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अगस्त, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

और कुछ भी तो नही है अब , पास मेरे । सिवा दर्द के .....

और कुछ भी तो नही है अब , पास मेरे  । सिवा दर्द  के ..... कहीं भूल ना जाऊं मैं तुम्हें ,  इसलिए थोड़ा थोड़ा,  मैं जख्म अपना ,  हर रोज़ , कुरेद लिया करता  हूँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

पाई थी कभी खुशी , तेरे दर से ।

 पाई थी कभी खुशी , तेरे दर से । आज सितम है , तेरा मुझ पर । हुई क्या चूक , मेरी वफाओं में । तुझे तेरे सितम की , कसम.....  मुझे मेरे  गुनाहों की , वो तस्वीर बता दे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

छोड़ दिया है उसने मुझे.....

छोड़ दिया है ,  उसने मुझे । किसी की , खातिर । अफसोस नही मगर... सोचती हूँ कि , ऐसा क्या था उसमें , जो मुझमें नही । बस यही इक सवाल था , मेरी जिंदगी का । जिसका आज तलक.... जवाब न हुआ , हासिल मुझे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ऐसे भी न तड़पा हमें कि , हम कहीं

ऐसे भी न तड़पा हमें कि ,  हम कहीं   हद से न गुजर जाएं । रोओगी फिर तुम तन्हां ,  हमें अपने करीब न पाकर । यूँ ही नही हर्फ लिखे हमने ,  मोहब्बत के । तेरे तीर ए नज़र से ,  घायल हुआ , परिंदा ये   दिल का । लगाए न लगे मरहम ,  मेरे इस,  जख्म ए दिल पर । यूँ तो मिले कई हकीम , मगर । तुमसा हाकिम ,  मेरे इस दिल का , और कहाँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दिल कुछ लिखने को , अब मेरा करता क्यों नही ?

दिल कुछ लिखने को , अब मेरा  करता क्यों नहीं ?☹️  न जाने  अब , मेरे तसब्बुर में । कोई चेहरा , आता क्यों नहीं ? अब महसूस नही होता , दर्द ओ गम । ना कोई एहसास , खुशी का ।  क्षितिज में ही ,देखता रहता हूँ । इक टक... न जाने इस रात की , सुबह कब हो । क्या है आखिर , वो राज़ ए फिक्र ? मेरे जेहन में वो राज़ आता क्यों नही । दिल कुछ लिखने को , अब मेरा  करता क्यों नहीं ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अपना बचपन और माँ , याद आ गयी ।

अपना बचपन और माँ ,  याद आ गयी । जैसी भी थी माँ , माँ थी । मारती भी थी तो , पुचकारती , दुलारती भी थी । माँ तो माँ थी , जैसी भी थी । ममता से भरी ,प्यार में खरी थी । दुख-सुख में जो , मेरा ख्याल रखती । मेरे बिन जो , न खाती न सोती । मुझे दिखे बिन जो , चैन से न रह पाती । वो माँ ही थी , हाँ वो माँ ही थी । बचपन तो बचपन था ,  जवानी में भी , माँ का बहुत सहारा था । थका हारा...   दुनियादारी के ,झंझटों से जब मैं आता । माँ की गोद में सर अपना रख कर । माँ सहलाती सर मेरा....  और मैं , आराम से सो जाता । माँ तो माँ थी ,  जैसी भी थी  , माँ तो माँ थी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

बातों ही बातों में हम इतना भी क्यो खुल गए ...

बातों ही बातों में हम ,  इतना भी क्यों खुल गए । के हम उनसे , इज़हार ए मोहब्बत कर गए । थी हक्कीकत जो मेरी ,  बिन सोचे हम उनसे ,  क्यों बयाँ कर गए । हुए कई रोज उनसे ,  मुलाकात हुए "मलंग" काश के वो ,  हमको बता पाते कि , वो हमसे खफा ,  क्यों हो गए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

गीदड़ भभकी से डरना, किसी और की ...

