वफा की क्या उम्मीद रखें , उनसे "मलंग" जो दिखते हैं कुछ , और होते कुछ हैं । वो संग ए दिल होंगे , यह काश मालूम होता । इश्क को मोड़ देते हम , अपनी तन्हाइयों में । रोक लेते हम अपने कदम , जाने से उनकी वादियों में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
हाय रे सफर क्या मस्त था वो , जब हम कभी , जवां हुआ करते थे । इन्हीं राहों में गुबार ए धूल , हम भी अपने कदमों से , जब कभी उड़या करते थे ।। लाचार हुए चलने में आज , बेबस हुए कदम । इक तिनका बहुत , सहारा जो मिले । खोजती है ये निगाहें आज , उस सहारे को । जिसको नजर अंदाज कभी , किया करते थे हम । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
हुआ नासूर वो जख्म , जिसकी वो दावा दे गया । बनकर वो हमदर्द मेरा , दर्द वो मुझे , और दे गया । वो ही तो बना सबब , मेरे डूब जाने का । वरना हम तो तैर जाने में , माहिर बहुत थे । यकीन था जिस पर हमें बहुत , संग चलने का । वो ही आज हमें , अकेला छोड़ गया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
मैं तो तब भी रहा और अब भी हूं , तेरे प्रेम का प्यासा । ना बुझी थी प्यास तब ..! और उर कंठ अब भी , शुष्क पड़े है । आओ अब तो दर्शन , दे दो कान्हा ! कितने जन्म लेने और , अब शेष पड़े है । हो जाऊं पार इस , माया के भव सागर से । जन्म मरण के इस , चक्र कुचक्र से । रख दो हाथ तुम , सर पर मेरे । मैं मोक्ष को , प्राप्त हो जाऊं । कान्हा मेरे अबकी आना , मेरे दुखों को हर ले जाना । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
तुम क्या जानो ....? दीवाने दिल का । तुम्हें पल भर भी ना देखूं , तो बेकरार हो जाता है । यही कमजोरी है , मेरे इस दिल की । जो तुमसे दूर होना इसे , रास नहीं आता है । ना जाने क्या जादू किया है , तुमने मुझ पर । हर तरफ तेरा ही जलवा मुझे , नजर आता है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी