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कई दिनों के बाद , आया हूं मैं....तेरे शहर ।

कई दिनों के बाद , आया हूं मैं.....तेरे शहर । अनजान सी नही वो गलियां ,  जहां मिले थे हम.....मगर ।  अब बदली बदली सी ,  ना जाने क्यों लगती है.....वो डगर ? ठहर तो कुछ देर और कि ,  देख लूं तुझे जी......भर । फिर ना जाने कब हो आना....मेरा  तेरे इस शहर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अंजुमन में फिरता ,चिराग कोई "इश्क"

 अंजुमन में फिरता ,चिराग कोई "इश्क"  हुस्न की , वफ़ा की तलाश लिए ।  मालूम क्या था , वो तूफानों के बवंडर को । अपने दमन में , समेटे हुए है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दिल की यही , तमन्ना है बस ।

दिल की यही , तमन्ना है बस । रहो भले रूठे हुए ही , क्यों न तुम मगर । हर रोज तेरा ही , दीदार चाहिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

बहुत दिनों से न लिखा कुछ , मेरी कलम तूने ।

बहुत दिनों से न लिखा कुछ , मेरी कलम तूने । क्यों ? क्या जज्बातों के बाज़ार में तुझे अब ,  कोई दिल तड़पता हुआ नही दिखा ? खामोश है क्यों ,कई जमाने से ? देख तो सही , मेरे दिल में झांक कर  । अब भी बाकी , दर्द ए निशान है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी