सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

जून, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बहुत सी बातें है , जिन्हें सह रहा हूं मैं ।

बहुत सी बातें है , जिन्हें सह रहा हूं मैं । था जिसका कभी मैं , हम बिस्तर । आज उसकी नजरों में ,अछूत बनकर रह रहा हूं मैं ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

चलो अच्छा हुआ कि हम , वक्त पर सम्भल गए ।

चलो अच्छा ही हुआ कि हम , वक्त पर सम्भल गए । कुछ देर और होती तो , हम कहीं के न रहते । इतना क्या बुरा कहा था , प्यार ही तो  मांगा था । छिटक कर  वो हाथ अपना ,और पल में गैर बन गए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी "मलंग"

ये न पुच्छो कि क्या हुआ...

  ये न पूछो कि क्या हुआ, हम बता न सकेंगे । कुछ कहें हम किसी से , और वो रुसवा हो । यह हम , सह न सकेंगे । ✍️ मलंग