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दिसंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

है गम से तुम , सदा दूर रहे ।

 ꧁💞Զเधॆ🌹Զเधॆ💞꧂ ❤️ *हर गम से तुम , सदा दूर रहे ।* *हर पल जीवन में तुम्हारे , उमंग और त्यौहार रहे ।*  *हर घड़ी अपनों का , सदा  साथ रहे ।* *तन मन से कभी , अपनों से न तुम दूर रहे ।* *हो न कभी फ़ीकी रंगत चेहरे की ,*  *चेहरे पर सदा तुम्हारे नूर रहे ।❤️* 🥀 *आप सभी को सपरिवार सहित ईस्वी नए वर्ष 2021 की हार्दिक शुभकामनाएं !*🌷 ༺ஜ۩۞🦚Զเधॆ❤Զเधॆ🦚۞۩ஜ༻  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ना जाने कितने राज़ और अभी ,दफन है , समय की गर्त में ।

ना जाने कितने राज़ और अभी ,दफन है ,  समय की गर्त में । कितने और अभी उजागर होने ,  अभी भी बाकी है । बहुत ही खतरनाक साज़िशें हुई है ,  सनातन के बाग को उजड़ने की । मगर अफसोस इरादे मकुबुल न हो सके , मिटाने चाह जिन्होंने , चमन ए जहां हिन्द का । हुये कई जाबांज़ सिपहसालार और , बादशाह ए हिन्द के , जिनकी बदौलत ।  सलामत है सनातन और हिन्द ,  आज भी इस जहां में । आज नये दौर में नए रूप  ,  उभर कर आये है । "कुलश्रेष्ठ और इनके सहयोगी " अलसाये और सुस्त सोये हुए ,  सनातनियों को जगाने । जिन बातों से है अपरचित उन बातों को ,  तथ्यों के साथ बताने । जागो सोये हुए जागो अभी बक्त है ,  पहचानो खुद की पहचान खुद उभारो । यह संदेश तुम्हें  देने ,  देश धर्म के यह , शुभचिंतक आये है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

शेर को सवा शेर आखिर मिल ही जाता है ।

 शेर को सवा शेर आखिर मिल ही जाता है ।  प्रकृति का नियम है । कोई किसी का तो ,  किसी का कोई , काल बन ही जाता है । अहंकार कब तलक , रहता है सलामत ? इक दिन तो अहंकारी को , खत्म कर जाता है । बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ।  जिसके हाथों से मरेगी वो ,  तो क्या वो कौन सा खैरियत से ही , राह पायेगा । वो तो किसी न किसी के , हाथों मारा जाएगा । यह काल का चक्र है , जो घूम फीर कर ।  वापस अपनी ही , जगह पर आएगा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूडी  

हुई उम्र तमाम हर , तमन्नाएं पूरी मगर ।

 👧꧁💞Զเधॆ🌹Զเधॆ💞꧂ एक बात समझ नहीं आती ⚘ 🌿जब प्यार🥀दो लफ्ज़ों की कहानी है तो... घण्टों chatting में क्या लिखते रहते है।🤔 ༺ஜ۩۞🦚Զเधॆ❤Զเधॆ🦚۞۩ஜ༻ 👨हुई उम्र तमाम हर , तमन्नाएं पूरी मगर । यही दो लफ्ज़ प्यार की कहानी के ,  न पूरे हुए जिंदगी में ।  हो जाए मुकम्बल जो तो ,  फिर वो शुरुर कहाँ । फिर तुम कहाँ , और हम कहाँ । हर नए सफर की तलाश में ,  ढूंढते रहेंगे दर बदर यहाँ से वहाँ । अच्छा है न हो पूरे ,लफ्ज़ दो प्यार की कहानी के ।  रहेगा ठहराव , एक ही मुकाम पर ।  बनती बिगड़ती रहेगी , कहानी प्यार की दो लफ़्ज़ों के दरमियाँ ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी    

शर्मआती है फिर चली जाती , पता नही ,क्यों नही ठहरती ।

👧शर्म करो कुछ , उम्र का ख्याल करो । 👨शर्मआती है फिर चली जाती , पता नही ,क्यों नही ठहरती । अब मैं क्या करूँ इस दिल का , बेशर्म हो चला है ।  ना जाने क्यों सिर्फ ? तेरी ही गलियों में , ये आवारा हो चला है । अपनी सी लगती है ,  बल्कि अब अपनी ही है , तेरी अदाएं । मेरे दिल के करीब ही तुम, अब न जाने क्यों रहती है । इश्क की न कोई उम्र होती है , न बंधन जमाने का । मोहब्बत तो दिलों में , जवाँ रहती है । 😁😁 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

थी जो तलास मुझे वो , तलास अब खत्म हुई ।

 थी जो तलास मुझे , वो तलास अब खत्म हुई । मिल गए हो तुम मुझे जो मेरा हमदर्द मेरे दोस्त , मेरा हमराज़ बनकर । तुम्हीं हो मेरे तसब्बुर में हर दम , मेरी हर नज़्म ओ ग़ज़ल तुम्हीं से है । सजती है मेरे दिल की महफ़िल , अब  तुम्हारे ही जमाल से । रहूँ कहीं मैं मगर , दिल तेरे ही करीब है । ये जादू है तेरी निगाहों का , वल्लाह ! क्या कमाल है ,क्या कमाल है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूडी

यूँ तो कई मिले राहगीर मगर , मिला ना कोई हमसफर दिल का ।

यूँ तो कई मिले राहगीर मगर  , मिला ना कोई हमसफर दिल का । हम हर मुकाम पर साथ रहे , हर किसी के । मगर कोई साथ न , रहा मेरे दिल के । रही तलास सदियों से , कोई तो चाहे इसे ।  मिले कोई हो जिसे एहसास , मेरे गम ओ खुशी का । सब सफर में बिछुड़ते गए , सब अपने अपने मुकाम पर ।  मैं ही चलता रहा ,चलता रहा अकेले ही ।  अब भी सफर जारी है , किसी हमसफर की तलास में ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

हो कोई और करीब मेरे दिल के , यह मुझे मंज़ूर नही

हो कोई और करीब मेरे दिल के , यह मुझे मंज़ूर नही । मुझे मेरे दिल से , दूर रहने की अब आदत नही । बहुत मेहनत से सजाया है मैंने , इसे नाज़ुक हालातों में सवाँरा है मैंने , इसे । कोई और हो  करीब इसके , यह मुझे मंज़ूर नही । मगर ये दिल है मेरा के , मेरी मानता ही नही । चला जाता है अब ये मुझे छोड़ कर , हुस्न की वादियों में । मैं अकेला ही रह जाता हूँ तन्हा , इसके लौट आने के इंतज़ार में । इक गुल है जो , बहुत भाता है इसे  । जिसे यह दिल मेरा , कभी भूल पता नही । मिलना कहाँ मुमकिन इसे , वो गुल । पहरे बहुत है जमाने के । समझाऊं कैसे इसे , समझता ही नही । लाख कहा है इसे , मैंने । आ लौट आ मेरे सिवा , तेरा और कोई नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूडी  

हमारा भी उद्धार हो जाए !!!😂😂

हमारा भी उद्धार हो जाए !!!😂😂 देखना कहीं गुड़ की डली कोई ,इधर उधर सरक कर , लुढ़क कर , कहीं मिल जाए । चख ले स्वाद हम भी , कैसा होता है , मिर्च लगने के बाद । चलो छोड़ो रहने दो अब तो , आदत हो गयी है मिर्चि के खाने की ।  बस पानी से थोड़ा , तीखापन कम कर लेता हूँ । अब तो रह भी नही जाता , मर्चि के बिना । यदि न दिखे तो उसे , ढूंढने लग जाता हूँ । वो भी कम नही , बड़ी मासूमियत सी , भोली सी दिखती है । रोज नही बस अब तो , कभी कभी ही तीखी लगती है। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी सांकेतिक अर्थ :-  गुड़ की डली ≠ बाहर वाली  मिर्च / मिर्ची = घर वाली  पानी = चुप रहना / शीतल रहना ।

खिली कली मन की , ये इंतज़ार लिए... आएंगे मन भँवरे मोरे ।

खिली कली मन की , ये इंतज़ार लिए... आएंगे मन भँवरे मोरे  ।  न जाने वो अब तलक ,क्यों न आये ? हाय रे... हाय मोरा जी क्यों , जलाये...वो , क्यों न आये ?  रहूँ पिया मैं , तोहरी बाट जुहाये । दिन कैसे बीता , बीती कैसी रातियाँ । दिल मोरा सजना , किसको बताये , तुम क्यों न आये ? खिली कली मन की... जबसे गए पिया तुम प्रदेश , बनके रह गए क्यों ?...तुम परदेशी , तुम परदेशी । भूले हो क्यों तुम , वादा अपना ? तोड़ा दिया क्यों , तुमने वो सपना ? जो मिलके देखे जो मिलके देखे ...हमने साथ । साथ न छोड़ेंगे कभी मोरा तुम , ये वादा तुम को क्यों ? याद न आये , याद न आये । अब तो आ जा अब तो आ जा... अब तो आ जा , दरश दिखा जा । मन अंखिया मोरी नीर बहाये , तोसे मिलान की आश लगाए ..आश लगाए । खिली कली मन की , ये इंतज़ार लिए... आएंगे मन भँवरे मोरे  ।  न जाने वो अब तलक ,क्यों न आये । ✍️ज्योति प्रसाद रतूडी

समझ सको तो बेहतर है , खामोशी भी ।

समझ सको तो बेहतर है , खामोशी भी । बिन कहे दिल के , हर जज्बात बयाँ हो जाते हैं । न डर है यह कि , कोई सुन लेगा ।  न डर है यह कि कोई , क्या कहेगा ।  आंखें ही जुबाँ और , कान बन जाते है ।  खामोशी  गहना है गम का , और खुशी का सृंगार भी ।  खामोशी ही है सिफा जिन्दगी का , और अभिशाप भी ।  वक्त वक्त की बात है , किसको क्या दे जाए । या क्या  बना जाए , ये खामोशी । यह सब , मुकद्दर की बात है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

हसीं हो जाए जिंदगी , तुम बिन मेरी ।

 हसीं हो जाए जिंदगी , तुम बिन मेरी । ये कहाँ मुनासिब ।।  मेरा तो तन और मन का , सृंगार ही तुम हो । तुम नही तो क्या वज़ूद मेरा , रहूँ मैं कैसे जहाँ में ।  मुस्कुराकर बिन तेरे ।। ढूंढते होंगें लोग जरूर , वजह कोई मुस्कुराने की ।  मेरी तो मुस्कुराहट की , हर वजह ही तुम हो । हो खफा , कभी मैं कभी तुम ।  तो रह न पाऊं में बिन , बोले पल भर । तुम भी तो कम नही , माना लेते हो हमें इशारों में ही तुम ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूडी

आपकी ये अदा भी , हमें दिल से बहुत भाता है ।

आपकी ये अदा भी , हमें दिल से  बहुत भाता है । आपकी गालियों में भी , हमें  प्यार ही प्यार ।  बस , प्यार ही नज़र आता है । ये दीवानगी है मेरी , या मेरा पागलपन । हर गुल में मुझे तेरा ही , अक्स नज़र आता है । आज नही तो कल ही , या कभी न कभी तो । तुम्हें भी होगा , एहसास मेरी मोहब्बत का । हमें आज भी है , और तब भी रहेगा । इंतज़ार , तेरे इकरार ए मोहब्बत का । ✍️ ज्योति प्रसाद रतूडी

वो यादें ही होती है जो , एक दूसरे को ।

वो यादें ही होती है जो , एक दूसरे को ।  दूर होते हुए भी , आपस में बांधे रखती है ।  गुजरे हुए  हर पल , हर लम्हा को , ताजा रखती है । इक नज़र देख तो लेना , कभी मौका मिले तो । कसम से हम दिल , खुश कर जाएंगे । या मिट जाएंगे , तुझ पर हम ।  या तुझे खुद पर , हम मिटा जाएंगे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूडी

छुपते छुपाते हम , तुम्हें देखते रहे ।

छुपते छुपाते हम , तुम्हें देखते रहे । रहे तुम मसरूफ़ , औरों के संग गुफ्तगू में । हम तेरी मुस्कुराहटों का लुफ्त , दूर से ही लेते रहे । रहे हम तुमसे दूर , कुछ कदम ही मगर । खुद को तेरे ही करीब , महसूस करते रहे । ऐसा नही के मौका न मिला हो हमें , तेरे करीब आने का । मगर हम तो पहल , आपकी ओर से मिलन का  । इंतज़ार इत्मिनान से करते रहे । आये करीब जब तुम मेरे तो हम , अदाकारी निभाते हुए । चौके के जैसे , हमने तुम्हें देखा ही नही । दिल में अजीब सी लहर उमड़ पड़ी थी , बड़ी मुश्किल से संभाला था दिल हमने । चाह थी इसे , तुम्हें गले से लगाने की । खुश हूं बहुत यार के , दूर दूर ही सही । एहसासों में तो करीब रहें हम तुम । एहसासों में करीब रहे हम तुम । ✍️ज्योति प्रसाद रतूडी  

इज़ाज़त लेने की क्या जरूरत ।

👩‍🏫*#इजाजत हो तो हम ये #वहम पाल लें,* *आप भी हमें #याद करते हैं, इसको #हकीकत मान लें।* @हे०ल० जैन  👳 इजाज़त लेने की क्या जरूरत , कौन सा तुमने कभी हमारा हाल पूछा है । बड़े शौक से पाल लो बहम यह , तुमको किसने रोका है । हम खुद ही है शिकार इस मर्ज के , हमें कौन सा तुमने कभी टोका है । बन न सके जब तुम हकीम , मेरे बीमार ए दिल के । लग जाए तुम्हें भी यह रोग तो क्या ? एहसास तुम्हें भी तो हो , के यह रोग इश्क का कैसा है । ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी   

रूठे यार तुमको मनाऊँ , कैसे हाय ।

 रूठे यार तुमको मनाऊँ , कैसे हाय ।  दिल को अपने....दिल को अपने मैं , समझाऊं कैसे हाय । मनाऊँ कैसे हाय... वो री सजनिया सुन री !!!! बतिया मोरी !!! सुन री बतिया मोरी ।  लागी है तुमसे लग्नवा , लागी तुमसे लग्नवा ।  और कहीं जाऊं कैसे ,  हाय रे मनाऊँ कैसे ।  रूठे यार तुम.... हुई है नैना जिस दिन तुमसे , चार मोरी !! हुई है नैना जिस दिन तुमसे , चार मोरी । उस दिन से तुम , घट में मोरे बसी हो सजनी , कसम से तोहरी । कसम से तोहरी । ये मन प्यासा , दे दे प्यार ज़रा सा , प्यार ज़रा सा ....बंध जाए जीवन की आशा , जीवन आशा । तुम बिन अब तो , जीना कैसे ? तुम बिन अब तो जीना कैसे ? रूठे सजनिया तुमको मनाये कैसे , मनाये कैसे ? मैं मन मारा जग से हारा , मैं मन मारा जग से हारा । तुम ही मेरे मन के साथी , तुम ही हो मेरे जीवन सहारा , जीवन सहारा । रूठे यार तुमको मनाऊँ , कैसे हाय ।  दिल को अपने....दिल को अपने मैं , समझाऊं कैसे हाय । मनाऊँ कैसे हाय रे मनाऊँ कैसे ... ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी    

क्षमा स्वभाव धर , मधुर मुस्कान लिए ।

क्षमा स्वभाव धर , मधुर मुस्कान लिए । अबिलम्ब स्नेह लिए , तत्पर हूँ सदैव । आलिंगन को , आतुर हूँ मैं । तुम ही प्रेरणा हो मेरी , मेरी कल्पना भी तुम हो । मेरी रचनाओं का , शब्दकोष भी तुम हो ! भाव विभोर हूँ  प्रिये ! , तेरी आत्मीयता से मैं । शुभाशीष तुझे मेरा , अभिनंदन करूँ तेरा मैं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

मिली न हो फुरसत उन्हें शायद , हमारे लिए ।

मिली न हो फुरसत उन्हें शायद , हमारे लिए । या हमारे आने की खबर , उन्हें हुई न हो । या आजमाना चाह रहे हों वो , हमें शायद । जो भी हो , यह वो जाने । हम तो आ गए  है , उनके बुलावे पर ।  उनके बताए हुए , मुकाम पर । ठहरूं  कितनी देर तलक ,  यह भी तो उन्होंने बतलाया नही है । सच में बहुत मुश्किल होता है , सब्र रखना ।  टूट जाये सब्र तो , बहुत मुश्किल होता है ।  किसी का , इंतज़ार करना । आएंगे भी वो या नही , क्या पता । अभी तलक , उनकी आने की राह । हमें कोई दिखती तो नही है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कहाँ बचा है वक्त , किसी के पास ।

कहाँ बचा है वक्त , किसी के पास । जो उधार दे सके , कोई वक्त अपना । जरूरत के बाजार में , बेच चुका है ।  हर कोई यहाँ  , वक्त अपना । ******×××******××××****** कोई तो होना चाहिए , इंतज़ार करने वाला । वरना सफर में कदम , आवारा हुए जाते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आने लगी है अब , होले होले से ।

आने लगी है अब , होले होले से । अँखियों के पट , ढलने लगे है । सुस्त सी अंगड़ाईयाँ लेकर ,  झरोखों से , अँखियाँ झाँक रही है । कभी नशीली सी , हो जाती है ।  कभी लड़खड़ाने लग  जाती है । देखो अब न दस्तक देना कोई ,  न खटखटाना पट , इन अँखियों के । इनकी अब स्वप्न लोक में ,  जाने की तैयारी है । शायद मिल जाऊं मैं उन्हें ,  जिनसे न रूबरू , हो सका मैं आज तलक । हुस्न शायद होगा , इंताजर में  क्या पता । मुझे अब अपने ,  दिल-ए-ख्वाइस से मिल जाने दो । आ गयी है अब मेरी अँखियों में ,  नींद बेसुध , अब मुझे ,  मधुर स्वप्नों में खो जाने  दो । *शुभ रात्रि* ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

नही फिक्र कोई , किसी को मेरी ।

नही फिक्र कोई , किसी को मेरी । सुबह से शाम ढल गयी ।। नही कोई तेरे सिवा , जिसने मुझे याद किया । अब तू ही बात के , क्यों न करे ये दिल प्यार तुझसे ? जब फिक्र में तुम , मेरी रहती हो । भले इनकार करो , तुम इस बात से मगर । यादों में तुम भी , मेरे रहती हो । हाँ चलो मान लेता हूँ के , नही है प्यार तुझे हमसे । तुम जो कहती हो ।। फिर....फिर ये बताओ के तुम , बिन मेरे , तुम क्यों उदास रहती हो । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कभी कभी मैं सोचता हूँ 🤔 क्या यह सच है , या मज़ाक है ?

 कभी कभी मैं सोचता हूँ 🤔 क्या यह सच है , या मज़ाक है ? क्या प्यार सच में , ऐसे ही किसी से  हो जाता है ? थोड़ा हँस खेल लिए , अपने सुख - दुःख को बाँट लिये  । बस इतने से ही से क्या , प्यार हो जाता है ? या कुछ और भी , औपचारिकता होती होगी ? मालूम नही । कभी कभी मैं सोचता हूँ कि , कहीं मैं अपने ही दिल से , ठगा तो नही जा रहा हूँ ? या हकीकत में ही , मुझे तुमसे प्यार तो नही हो गया है ? जो रह -रह कर ध्यान मेरा , तेरी और ही चला जाता है । आखिर क्यों , मेरी आरजुओं में शामिल हो तुम ? जबकि तुम तमन्नाओं में , किसी और की रूबरू हो । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मियां बीबी जब साथ हो तो , जिंदगी का मज़ा ही कुछ और है ।

मियां बीबी जब साथ हो तो , जिंदगी का मज़ा ही कुछ और है ।  खट्टे मीठे स्वाद  खेल मेल और... और....नौक झोंक हंसी मज़ाक में जो , आनंद है वो और , कहीं कहाँ यार !  देख लिया है हर दिल को ,  हर चाहने वालों का तमसा । चंद रोज़ का ही , जलवा ए मोहब्बत होती है । बिसर जाते है फिर वो सब , जिस पर दिल की खास उम्मीद होती है  । हाँ मैं नही भुला उनको , ना कभी भूल पाऊंगा । संभाला है जिसने मेरी , डूबती हुई जीवन कश्ती को । वो तो खुदा है मेरा , अपने उस खुदा को कैसे मैं भूल पाऊंगा । आज उसकी बदौलत जल रहा है , चिराग मेरे दिल का । टिमटिमाता ही सही , अंधरों में रोशनी हो तो रही है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

गुजरें हैं आज , बर्षों बाद । जिन रास्तों से , छुटपन में कभी गुजरे थे हम ।

गुजरें हैं आज , बर्षों बाद । जिन रास्तों से , छुटपन में कभी गुजरे थे हम । चले गए हैं आज , पीछे बचपन के दिनों में हम ।  वो झरनों , प्रपातों का , बहता निर्मल जल ।  थके हारे खेल कूद से लौटे ,  और कंठ को तर कर पी जाते थे जल । वो डाली अमवा की , जिसके छांव तले  थकान बिसराते थे हम । याद आया फिर ,  ऊँची ऊँची शाखों में अमवा की ,  चढ़ना और उन्हें हिलाना । रोमांचित से भरा , वो समय का होना ।  मन का , प्रफुलित और खिलखिला जाना । गुजरें हैं आज , बर्षों बाद । जिन रास्तों से , छुटपन में कभी गुजरे थे हम । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

एक अजीब सी कशिश है , तेरे इस गुलबदन में ।

एक अजीब सी कशिश  है , तेरे इस गुलबदन में । जो मैं खिंचा सा , चला आता हूँ । वरना कहाँ कमी है , इस गुलसितां में हुस्न वालों की । हर दिल की धड़कन , बनने का हुनर बखूबी हम जानते है । हर कली को चमन में , खिलाना भी हम जानते है । मगर अजीब सी मदहोशी है , तेरे बदन की खुशबू में । जो मैं मदहोश , हुआ जाता हूँ । वरना कहाँ कमी है ,इस शहर में मयखानों की । पी  तो लें हम शराब , हर मयखानों  से मगर ।  हमें जचती नही शराब , किसी भी मयखानों की । हमें तो भाती है शराब , सिर्फ तेरी शरबती आँखों की ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मैं अधरों को सिल कर , बैठ गया हूँ ।

 मैं अधरों को सिल कर , बैठ गया हूँ । नीर आंखों से , बहाता गया हूँ । देखता रहा मैं , तमाशा भीड़ का । देश को आग में झोंकने का , खंड खंड में बिखेरने का । मैं दूर ही खड़ा  रहा मन में , कई सवाल लिए । ढूंढता रहा हूँ  मैं जवाब , अपनी इस खामोशी का ।  बोल पाता मैं काश ,निर्भय होकर ।  काश भय कोई मेरा हर लेता । ज्ञान की पेटिका मैं अभाव है ,  कुछ कहने समझने का । शायद तभी कुछ , नही कह पाता मैं । वो जो लेकर बैठा हूँ , दिल मे मैं । काश मेरे ज्ञान पेटिका की , कोई कमी हर लेता । आखिर , आखिर कब तक ! कब तक,  रौंदा जाऊंगा मैं । सहिष्णु बनाकर कर । कब तक रहेगी छाया ,  मेरे ऊपर उस लाठी वाले की । कब तक , मर मर कर जीता रहूंगा मैं । "अहिँसा परमो धर्म: "  का अधूरा ही मंत्र , कब तक रटता रहूंगा मैं । हाँ मुझे अब , "धर्म: हिंसा तदैव च" को अपनाना होगा । लाठी वाले का दिया ज्ञान , अब भुलाना होगा । अपने बजूद के लिए , देश की अखंडता के लिए । देश के दुश्मनों से , यतोचित अब मुझे लड़ना होगा । 🚩जय सनातन ! 🚩 🇮🇳भारत माता की जय !🇮🇳 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

कुछ तो बोला करो , आते जाते हुए ।

 कुछ तो बोला करो , आते जाते हुए ।  थोड़ा तो हमें , पुकारा करो  । इतनी भी बेरुखी क्या है , अरे जालिम ! हमारे दिल से पूछो , बेकरारी तेरे इंतज़ार की । तुमसे न जाने कैसी लागी है , ये लग्न । के तुम बिन , रहा जाता नही पल भर । यूँ ही हमें नज़रअंदाज़ करके , तुम न जाया करो । 😘😘💓🌹 ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज घटाएं , घनघोर उमड़ रही है ।

आज घटाएं , घनघोर उमड़ रही है । शीत में मौसम , बन रहा है बरसात का  ।  मैं छतरी ले आया हूँ  , शायद बरखा लगने वाली है । अब डर की कोई बात नही है , जितनी मर्ज़ी बरसात हो ।  बस मौसम यूँ ही बना रहे , मस्त मस्त लाजबाब सा ।  कपड़े पहने हुए है हम , ऊनी नरम नरम । शर्दी जुकाम का भय नही है , जगी हुई है अंगीठी गर्म गर्म । चाय की प्याली तुलसी वाली , और काढ़ा आयुर्वेदिक का । संग संगनी के लगी है गप्पसप , पता भी न चला दिन रात का । आज घटाएं , घनघोर उमड़ रही है । शीत में मौसम , बन रहा है बरसात का  । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

एक छत के नीचे ये , कैसा प्यार है ।

एक छत के नीचे ये , कैसा प्यार है ।  एहसास है प्यार का  मगर , दूर दूर ही है जैसे ।   दो पंछी एक पेड़ पर रहते हुए भी , अलग अलग डाल पर रहते है और । इक दुजे को टुकर टुकर , देखते ही जाते है । अगर कोई एक पास आता है तो , दूसरा उड़ कर दूसरी डाल पर बैठ जाता है । साथ बैठना और छेड़ छाड़ करना , भी उन्हें नही सुहाते । मगर दोनों इक दूजे के बिना , रह भी नही पाते । ये कैसा प्यार है? 😀😀😀 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अदृश्य होकर कहीं तो , कुछ जल रहा है ।

अदृश्य होकर कहीं तो , कुछ जल रहा है । धुँआ नही मगर , जल कर कुछ तो राख हो रहा है । अदृश्य होकर कहीं तो , कुछ जल रहा है । जल कर , कोयला बन गए हो तुम ।     शिकन तुम्हारे चेहरे की बतला रही है । जलते रहो ,जलते रहो मेरा क्या है ? बुझ जाओ तो बताना , मिटे जलन तो कहना । हम पानी नही की , जली को बुझा देंगें । हवा का झोंका है हम , फिर सुलगा देंगें । सुलग जाये जब तो ,  हम उस पर फिर , नमक छिड़का देंगे ।  😂😂😂 @रतूड़ी

ऐसा भी होता रहे रोशन ।

ऐसा भी होता रहे रोशन ,  मेरे इश्क का दीया , ये बहुत है मेरे  लिए । उनके हुस्न के दीदार , यूँ ही होते रहे रोज़  । बहुत है ये भी मेरी , अश्की के लिए । उम्र की दुहाई दे कर वो ,  और नज़रें  , झुकाए जाते है वो । हम आगोश में लें उन्हें ,  और छिटक कर , दूर हो जाते है वो । मगर , दूर से ही सही , इज़ार ए मोहब्बत , कर तो गए है वो । ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम याद आते हो बहुत , इस अंजुमन में ।

 तुम याद आते हो बहुत , इस अंजुमन में । अब नही है वो बात ,तेरे बाद इस अंजुमन में । खामोशी है अब ,माना के भीड़ बहुत है । हर कोई मसरूफ है खुद में ही ।  नही किसी को किसी से ,  सरोकार अब इस अंजुमन में । तुम थी तो बहार थी ,  कलियों में मुस्कुराहट थी । तुम बिन सूना है अब यह जहाँ , न उमंग है अब कोई । आ जाओ लौट कर के , बहुत हो गया है तेरा रूठ जाना । मुरझा गए है फूल , तुम बिन यहाँ दिलों के ,  इस अंजुमन में । ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ नही है आज , मेरे पास के मैं तुझे ।

कुछ नही है आज , मेरे पास । के मैं तुझे , आज कुछ पेश करूँ । न जाने क्यों नही ढल रहे , मेरे जज़्बात मेरे ख्यालात , कोई नज़्म बनकर  । आज लगता है शायद , दिल की बज़्म में मेरे ।  रोशन नही हुआ है आज , कोई चिराग , किसी का मेरे तसब्बुर में । न गम न खुशी का , एहसास है आज मुझे । इस बे-दर्द जामना में , इस बे-दर्द जमाने पे आज , मुझे हंसी आ रही है ।  कौन सा मुकाम है ये , बे स्वाद सी । जो आज ये जिंदगी को , सिफर किये जा रही है । कोशिशें कर ली बहुत ,  दिल को भी खंगाल , लिया है हमने । नही मिला है आज ,  नही मिला है आज कोई हर्फ़ , मयकशी हो कर । ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी      

तुम मानों या न मानों ।

 तुम मानों या न मानों , तुम्हें हम कभी , बिसरा नही सके । रहती है तुम मेरे एहसासों में ,  मेरी दिल की ,अनबुझी प्यास बनकर । मैं दिल हूँ , तू धड़कन इसकी । धड़कन बिन  दिल , जिंदा क्या होगा । इतनी चाहत भरी निगाहों से , देखते रहे हम तुम  ऐ दोस्त !  रिश्ता इससे , बेहतर और क्या होगा । ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अंगवठी मारी त रै हमू ! (गढ़वाली)

अंगवाठी मारीक त रै ,  हमू रात भर सैयां । बतेहरी छ माया इथागा ,  और धानी फंडू फूंका । नि च बल , स्वांदूँ अब , तनी बात ..बिंगी ल्या दों । अभी , शरील खूब नि च , खूब थोड़ा जब , शरील ह्वे जालु । तब तक जागी रैयाँ । मन म्यारु भी , बोदू बल । अभी थोड़ा डर च ,  कखि नुकसान ह्वे जालु । देर होली पर , सबेर जरूर होली । सबेर की जाग म , जगी रैयाँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुझे मालूम ही है मेरी हाल ए मोहब्बत मेरी , वोअब कहाँ ।

तुझे मालूम ही है मेरी ,  हाल ए मोहब्बत की , अब वो बात कहाँ । आया हूँ इस शहर में भी , अजनबीयों की तरह । कुछ तलब सी थी , दिल की ख्वाइश , जो हम यहाँ आये । दूर-दूर एक डाल पर ही , बैठे रहे हम । अजनबियों , की तरह । हाँ एक बात जो , खास वो ये रही अब । मुकुरने की अदा सिख ली , दर्द दबा कर  अब हमने । शाक से टूटे , फूलों की तरह । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

चाहना या न चाहना ये , तो दिल तो की बात है ।

चाहना या न चाहना ये तो , दिल  की बात है । लग जाये लग्न किसी से , तो हम क्या करें । अब तंग करे या तोड़ डाले विरह , खुदा न करे । के ऐसा दिन , आये कभी । जो होगा , देखा जाएगा । क्यों सोचे ? मोहब्बत के सिवा , कुछ और अभी । तू मुझे ज्यादा उदास न कर , वरना मैं रो दूंगा । थामे न थामेंगे मेरे आखों से अश्क ,  और दिल अपना , मैं जला दूंगा । पूछेगी दुनिया मुझे सबब ,मेरी उदासी का । तो तेरा नाम , बता दूंगा । मेरे हौसले न कर बुलंद , मेरी मोहब्बत ! अपने अश्कों से , ये कायनात डूबा दूंगा । ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दिल की दिल में रही , आरज़ू दिल की ।

दिल की दिल में ही रही , आरज़ू दिल की । उन्हें करीब से , मिलने की । बेकरारी न पूछों ,  किस तरह से मिटाई मैंने , इस दिल की । तुझे गले से लगने की , जो रही इस दिल की । रहा नादान ताकता ही , रहा दिल ! नज़र बनकर । अपने महबूब की , अदाओं को बे सब्र हो कर ।  कुछ समझ में न आया , तो बेहतर ही है । भला मेरे दिल का हाल कौन समझ सका है । ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ये दिल....दिल कहाँ सुनता है , किसी की ।

ऐ दिल....दिल कहाँ सुनता है , किसी की । यह तो इश्क करता है , दर्द पाने के लिए । देखा....देखा दिल ने ही , किया मज़बूर मुझे ।  तेरे शहर आने के लिए । बहाना भी मिला खूब आने का , वरना कहाँ हम आ पाते । शायद वक्त ने ही , दिया हो मौका ।  राह ए मोहब्बत की , हिचक मिटाने के लिए । अब भय नही बस , यूँ ही संभल कर रहना है हमें । मोहब्बत का दीया अपना  , यूँ  ही जलाने के लिए  । बहुत अरमान था मेरा के , मिलूं मैं उनको  । रहे फासले जिस वजह से , दरमियाँ हमारे । लो आज दिल का वो , अरमान भी पूरा हुआ । हमारे दिल के और , करीब आने के लिए  । ये दिल....दिल कहाँ सुनता है , किसी की । अब तुम सज़ा दो , यार ! यह सराहाओ हमें । ये अब हमने तुम , पर छोड़ा है । हम हर हाल में है तैयार , तेरा हर करम पाने के लिए । रूठना न कभी हमसे बस , यह इल्तज़ा है मेरी । तेरा साथ यूँ ही बना रहे , दूर दूर ही सही । इतना ही काफी है ऐ मोहब्बत ! मेरे जीने के लिए  । खुश हूँ मैं बहुत तेरी कसम , ऐ दिल !  के कुछ बंदिशें तो हुई खत्म , हमारी मुलाकातों के लिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

मुफ्त की सहूलियत पाना भी , कहाँ आसान है जालिम !

 #मुफ्तखोर_जनता_के_विचार मुफ्त की सहूलियत पाना भी , कहाँ आसान है जालिम ! बेचना पड़ता है ज़मीर अपना , जालसाज़ी के बाज़ारों में ।  ख़ाक हो जाए चाहे चमन , लूट ले जाए वतन कोई । हमें क्या , हमें तो बस मिलता रहे ।  मुफ्त ! भाड़ में जाए देश समाज , हमें इस्से क्या ?  जो दे हमें मुफ्त सब कुछ , हमारा तो राजा वोई । नही भाती फूटी आंख भी हमको ,  वो मन की बात , है जो करता । न खाता खुद ही ,और ना हमें ही खाने देता । @रतूड़ी

क्या कहूँ शब्द अश्क बनकर बह रहें है , देखकर नज़ारा चमन ए बर्बादी का ।

क्या कहूँ शब्द अश्क बनकर बह रहें है , देखकर नज़ारा चमन ए बर्बादी का । अब तो ऊपर वाला ही जाने ये , किसकी है यह जादू गिरी ।  मिला रहे साख़ मिट्टी में जो , अपने पुरख शहीदों की । काफीर तू तब भी कहलायेगा , करले चाहे तू कितनी भी ख़िदमत  इनकी । खंज़र तेरी पीठ पर भी , यह इक दिन धोखे से चलाएगा । खुली है आँख जो तेरी , तो देख जमाने में करतूत इनकी । जिधर भी तू नज़र  दौड़ायेगा , गद्दार कातिल तू इन्हें ही पायेगा । मैं नही कहता ये सब , मैंने देखा है खबरों की सुर्खियों में । किस्से इनके , कारनामों के । जल उठे है देश के देश कई , बदल गए मज़हब उनके । रही तलवार प्यासी फिर भी इनकी , प्यास अभी भी बाकी है इनकी । अब निशाना हिन्द है इनका ,  गजवा ए हिन्द  के मंसूबे लिए । मचाने को कोहराम हिन्द में अब , साजिशें  है ये रचते हुए । राज लोभ सत्ता के लालच में , आ कर ।  कुछ ग़द्दार हम में से ही है ,मदद  इनकी करते हुए  । वरना कहाँ होती हिम्मत इनकी , हमें  आँख दिखाने की । मिटा सका है न कोई बजूद हमारा , न कोई मिटा सकेगा । अजय अमर है सनातन हमारा , भगवा सदा आसमान में ऊंचा लहराता रहेग...

सरहाया है आपने जो मुझको ,ये खुशी बहुत है मेरे लिए

सरहाया है आपने जो मुझको ,ये खुशी बहुत है मेरे लिए । खुशी है बहुत , ये जान कर मेरे मन को । के कोई तो है आप जैसा , के कोई तो है  आप जैसा ।  मेरे बीमार ए दिल की , दावा के लिए । समझ सके जो ज़ज़्बात मेरे , दर्द ए दिल और ख्यालात मेरे ।  रही जुस्तजू ये, उम्र भर मेरी , रही जुस्तजू ये , उम्र भरी मेरी । के कोई मिले मुझे हमनशीं बनकर ।  खुदा का सुक्रिया बहुत के , आप जो हम को मिले  । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

गम से गुजरे या खुशी से , रास्ते ये जिंदगी के ।

गम से गुजरे या खुशी से , रास्ते ये जिंदगी के । साथ मैं रहूंगा तेरे हर दम , परछाई की तरह । तुमसे इश्क दिल ने किया , दिल की तू ही है तमन्ना । दिल की आरजुओं में ही , रही तू हर दम । कैसे छोड़ जाऊंगा मैं , फिर साथ तेरा । खुशी मिली ये मुझे जो , तेरे आने से । वो खुशी और मैं , कहाँ पाऊँ । जचता नही कोई , इस दिल को तेरे सिवा । तुझे छोड़ कर भला मैं , और कहाँ जाऊं । हसरत है अब , यही मेरे दिल की । रहे तू ही हर दम साथ मेरे , जहाँ में जहाँ मैं जाऊं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यदि आज यह निशान ॐ का ।

यदि आज यह निशान ॐ का ,  भारत की मुद्रा में , आज अंकित किया जाए । शायद सैकुल्ज़ियम और तथाकथित लोगों का । दर्द , और रक्त चाप उच्च हो जाए । यह २ अन्ना १८१८ का प्रमाण है, भारत में अंग्रेजी हुकूमत का । जिन्होंने वैदिक को , कुछ हद बनाये रखा । भारत है सनातन का यह , संकेतों में दर्शाए रखा । स्वाधीन हुये तो , गद्दारों और सनातन विरोधियों ने । भारत में सनातन को , मिटाने की भरपूर कोशिश किया । एक खास सडयंत्र में शामिल रही , सरकार 47 से2013 की । कानून बने बहुत अप्रत्यक्ष , केवल सनातन को खत्म करने की । कई सदियों बाद अब किसी , सनातनी पुत्र ने देश को संभाला है । हाहाकार मच गया है अब , भ्रष्टाचारियों के खेमों में । हो गए इरले विरले कुछ हिन्दू गद्दार , शामिल भेड़ियों के झुंडों में । रचने लगे है अब , सब मिलकर सडयंत्र ।  चाह में है सब , अब मोदी सरकार गिराने की । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

इश्क गुनाह तो नही था ।

इश्क गुनाह तो नही था ,  गुनाह तो इसे , हुस्न ने बना दिया । ये हुस्न का किया धरा है सब ,  जिसने हर जान को , लुभाया उकसाया ।  और फिर....फिर इलज़ाम , इश्क पर लगा दिया । वारदात में इश्क अकेला , कहाँ है  कसूरवार ऐ दोस्त ! हुस्न की अदाएं भी तो , कम गुनाहगार नही । इठलाती बलखाती हुई , मचलती हुई । कभी मंद मुस्कान ,  कभी नैनों से , काम बाण चलाती हुई ।  इश्क को , मदहोश कर जाती है ।  मैं इश्क हूँ तू हुस्न है , हमसे ही है जहाँ  प्यार का , फिर क्यों ?  तू मुझे यूँ अकेले ही , बदनाम किये जाती है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मन तो मन है ।

 मन तो मन है ,  इसी से चाह मोह लोभ , और क्रोध है । मन से ही प्यार है ,  मन से ही त्याग , और  बैराग है ।  मन तो मन है ,  इसका न तो कोई आकार है ,  न ही कोई प्रतिविम्ब । मन तो शीप के खोल , में बैठा मोती है । फर्क है तो बस इतना , मोती भौतिक है , और मन अलौकिक । मन नाज़ुक है , मन अनियंत्रित अश्व है । मन कच्चा भी है , मन बच्चा भी है ।  निष्ठुर भी है , तो दयावान भी है । मन का कहाँ एक ठहराव , मन तो मन है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी   

तेरे इतने से ही करम का , शुक्र गुजार है हम बहुत ऐ जिन्दगी !

तेरे इतने से ही करम का , शुक्र गुजार है हम बहुत ऐ जिन्दगी ! तू चली तो सही ,  वरना जमाने ने , कसर न छोड़ी थी मुझे गिराने में । बढ़ती रही तू कदम दर कदम , कभी लखड़ाते हुए ।  तो कभी गिरते , और संभलते  हुए । अच्छा ही हुआ ठोकरें जो लगी , हर ठोकरों का सिला भी , ये खूब मिला । के अनजानी राहों से भी मेरी , अब पहचान हो गयी । अजनबियों से भी रिश्ता जुड़ा , इन राहों में । हर कोई रहा मुझसे परे , संग था तो सिर्फ मेरा साया । अब हर चेहरे की मुझे , पहचान हो गयी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

ये सब हो जाये :-🤔

यदि ये सब हो जाये :-🤔  सभी बलवान हो जायें या निर्बल हो जायें ! सभी बुद्धिमान हो जायें या निर्बुद्धिता हो जायें । सभी धनवान  हो जायें या निर्धन हो जायें । सभी राजा या सभी रंक हो जायें । सभी पापी या सभी धार्मिक हो जायें । धर्म कर्मों में सभी एक से हो जायें । तू ही तू रहे या मैं ही मैं रहूँ ।  सभी अपने या सभी पराये हो जायें । क्या चल सकेगा चरखा , दुनिया दारी  का ?  यदि सब बराबर हो हो जाये । ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मिले उन्हें तुम , जिनके मुकद्दर में था प्यार तेरा ।

 मिले उन्हें तुम , जिनके मुकद्दर में था प्यार तेरा ।  हम यूँ ही भटकते रहे , इन रहगुज़ारों में दीवानों की तरह ।  मिले उन्हें तुम.... न पा सके तुमको , न किसी की मंज़िल ही हम बन सके । रहा दर्द ही दिल में , न तुम हमको  मिल सके । न किसी को दर्द ही हम , अपना बतला सके । मिले उन्हें तुम.... रहा नशीब ही गैरों की , इनायत में रहूँ । किसी गैर को कभी हम ,  अपना बना न सके । गैर तो गैर है इतना , करम काफी है । अपनों की वफ़ा का सिला भी हम , कभी पा न सके । मिले उन्हें तुम..... अब तो ख्वाइश ही न रही कोई और , सिवा ऐ जान ए वफ़ा । के देखूँ इक झलक ही सही , तेरे आफताब रुख़्सरों की । नैनों में समेटे हुए , अश्क जज़्बात दिल के । खिदमत में मैं , तुझे पेश करूँ । न रहे एहसास मेरे दिल मे फिर कोई , न गम किसी बात का रहे । हो जाऊं रुख़सत फिर में इस जहां से , न मलाल फिर मुझे किसी बात का रहे । मिले उन्हें तुम...... ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

अपनों का दिया हुआ ज़ख़्म , भर तो जाए मगर ।

अपनों का दिया हुआ ज़ख़्म , भर तो जाए मगर । एहसास-ए-दर्द दिल से , कभी जाता नही । रह रह कर कश्क , उठने लगती है दिल पर । उनकी जफ़ाओं की , जब याद आती है । न खबर हमें । शाम ओ सुबह की , कब ढली कब आती है ।  कब दिन कब रात , ढलती और निकल आती है । वो अपने थे जो मेरे , मुझे मझधार में वो छोड़ चले थे । गैरों ने थमा हाथ फकत ,  डूबती कश्ती को मेरी , सहारा मिल गया । उन अपनों से , बेहतर गैर निकले । जिनसे कश्ती को मेरी , किनारा मिल गया । अब न मलाल है हमें , जिन्दगी से न शिकायत ही । दूर ही सही मगर ,  अपने दिल के , अंधेरों के लिए मुझे । उजाले का कोई , सितारा मिल गया । ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

हर कोशिशें की थी हमने , मगर ।

हर कोशिशें की थी हमने , मगर । तुम समझ सको हमें , यह तुमसे हुआ न गया । हमने लाख कोशिशें की थी ,  तुम्हें मनाने की । सीने से , लगाने की आरजू भी रही । तुम ही रही अपने , गरूर में चूर ।  होती रही तुम ही , हमसे दूर । तोड़ कर , गरूर तुमसे अपना ,  मेरे पास तुमसे , आया न गया । हमें अब भी है , इंतज़ार तेरा ।  तुम आओगे , बनकर मेरी मोहब्बत ।  मेरे दिल में तुम ही हो , मेरी मोहब्बत ।  दिल से तुम्हें हमसे , भुलाया न गया। ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हर किसी के , नशीब में कहाँ ।

हर किसी के , नशीब में कहाँ । आँख खुलते ही , किसी की याद आइए । यह प्यार है , किसी की याद आना । और यह , परिभाषित हो जाये । हर किसी के , नसीब में कहां इंतज़ार । किसी की आवज आने की ,  वीराने का , मुसाफिर है जो । यह प्यार है इंतज़ार किसी की ,  आवाज का आना । और यह परिभाषित हो जाये । हर किसी के नशीब में कहाँ ,  जिससे झगड़ा किया और ,  मनाने आने का इंतज़ार  हो । यह प्यार है किसी के , मानने का आना । और यह परिभाषित हो जाये । नहीं जी ! सब मुकद्दर का , खेल है । न निभी तो तमाशा , निभी तो । सुंदर , हसीन मेल है । आभासित हूँ , गुजर रही है खुद पर । फिर कैसे मैं मान लूँ , प्यार ! यह है । विरिक्त हूँ , दिल पत्थर होना बाकी है । देखता हूँ , कब तलक । पिघलता है , दिल मोम की तरह । बस इक दोस्त की , इनायत है मुझ पर जो । अभी तक , थोड़ा खुश हूँ । जिस दिन , वो भी छोड़ कर जाएगा । उस दिन शायद दिल मेरा , पत्थर का हो जाएगा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज रात मुझे , ये बेचैनी क्यों हुई जाती है ।

आज रात मुझे , ये बेचैनी क्यों हुई जाती है । ये दिल ओ दिमाग की , कैसी कशमकश है । ये कैसी उलझन है , जो नींद मेरी उड़ा ले जाती है । सोने की कोशिश में लगा हूँ , जब भी आंखें बंद करता हूँ । न जाने कौन सी छवि , अनजानी सी उभर आती है । आज रात मुझे , ये बेचैनी क्यों हुई जाती है । आज रात मुझे , नींद क्यों नही आती है । फिक्र हो शायद कोई , हाँ फिक्र ही होगी । पर यह कैसी फिक्र है ?  है तो मुझे , समझ में क्यों नही आती है । न जाने कौन सी छवि , अनजानी सी उभर आती है । न जाने क्यों ? आज रात मुझे , नींद क्यों नही आती है । रात्रि का अंतिम पहर हो चला है , आंखे सुर्ख हुए जाती है । दिमाग मे चलचित्र सा , न जाने क्या चल रहा है । ये धुंधला सा , ये क्यों है ?  मुझे तस्वीर कोई ,  साफ क्यों नही , नज़र आती है । आज रात मुझे , नींद क्यों नही आती है । आज रात मुझे , ये बेचैनी क्यों हुई जाती है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तन-मन निर्मल तेरा , निर्मला तू मेरे मन की ।

तन-मन निर्मल तेरा , निर्मला तू मेरे मन की । मन व्याकुल है , मिलन को । आलिंगन को , चित मेरा आतुर है । मुख मंडल चन्द्र सा तेरा , चंद्रिका तू मेरे मन की । अपने चंद्र की चंद्रिका में , स्नान करने को , चित मेरा आतुर है । साँसें मनमोहक सुगंधित है तेरी , सुगंधा तू मेरे मन की । अपने सुगंधा की सुगंध में , समा जाने को , चित मेरा आतुर है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यह है सच्ची खुशी , सच्चा आनंद और उमंग ।

यही है सच्ची खुशी ,  सच्चा आनंद और उमंग । साथ जीवन का दुःख-सुख का ,  हंसी खेल का । जीवन के हर अध्याय पर ,  दाम्पत्य युगल का । उम्र का कोई भी पड़ाव हो ,  ताल-मेल बेहतर हो तो ।  कट जाते है दिन वो ,  चाहे आये कैसी भी ,  जटिलता जीवन में या । कैसे भी हो , चाहे हालात तंग । जीवन का आनंद ,  आपस का तालमेल से ही है । वरना जिंदगी में ,  सब कुछ होते हुए भी । जिंदगी , तन्हां और सुन्न है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जुदाई क्या होती है , यह पहले न जाना था ।

जुदाई क्या होती है , यह पहले न जाना था । मोहब्बत क्या है , इसे भी पहचाना न था । गम क्या होता है , तन्हाई क्या है , तेरे बाद ये जाना है । हुई क्यों तुमसे मुलाकात जो , तूने यूँ रूठ कर जाना था । तुम्हारी यादों के , सहारे जी लेंगे । कसम है मुझे पाक मोहब्बत की , तुझे जमाने में रुसवा न होने देंगे । अगर कभी भूल से , याद आ जाये मुझे तेरी । चुपके से तस्वीर तेरी , हम देख लेंगे । गुजरे वक्त की याद मोहब्बत की में , अश्क हम बह लेंगे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 26 जून 2017

खुशी ऐसी भी क्या जो , छलक जाए शराब के प्यालों में ।

खुशी ऐसी भी क्या जो , छलक जाए शराब के प्यालों में । गम ऐसा भी क्या जो ले जाए , कदम मयखानों में । समझौता वक़्त से , करना सीख ले ऐ दोस्त ! दौर खत्म नही हुआ अभी । अभी तो और भी दौर आएंगे , जिंदगी के बाज़ारों में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी रविवार 24 जून 2007

क्यों कर न बतलाये किसी से , बहार मेरे दिल में है ।

 क्यों कर न बतलाये किसी से , बहार मेरे दिल में है । हम जिसको चाहते है , वो हमारी दिल ए नज़र में है । वह हमसे दूर है मगर , ऐसा लगा हमें । वह साथ साथ , जैसे हमारे हर सफ़र में है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

पास जब तुम होते हो , मन आंगन में खुशियों का अम्बार होता है ।

पास जब तुम होते हो ,  मन आंगन में खुशियों , का अम्बार होता है । जब तुम दूर होते हो ,  तो मन बिरह अग्नि में , जल उठता है । ये कैसी लग्न लगी है , कान्हा !  तुम बिन यह दुनिया मोहे , शमसान लगता है । राधे ! राधे ! ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ मामलों में झुकना भी जीत के समान है ।

 कुछ मामलों में झुकना भी , जीत के समान है ।  हर मामलों में झुका जाए , यह भी उचित नही है ।  जरूरी नही हर फैसला , सरकार का उचित हो । क्या अनुचित है इस पर ।  किसी और के , बहकावे न आकर ।  खुद का आत्ममंथन हो । कभी कुछ ऐसा भी होता है ,  आज अनुचित लगता है । किन्तु वो आने वाले कल के लिए , वरदान भी हो । #किसान_आंदोलन , किसानों का है मगर । हारे हुए , राजनीति पाले पर । अपनी जीत , तलास रहे है ।  देश द्रोही भी बीच में घुसकर , हुंकार भर रहे । ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

नही मिला अभी तलक , ऐसा हकीम कोई ।

नही मिला अभी तलक , ऐसा हकीम कोई । मर्ज मेरे दिल का जो , पहचान सके ।  मिले अब तलक जो भी , हर हकीम वो , कवायत ही निकले । दर्द ए दिल छुपा कर , हम हँस क्या दिए । लिया लुफ्त हर किसी ने , मेरी मुस्कुरुहट का । न मिला अभी तलक , ऐसा हमदर्द कोई । दर्द मेरे दिल का जो  , पहचान सके ।  मिले अब तलक जो भी , हर हँसने वाले वो , तमाशाई निकले । नही मिला अभी तलक , ऐसा हकीम कोई । मर्ज मेरे दिल का जो , पहचान सके । ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी कवायत= अज्ञानी , न समझ ।

साँसे रहे या न रहे मगर , हमें तेरा ही इन्तज़ार रहेगा ।

साँसे रहे या न रहे मगर , हमें तेरा ही इन्तज़ार रहेगा । यह जन्म तो क्या हर जन्म तक , जब तक न मिले तुम हमें । सनम ! हर जन्म मुझे , तेरा ही इन्तेजार रहेगा । सब्र टूटेगा कैसे भला ,  मेरा ख्वाब ओ ख्याल , जब तुम ही हो । लगन लगी है तुमसे ही पिया ,  जिया में हर दम तुम ही हो । रुख़सत होगें जब , जमाने से हम । अपनी हसरतों में , संग तुझे लिए जाएंगे । होगा  तुझे भी मलाल मेरे जाने का ,  ऐसा हम असर अपनी , वफ़ाओं का छोड़ जाएंगे । होगी तब जुस्तजू तुम्हें मेरी ,  मगर हम फिर न नज़र आएंगे । ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आरजुओं में , दुआ सामिल है यह मेरी ।

आरजुओं में , दुआ सामिल है यह मेरी । के रहे तू खुश-हाल , सदा मुस्कुराती रहे । दिल मेरे ! तुझसे है बजूद मेरे इश्क का ,  तू जान ए यार है मेरा । हो तुम दूर तो क्या हुआ ,  बहुत है दिल के धड़कते रहने का ।  दिल में यह एहसास तेरा । के तू ही है इस दिल में बसी ,  ख़ूबसूरात अनछुआ ख्वाब मेरा ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

हासिल होगा जरूर होगा तुझे , तेरे ख़्वाशिओं का शहर ।

हासिल होगा जरूर होगा तुझे ,  तेरे ख़्वाशिओं का शहर । पहले मांझी का , जख्म तो भर जाने दे । अभी तो ताज़े है जख्म , "दर्द" रह जाये तो  । न मुमकिन नही है कि , मंज़िल न मिले । मिलेगी जरूर ,सब्र रख ऐ मलंग ! पहले माझी का , जख्म तो भर जाने दे । हसरत में है तेरी जो , मंज़िल ए आरजू  निराश न हो साहिल , मिलेगा जरूर  इंतज़ार कर , दर्द मिट जाने तलक के । पहले माझी का , ज़ख़्म तो भर जाने दे । उमड़ा था जो तूफान , दरम्यां मोहब्बत के । थम सा , गया अब । ये दिल है मांझी इस , मोहब्बत की कश्ती का । बहाल हो जाएगा सफर , मोहब्बत की राहों  में । "मगर" पहले माझी का , ज़ख़्म तो भर जाने दे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जख्म कितने तेरी चाहत ने दिए है मुझको ।

 "जख्म कितने तेरी चाहत ने दिए है मुझको...." आना कभी इत्मीनान से इक बार , दिखाउंगी फिर मैं तुझको..... बे-गैरत भी न होगा , शायद जमीर तेरा ।  जो मेरा हाल ए दिल , जानकर । जो तू न रो दिया । मेरी वफाओं का सिला , क्या खूब मुझे ये जो मिला । इक तेरी बेरुखी ने , ऐ मेरे संगदिल सनम ! तेरी जफ़ाओं का गिला भी , करें तो क्या करें तुझसे ।  हर शिकायत में मेरे दिल को , हर बार दर्द ही मिला । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी