जिनके भरोसे पर । कर गया सरेआम जलील हमें , वो मेरा लखते जिगर । हुए रुसवा हम तो तब , होश में हम ये आया । काश संभलकर चले होते तो , आज ठोकर न खाते हम दर -ब - दर । आज फिर मन मेरा भर आया ,  सदियां गुजर गई , मुझे मेरा गुजारा जमाना याद आया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

न आग जली न धुंआ हुआ

  न आग जली न धुआं हुआ, जल कर खाक तमाम हुआ। होता कुछ और कोई बात नहीं, यहां तो घर अपना बर्बाद हुआ। ​ मैं गुजरे वक्त को टटोल कर देखता मगर, अब फायदा क्या "मलंग" मुश्किल से समेटा हुआ हूँ मैं अभी। ​ कर दूं आगाज मैं फिर से, अपनी खुशियों का तो डर है कि, किस की, नजर न लग जाए मुझ पर अभी। ​ आ बैठ थोड़ा सा सुस्ता ले, मंद मंद खुद में ही थोड़ा मुस्कुरा ले। क्या पता हो जाए ठहर मेरी, खुशियों का। ​ लग जाए पर मेरे अरमानों पर, और उड़ूं जाऊं मैं शहर शहर। मेरी खामोशी का शायद, मुझे मिल जाए इनाम क्या पता? इस चुप का कहीं तो कुछ हासिल मुझे मेरा खुदा होगा। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

उधार की हसरतें

 कवि हूं यारों कवि का क्या ?  अपना क्या ?  पराया क्या ? गम क्या ? खुशी क्या ? तेरा क्या ?  मेरा क्या ? चला जहां भी ,  शब्द मिले गम के , या खुशी के कोई । लिप्त हुआ आंसुओं में ,  दिखा कोई मुस्कुराता हुआ ,  झट से पोंछ कर सैलाब ए अश्क , और मुस्कुरा दिया । कवि हूं यारों कवि का क्या ? न दिल अपना न धड़कनें ही , उधार की है हर हसरतें भी । जख्म अपने है पर , दर्द के अहसास का पता नहीं । जिया जा रहा हूँ क्यों ? पता नहीं । वक्त है भी क्या ? या नहीं , इस उधार की जिंदगी का क्या ? आज है तो कल नहीं । कवि हूं यारों कवि का क्या ?  अपना क्या ?  पराया क्या ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

काश के वो जो उसके नसीब का है , मेरे नसीब का होता ।

काश के वो जो उसके नसीब का है , मेरे नसीब का होता । मैं भी उसको अपनी बाहों में भरता , और जी भर उसे चूम लेता । हो जाती रोशनई उनकी काजल की , और मेरे लबों की कलम । लिख देता तकदीर मोहब्बत की , दिल में मैं उनके । काश के वो जो उसके नसीब का है , मेरे नसीब का होता । अश्क ए दरिया हुआ है वक्त के हाथों । काश वक्त उनके नसीब का है जो , वो मेरा नसीब का होता । मैं भी उसको अपनी बाहों में भरता , और जी भर उसे चूम लेता । आए न ख्वाब भी कभी उनके , और मैं तरस रहा क्यों ? बेगाने है वो फिर , अपने से लगते है वो क्यों ? काश वो आकर हमें  यह बता देता । इसी बहाने उन्हें जी भर मैं देख लेता । काश वक्त उनके नसीब का है जो , वो मेरा नसीब का होता । काश के वो जो उसके नसीब का है , मेरे नसीब का होता । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

खुद की पलकों को भिगोकर, खुद ही को पोंछना सीख लिया

खुद की पलकों को भिगोकर, खुद ही को पोंछना सीख लिया ।  दुनिया के मेलों में हमने, अकेले चलना सीख लिया।  माना कि उम्मीदों के महल, अक्सर ढह जाया करते हैं । पर 'मलंग' वही है जिसने राख में भी, मुस्कुराना सीख लिया। - ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मैं वो अश्क हूं जो बूंद बन रुखसारों में सिमट गया ।

 मैं वो अश्क हूं जो बूंद बन रुखसारों में सिमट गया । कम वक्त मेरी कोमल पलकों को भिगो के चला गया ।। उम्मीद थी कि रहूंगा चैन से अब , लम्हे जिंदगी के चंद बचे  जो कटेंगे बेफिक्र में । अरे ख्वाब भी क्या किसी के हकीकत हुए है कभी ? आखिर नसीब ही तो था ऐ "मलंग" जो मेरे संग आया ,और मेरे संग चला जाएगा ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी