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छुपा हुआ पन्ना

  दुःख तो यही होता है: ​जब अपनों ने हमें ठुकरा दिया, तब गैरों की चाहत बने हम। चाह जिसे उम्र भर, उसने हमसे नज़रे चुरा लिया। न होती जो मुलाकात, उस अजनबी से, तो जीते कैसे हम। रहते ग़म-ए-दर्द में बेहोश और, घुट-घुट के मर जाते हम। न मिला प्यार जब अपनों का तो, गैरों में हमने खुशियाँ तलाश लिया। ​ क्या खोले राज़, क्या छुपाएँ हम? ​अपना क्या? कुछ भी तो नहीं। मेरा जीवन तो, खुली किताब है। पढ़ने वाला हो तो कोई, पढ़ ले जी भर। बस छुपा रखा है इक पन्ना वो, दिल के कोने में कहीं। पढ़ सकता नहीं उसे कोई, जो समझ सके मुझे, और मेरे जज़्बात को, सिर्फ़ पढ़ सकता है उसे वो ही। ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

कुछ ही सही मगर , हैं तो सही यादें ।

कुछ ही सही मगर , हैं तो सही यादें । हसीं उन , गुजरे पलों की । न ही सही , लौटना मुमकिन नहीं  । दिन वो हसीं मगर ,  ताजा तो है । यादें उनकी , मेरे इस ज़हन में । ताउम्र रहेगा मलाल ,  कुछ भी हासिल नहीं किया मुकाम *पंगरने का । धुंधलाती हुई नजर , अब फर्क क्या करें । लिखे नसीब में , अच्छा या बुरा । हां.....! अब तो आदत सी हो गई है , ठोकरों से दिल लगाने की । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी *उन्नति ,तरक्की

वक्त वक्त की बात है तब और अब ।

वक्त वक्त की बात है तब और अब । समय कितना बदल चुका है..! न नूर है न नज़र ही अब , न काया है न माया । यादें ही है अब, न मैं वो हूं , न मेरा वो साया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हम में भी रहा था नूर कभी

 हम में भी रहा था नूर कभी , आज फीका फीका सा है , तो क्या ? अब भी हम , अंधेरों को ज़ब्त , करने की औकात रखते है । ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी 💫✨️🌟

चाहूं तो बहुत...

चाहूं तो बहुत लिखने को मगर ,  शब्दों के इस उपवन में । मिले तो सही , कोई फूल मेरी चाहत का । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी "मलंग"