 गीदड़ भभकी से डरना,  किसी और की ,  फितरत में , शामिल होगा ।  हम शेर है.....  नाखूनों से चीर कर । दुश्मनों का.... . लहुँ , पी जाया करते है । बंदेमातरम ! जय भारत ! ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कभी कभी आ जाता हूँ , रंग ए महफ़िल में ।

 कभी कभी आ जाता हूँ ,  रंग ए महफ़िल में ।  कुछ गम अपना , भुलाने को ।  क्या पता था आ जाएंगे ,   आपसा कोई  । ज़ख़्म , मेरा दुखाने को ।☹️ ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

क्या लिखूं के , तेरे बिन अब । कुछ भी , अच्छा नही लगता ।

क्या लिखूं के , तेरे बिन अब । कुछ भी , अच्छा नही लगता । दुनिया है दुनियादारी भी मगर ,  तेरे बिन अब ....... इस दुनिया में कुछ भी ,अच्छा नही लगता । गिनता हूँ मैं भी अब ,  दिन उंगलियों पर । ना जाने कब तक लिखा हो  नसीब , इस धरा पर । बुला ले मुझे भी संग अपने ,  बिन तेरे अब । इस धरा पर ,कुछ भी  अच्छा नही लगता । ना पास आने का वक्त है , किसी को । न दूर से कोई , पूछता है हाल मेरा । किससे कहे , अपना हाल ए दिल । है कौन अब , सुने जो । आ जाओ मुझे भी संग अपने , ले जाओ के  तेरे बिन अब । इस दुनियां  में कुछ भी , अच्छा नही लगता । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी   

हार चुका हूं , खुद से खुद मैं ।

हार चुका हूं , खुद से  खुद मैं । जीतू  संसार को ,  क्यों भला ?  आखिर इस संसार में , रखा ही क्या है ? हर तरफ है दुश्मन ,  इंसान के इंसान यहाँ । एक चेहरे पे कई चेहरे , लिए घूमते फिर रहे है । बनकर हमदर्द..... पहचान मुश्किल है अब । कौन दोस्त है और , दुश्मन कौन  यहाँ है  ? टूटते देखे है वफ़ा के रिश्ते ,  हल्की सी हवा के चलते । अब वो प्यार की , शीतल सी फुआर कहाँ है ? हर तरफ है दुश्मन ,  इंसान के इंसान यहां । हार चुका हूं , खुद से ही खुद मैं । जीतू संसार को  ,  क्यों भला ?  आखिर इस संसार में , रखा ही क्या ?

अब तो खूब जमेगी , मयखानों में ।

अब तो  खूब जमेगी , मयखानों में । मेरी और , मय के  प्यालों की । उनकी मेहरबानियों का ,  असर ही हुआ, कुछ ऐसा , कि हम , तन्हां हो चले । साखी न रूठ जाना तुम भी ,  वरना मुश्किल होगी । कम वक्त किसी और के ,  हाथों से अब ।  जाम ए शराब ,  हरगिज़ चढ़ती नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

तुम जो न चिराग जलाते , मेरे दिल का ।

 तुम जो न चिराग जलाते ,  मेरे दिल का ।  तो न ये दिल का जहाँ मेरा ,  रोशन  होता । रहता गम के अंधेरों में मैं , और उदासियों का , सहारा  होता । आ जाओ कि अब  , तुम बिन रहा , जाता नही । हसरतें सिमट गई है ,  अब मेरी । तेरे इर्द गिर्द आ के । मखमली बाहों में तेरे , निकले दम मेरा अब । तेरा ही होकर मरूँ मैं , और कुछ आरजुओं में , मेरे अब आता नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ना छेड़ो तुम धुन , बिरहा की

ना छेड़ो तुम  धुन , बिरहा की  के मुझे मेरे गम , याद आए ।  जिन्हें भुला चुके है हम , ब-मुश्किल ।  वो दर्द ए दिल ,  हमें वो सितमगर , फिर याद आए। शाम जो हुई मेरे दिल की ,  फिर न कभी कोई , हसीं सुबह आई । बे दिल से मुस्कुराते रहे हम बदस्तूर ,  मुद्दत हुए , हमें शायद दिल से मुस्कुराए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

थी तम्मनाओं में जो बसर , वो था इक नूर सा , चेहरा "मलंग"

 थी तम्मनाओं में जो बसर ,  वो था  इक नूर सा , चेहरा "मलंग"  मेरी दुआओं का तो देखो ,  यह कैसा रहा असर ।  चाहत भी रही हमें उनकी ,  और वो हमें..... हो भी न ,  सके हासिल । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

शुक्र है कि हम.... दिल को हाथ में लिए , फिसले नही ।

 शुक्र है कि हम....  दिल को हाथ में लिए , फिसले नही । संभल गए...! वरना कहीं फिसल जाता तो , मुश्किल होती । चलो अच्छा ही हुआ..... रंग तेरी वफ़ा का , बहुत जल्दी ही धूल गया । वरना कहीं हम.... तेरी उस चमक में खो जाते , तो मुश्किल होती । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आ ऐसी शमा बनाएं

 आ ऐसी शमा बनाएँ , छलके नीर नैनों से । गर कभी जो हम , आपस में बिछुड़ जाएँ । तेरे दम से , मेरा दम हो । मेरे दम से हो , तेरा दम । आ प्रेम की उस , गहराई तक हम जाएँ । रहे बे खबर हम ऐसे  , के बेखुदी में हम जाएँ । आ तुम हम में ,  हम तुम में समा जाएँ । छलके नीर नैनों से । गर कभी जो हम , आपस में बिछुड़ जाएँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

किस्मत से मिलता है महबूब , जो कोई , आखरी दम तलक ।

किस्मत से मिलता है महबूब कोई ,  आखरी दम तलक । ढलते हुस्न की परवाह में जो , बेइंतेहा हो ।  वरना यहाँ तो......   भरी जवानी , जंग खाये बैठी है । उदास है राहें यहाँ , इश्क की मेरी , ऐ हुस्न , तेरी बे रूखी से । बर्बाद हुए है मेरे , हर लम्हें ।  एक तेरे , इंतेजार में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मिटा दिया है बजूद ही हमने उनका , अपने दिल से ।

 मिटा दिया है बजूद ही हमने उनका  , अपने दिल से । आज से अब , सकुन बहुत है । ******* इस हंसी ने ही तो लूटी है ,  जहाँ भर की खुशियां ।   अब खामोश रहों या कुछ कहो ,  क्या फर्क पड़ता है  । अब तुम पर मिटने वाले , हर आशिक ।    सपुर्द ए खाक , हो चले है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मलाल न हो तुम्हे कोई ..

 मलाल न हो तुम्हे कोई , लो ख्वाइशें तेरी , आज पूरी कर देते है । फायदा क्या संग यूँ ही , साथ चलने का । जब मोहब्बत ही न हो  लो आज से अपनी राह , जुदा कर देते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

लुटी लुटी सी रह गयी हैं , जिंदगी की ख्वाइशें तन्हां । तुम साथ होते तो !

 लुटी लुटी सी रह गयी हैं , जिंदगी की ख्वाइशें तन्हां ।  तुम साथ होते तो !  कुछ और बात होती  , तो कुछ और बात होती । होते जज़्ब गम और  ,लव मुस्कुराते । तन्हाइयों से होते दूर हम , जो तुम साथ होते तो ! कुछ और बात होती , तो कुछ और बात होती । कई बार हमने चाह , आ जाये तेरे कूचे । फिर तेरे गरूर का , हमें ख्याल आया । दिल लगी क्या है ये , मगरूर तू क्या जाने । गर तुम गरूर से , निकल आते तो ! कुछ और बात होती , तो कुछ और बात होती । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

गर सकुन की , जिंदगी जीना है तो ..

गर सकुन की , जिंदगी  जीना है तो ,  किसी  से दिल दे कर ,  मोहब्बत न , कीजिये जनाब । अक्सर  देखा गया है अब  के    "दिल का लगाना"  रह गया है , सिर्फ एक खेल बन कर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

मेरा तो भरोषा ही उठ चुका है अब , दोस्ती के नाम से ।

 मेरा तो भरोषा ही उठ चुका है  अब ,  दोस्ती के नाम से । अच्छा होता तुझसे कभी , मुलाकात ही न होती । कम से कम सकुन तो रहता , आज जो बेचैन ये हुए जा रहे है हम ! न ख्यालों में हम तेरे रहते  , न इन आँखों मे बेबसी के आँसू होते  । करीब दिल के न तुझे हम लाते , न खुद से हम दूर जाते । आज हो चले है हम खुद से , इतना दूर के ।  अपने दिल की धड़कनों को भी , "चल रही है या नही"  महसूस नही कर पाते । तुझसे मिले कई दिन  हुए ,  लगते वर्षो के समान ।  आ जा अब , मुलाकात को ।  कि तेरे बिना अब हमसे , रहा जाता नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी