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अक्टूबर, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

काँच और दिल, दोनों नाज़ुक होता है ।

            काँच और दिल,            दोनों नाज़ुक होता है ।         फर्क सिर्फ इतना सा है कि ,              चोट लगने पर ।          काँच आवाज के साथ तो ,                         दिल ,            खामोश होकर टूटता है ।               ज्योति प्रसाद रतूड़ी. ....✍️

ऐ मेरे रूठे हुए ख्वाब , आ जा !

 ऐ मेरे रूठे हुए ख्वाब , आ जा  ! मुद्दतों से तुझे हमने , देखा नही । सोये भी हम बहुत मगर , संग तुम थे जब । वैसा आज तलक ,  फिर  कभी हम , सोये नही । ऐ मेरे रूठे हुए ख्वाब , आ जा  ! मुद्दतों से तुझे हमने , देखा नही । ज्योति प्रसाद रतूड़ी. .....✍️

कैसी कशिश है ये ...

 कैसी कशिश है ये ,  ना चाहते हुए भी दिल । ना जाने क्यों तुझ और ही ,  खींचा चला आता है । ज्योति प्रसाद रतूड़ी....✍️

गरज़ क्या किसी को खत्म हो , जो बजूद मेरा ।

गरज़ क्या किसी को खत्म हो ,  जो बजूद मेरा । फैला था सारी कायनात में मैं कभी  ,  आज सिमट कर रह गया है , मेरा ढेरा। मैं सनातन हूँ   हाँ!  मैं सनातन हूँ ! अपने ही घर में डरा सहमा सा ,  कभी कत्ल हुआ मैं ।  कभी तलवारों से मुझे , धमकाया गया । कभी प्रेम पाश में लपेट कर , मुझे छला गया । सबको छोड़ कर मुझे ही , धर्मनिपेक्षता में , उलझाया गया ।  मेरे ही, मेरे विरोधी रहे है ,  सदियों से । किया अपना अपना , अलग बसेरा । फैला था सारी कायनात में मैं कभी  ,  आज सिमट कर रह गया है , मेरा ढेरा । ज्योति प्रसाद रतूड़ी....✍️  

तेरा आना जिंदगी थी , जाना मौत मगर...

 तेरा आना जिंदगी थी , जाना मौत मगर... जी रहे है फिर भी किसी तरह  ,  न जाने , किस जुर्म की  सज़ा हो ।  दिन भी निकलता है , रात भी ढलती है ।  सुबह और शाम भी होती है मगर... मेरे शहर में अब वो , पहले सा , खुशनुमा समा कहाँ । दिल भी है धड़कनों की रावनियाँ भी , गाए जो कभी सरगम ये , तुम संग मगर.... मायूसियों के अंधेरों  में आज , ना जाने गुम है कहाँ , मेरे दिल का जहां ।  तेरा आना जिंदगी थी , जाना मौत मगर... ज्योति प्रसाद रतूड़ी........ ✍️

तुम हाल ए दर्द मेरा , जान सको तो कहूँ ।

 तुम  हाल ए  दर्द मेरा , जान सको तो कहूँ । के तुम अब हमसे मेरा , हकीम बनकर न मिला करो । कुछ देर तक राहत होती है सिर्फ  जख्म जो नासूर सा है ये ।   तू जा ऐ हकीम अब , रहने दे इलाज ए दर्द ।  मुझे मेरे इन जख्मों के , साये में रहने दो ।   ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️

सुलग रहा हूँ बनकर , अंगारों सा धुँआ धुँआ ।

सुलग रहा हूँ बनकर ,  अंगारों सा धुँआ धुँआ । देख कर वो कहीं ओर है ,  सजाये अपनी महफ़िल । काश की उनसे , कभी मिले ही न होते । शायद मेरे भी अरमाँ होते , जवाँ जवाँ ।   ख्वाइशें तार तार हो गयीं अब ,  दिल ए चम्मन अब , सब बिखर गया । ढूंढता हूँ वो , निशान ए इश्क मैं , जो मिले थे मोहब्बत में , शायद मिले अब । दिल जो मेरा ये टूटकर , टुकड़ों में बंट गया । ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️

हम तो आज भी अजनबी है , तेरे शौक ए नज़र में ।

 हम तो आज भी अजनबी है ,  तेरे शौक ए नज़र में ।  बस फर्क इतना सा  है कि ,  तुम्हे अब मेरा पता मालूम है । हम तो करीब आ कर ,  भी दूर ही रहे । सोचा फिर के , क्या फायदा ? यूँ घुट घुट कर , संग रहने का । इस लिए तेरी दुनिया से , रुख्सत हम , हमेशा के लिए , हो चले । ज्योति प्रसाद रतूड़ी.... ✍️

मेहनत और मुकद्दर जब ....

 मेहनत और मुकद्दर जब  एक साथ हो तो ही , ऐसा संजोग मिल पता है । " बुलन्दियों को छूने का" वरना अपने लिए कमी ,  कौन चाहता है । हर इंसान मेहनत करता है , कोई आसमान छू जाता है । और कोई जमीं पर ही ,  राह जाता है । ज्योति प्रसाद रतूड़ी .....✍️

जला है जी बहुत , जब सुना उनकी जुबाँ से आज ।

👨जला है जी बहुत , जब सुना  उनकी जुबाँ से आज ।  👧🤔क्या ? 👨कि तमन्नाओ में है , बसा गैर कोई ,  बेहद मिलन की आरजू लिए । 👧😂😂 ठीक है में सोने जा रही हूँ । 👨रुको तो ! कुछ और जी भर कर , कर ले बातें । फिर क्या पता ? मुझसे भी बेहतर  कोई और मिले । और हम....बिछुड़ जायें ।☹️ 👧हाँ वही तो ! हमारा अब यही काम है🙄🙄🙄🙄🙄 👨😂😂😂😂ok गुड नाईट ज्योति प्रसाद रतूड़ी......✍️

कम वक्त मानता ही नही दिल !

कम वक्त मानता ही नही दिल !  वो दर्द है फिर भी.......उसी को ही ,  गले से  लगाने को , जी चाहता है । और क्या सफाई दूँ मैं , अपने इश्क की । ये क्या कम है के , उसी ही में मुझे । अपना खुदा ,  नज़र आता है । ज्योति प्रसाद रतूड़ी......✍️

आओं करीब , तुम यूँ हमसे दूर क्यों हो ।

आओं करीब  , तुम यूँ हमसे दूर क्यों हो । मुद्दतों से बुझी नही है प्यास ,  इन आँखों की । आओ करीब तुम्हें , जी भर के देख लूँ  । आओ लग जाएं गले से ,  बहुत हुआ इंतिहान मोहब्बत का । बुझ जाए प्यास दिल की ,  अंजाम फिर जो होना हो...हो । ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️

छलक तो , रहा नही....।

 छलक तो ,  रहा नही....। तेरे चेहरे से ,  कोई गम ए शिकन । यह जाना है , पहली बार  गम शायद , मुस्कुराते भी बहुत है ? ज्योति प्रसाद रतूड़ी...✍️

लो आखिर ! मिट ही गया तेरा , रेत पर उखेरा गया वो , प्यार का घरोंदा जालिम !

लो आखिर ! मिट ही गया तेरा ,  रेत पर उखेरा गया वो , प्यार का घरोंदा जालिम ! मैं न कहता था मत बना ,  ये समंदर का किनारा है , कब तूफान आ जाये क्या खबर । ज्योति प्रसाद रतूड़ी....✍️

बहुत है दर्द , दिल में दफन , बस...

 बहुत है दर्द , दिल में दफन , बस...  देख सके जो दर्द , मेरे दिल का । वो हकीम ए नज़र कोई , दिल ए इलाज चाहिए । ज्योति प्रसाद रतूड़ी....✍️

ढोल पीटो चाहे नगाड़ा !

 ढोल पीटो चाहे नगाड़ा ! ये  तो मस्त चाल से ,  चल रहें है , मोदी मेरे भाया ! मोदी मेरे भाया , सुन शाह तुम ! कहाँ सो रहे हो ? शत्रु- सडयंत्र के ,चक्रव्यूह में तुम ! चाहूँ ओर से , घिर रहे हो । उठो जागो नींद से अब तुम,  बहुत हुई स्वप्न देश की सैर सारी । खतरे में है देश अब हकीकत में,  कर लो इसे बचाने की तुम तैयारी । ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️

गज़ब का दस्तूर है , यह मोहब्बत का ।

 गज़ब का दस्तूर है , इस मोहब्बत का । देता है जख्म जो , मरहम की उमीद भी , उसी से ही । नादानियों से सीखी है , हमने मोहब्बत । समझदार होते तो , शायद तुम्हें पा जाते । यही तो नही आया हमें , कुछ कहकर कुछ हो जाना । वरना तेरी महफ़िल के हम , मेहमान ए खास कहलाये जाते । नज़र भर देखे भी न , जी को हाये मनाये कैसे । दीदार ए हुश्न के बगैर , वापस घर जाएं तो जाएं कैसे । ज्योति प्रसाद रतूड़ी......✍️

ऐ जा कख लुकी च तू , भिंडी दिनु ह्वे (गढ़वाली)

 ऐ  जा कख लुकी च तू ,  भिंडी दिनु ह्वे , यों आँखियोंन नि , दिखी त्वे । मी छों यकुली... यकुली यों रातियों मा । द्योरा बटी भी आज ,  गैणा , ज्वान ... कुज्याणी कख चली गैन। उफ्फ या अन्ध्यारी राति .. रे तेरी खुद भी , बोड़ी ऐन । ऐ जा कख लुकी च तू ,  भिंडी दिनु ह्वे । टक लाई हेर्न छायी ,  आँसुल भोरी आँखि ,  आँसुल भोरी आँखि मेरी रे़ । औंदी ले सुपिन्या तू त.... यों आँखियों त म्यारी अब , निंद भी नि रै । भिंडी दिनु ह्वे , यों आँखियोंन नि , दिखी त्वे । ज्योति प्रसाद रतूड़ी....✍️