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पिडा बटोळि क ल्यायों मी ,आज माया लै की (गढ़वाली)

हे.. हे.. हे...! आ...आ...आ ह....! हुं हूं ह उं.... पिडा बटोली क ल्यायों मी आज माया  लै की ,  आयों बोडी जब मी उंका मुलूक छोडिक । ना रोकि उं म्यारू बाटु ना क्वी  सौ ना कारार, ना बोली उं ना जवा मी छोडिक । रैयूं सासा... रैयों सासाा भिण्डि दूर तलक भी,  मी थै धै लगालि वा । मुड़िक पछनै देखि त जनी , हाथ हल्कैकि , मी खुणि बुलोणी छ वा । दौडी गै मी अंग्वाठि मा , जाण का उंका । जनी पोंछी पोंछी मी वख मा , ना जाणी कख गै वा । पिडा बटोलि क ल्यांयों मी.... सच्ची बोदौं भुळो मी  तुम , माया नि लयान माया नि लयान । भरेन्दु नि घो मिलदू जु माया मु , देंदू जु कुई निर्मोहि । कै कि मयाली छ्यूं मा ऐकी, कै तै अपणु दिल न दियान । सैडी सैंडी रतियों मा..२ होड फरकि फरकी क ,  रात बिती जांदी रात बीति जांदी । न दिन कु चैन छ अब ये दिल मा , ना अब यूं आखियों मा नींद आंदी । पिडा बटोळी क ल्यायो मी....  अपणा आंसुं....आंसू मीन पेट उंद समै । खुद रोयों मी अर , जग मीन खूब हंसै । रूमनांदि माया म्यारि जिकुडी झुरआंदी, जिकुडी झुरांदि । तोडी माया जौन्न मीतै , किले आज , उंकी याद आंदी । किलै नि मिटदि होली ...

बहारों ने अब शायद , मुस्कुराना छोड़ दिया

बहारों ने अब शायद , मुस्कुराना छोड़ दिया । क्योंकि अब...! उन्होंने हमारे दिल के आंगन में , आना छोड़ दिया । नही थमा करती थीं जिनके कदम  कभी ,   चहल कदमी को  हमारे संग । आज संग हमारे चलाना , उन्होंने छोड़ दिया । यूं तो ना पेश आए वो कभी , राह ए मोहब्बत में खुलकर । मगर ,  अदाओं में उनके मोहब्बत के , पैमाने छलका करते थे । रहता था मस्त "मलंग"  देख कर उनके  हुस्न ए मयखाने को । उन्होंने आज मोहब्बत का , वो पैमाना तोड़ दिया । उनकी बज़्म में आज , हम है मगर ... उनके तकल्लुफ ने मेरी तरफ ,  आज मुखातिफ होना छोड़ दिया । बहारों ने अब शायद , मुस्कुराना छोड़ दिया । क्योंकि अब...! उन्होंने हमारे दिल के आंगन में , आना छोड़ दिया । रहेंगी सूनी , सूनी सी , यह दिल की दुनिया अब । रंग ए बहार अब , मेरी जिंदगी के ,  फीके फीके से , हुए जातें है । मेरे दिन ओ रात अब , उदासियों में घिरे जाते है । देखता है टकटकी भर ,दिल बनकर चकोर ,   उम्मीदों के आसमां पर । शायद दिख जाए वो कहीं ,  दिल का चांद.... जिसने अब मेरे शहर में आना छोड़ दिया । बहारों ने अब शायद , मुस्कुराना छो...