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कुछ यादें ही है आज बस !

कुछ यादें ही है आज बस ! गुजरे जमाने की । विरासत में हमें दर्द के सिवा ,  और क्या मिला ? बदल गए है सब साथी बचपन के ,  और कुछ छोड़ गए है । था रिश्ता जिनसे एहसासों का कभी,  वो भी अब कहां रह गए है ? हर कोई व्यस्त है ,  किसी को किसी के दर्द का , अब एहसास कहां ? एक हम है ,जमाने भर का दर्द लिए , अश्क जल  ओंस सी , बटोर लेता हूं । और इन्हीं को दिल की हांडी में , यादों की आग पर , तपा लेता हूं। लगी प्यास  सकून की तो बुझे कैसे ? हर तरफ दिखते है लुटेरे चैन के । सोचता हूं के अब , रुकसत हो जाऊं मैं , खुदा तेरी दुनिया से । मगर एक मन ये भी कहे कि हम , उन्हें छोड़ कर ऐ खुदा !  तेरी दुनिया से , जाएं तो जाएं कैसे ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यनु भी क्या शरील पर बिति ग्याई कि (गढ़वाली)

यनु भी क्या शरील पर , बिति ग्याई कि , जिणों को मोह भंग ह्वे ग्याई । अभी त उमर बाळापन मान ,  थोडा ही उबे होई । क्या दिखि क्या लाई गाडी , अभी बाबा , जु ई ज्वानि सि , मन भोरै ग्याई । अभी लठ्याला उ लो छन , ताणी भोना । जु अपणा दिन अब , ग्रेस मा छ जिणा । अभी त तुमारी , दुनियादरी भी शुरू नि होई । अर तुम अभी बटि हार ,किले छ मनणा । हिकमत जोडी रखा दौं ,  मिललू बाटु जरूर , एक दिन दिक्यान  बस यू वक्त बुरू जु छ , ये तैं जाण दियां दौं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

शक तबाह कर देता है ।

शक तबाह कर देता है , कई  जिंदगियाँ । इसके बीज ना बौना कभी ,  गर खुद पनपे यह ,दरम्याँ तुम्हारे तो । खर पतवार की तरह , उखाड़ कर  फैंक देना । वर्ना शक बर्बाद कर देता है , जीवन  रुपी खेत में , प्रेम रुपी फसल को । भरोषे की खाद और विश्वास का जल , प्रेम की फसल को जिन्दा रखती है । आत्मसमर्पण  प्रेम में बहुत जरुरी है । अन्यथा बिन बागवाँ का बाग ,   उजड़ा उजड़ा सा , खाली खाली सा । अजमाना नही कभी भी , प्रेम में एक दुसरे को । आजमाते आजमाते ,  दुरियां ही बढ जाती है । फिर पास आये भी तो क्या , दिलों में खठास लिये । गर हो अहसास अपनी गलतियों का तो ,  क्षमा मांग लो । यकीनन मिठास प्यार की सदा , बनी रहेगी । ✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी