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ये इश्क के मारों का हाल देखा है

ये इश्क के मारों का हाल देखा है , यह किस कदर टूटा है । न चाह जीने की , न उम्मीद मरने की । कौन आए -जाए फुर्सत किसे , ग़म ए समंदर से निकलने की । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हम तो यूं ही , दिल लगा बैठे थे।

हम तो यूं ही , दिल लगा बैठे थे। पता चला वो तो , खाली थे । दिल अपना वो , कहीं और गवां बैठे थे । बच गए इल्ज़ाम-ए-बेवफाई से हम । वरना खामखां बदनाम हम , तेरे शहर में हो जाते । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी "मलंग"

न हैरान हो , न परेशान हो ऐ "मलंग

न हैरान हो , न परेशान हो ऐ "मलंग" दिन चार ही है , लाए हम मांग कर  । एक  गुजार दी खेल में , थी उम्र जो बाल की । दूसरी गुजरी काम में , थी जो उम्र यौवन की । तीसरी अब चल रही है ,  है जो उम्र न इधर की , न उधर की । थका हारा , बस हिसाब लगाना उम्रभर का । कंपकंपाते हाथों से ,पसीने की बूंदों को चेहरे पर से पोंछना  । लड़खड़ाते कदमों को , सहजता से रखना । कमर के झुकाव को,  कुछ देर ठहर कर , तनकर खड़ा होना।  और इंतजार अब , उस चौथे दिन का । आए कब वो , और सोए आराम से हम जी भर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

15 अगस्त सन 1947 को ,

15 अगस्त सन 1947 को , हम इस दिन आजाद हुए थे । हां ऐसा सुना था पर महसूस नहीं हुआ । होता भी कैसे ? दबे कुचले रहे सदियों से।  पहले बाहर वालों ने दबाया था , और 47 के बाद अंदर वालों ने । अब भी उनके कदमों के निशाँ, मेरे आंगन से नहीं मिटे । देखकर उन्हें..। यादों का वो भयानक मंजर , रह–रह याद आ जाते है । सभी बड़े बड़े ठाकुर , तख्ती हमारे नसीबों की जो लिख जाते है । अभी कहां उभरे हम आख़िरी जन है हम जो जंगल के । लगाकर हर कोई फेरा अपना ,चुनाव पर । बनाकर मूर्ख हमें ,और मुकद्दर अपना चमका जाते है । आज स्वतंत्रा दिवस है , हां ऐसा सुना था पर , महसूस नहीं हुआ । हां ऐसा सुना था पर , महसूस नहीं हुआ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से ।

थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से । थोड़ा आ ऐ जिंदगी ! संग मेरे , तू भी सुस्ता ले । रहा है साथ तेरा जन्म से , और रहेगा मरण तक । सफर लम्बा रहा है , अब तलक । न जाने आगे रहेगा साथ , कब तलक । आ बैठ पास उर से निकल , पढ़ तो ! प्रभु ने भाग्य लेख में मेरे , क्या क्या रचना रची है । ढल गया हूं जिस्म से , देख तो । मेरे चेहरे पर चमक , कितनी बची है? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी"मलंग"

दर्द छुपाने का हुनर जो सिख लिया है हमने । कसम से....!

  दर्द छुपाने का हुनर जो सीख लिया है हमने । कसम से....! शिकायत की अब किसी से , कोई गुंजाइश न रही । हर कोई अब , हाल ए मिजाज ब खुशी पूछ जाता है। छुपाकर शिकन चेहरे का , दुरुस्त हैं हम कह लेते है । अंदर की हम ही जानते है , हां बाहर से खुश रह लेते है। निभाते है अब फ़र्ज़ "मलंग" , जब तक जी रहें है । सांसों का आना जाना ही है अब , मन से कहां अब जी रहें है हम । कवि हूं न यूं ही ख्यालों में ही , डूबा रहता हूं । सुबह न शाम की खबर ,  क्या पता क्या खा , क्या पी रहे है हम ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

काश के तुम हम रूबरू मिले होते ।

काश के तुम हम रूबरू मिले होते ,जिंदगी के दीए फिर न यूं उदास होते । कहूं क्या मुकद्दर का के काश , दिन ओ रात हम तुम संग में गुजारे होते । बहुत आग है तड़प में , जलता है जिया मेरा । काश तू आती , मेरे तन से लिपट जाती । बुझ जाती आग ये तड़प की , मैं चूमता बदन तेरा । खिल उठती आशाएं मेरी , झूमता गाता मन मेरा । काश के तुम हम रूबरू मिले होते , जिंदगी के दीए फिर न यूं उदास होते । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी "मलंग"

रक्षाबंधन विशेषांक

भाई : वर्षों वर्ष रहे सलामत मेरी बहना । दुख न आए कभी करीब इसके , प्रभु ! तुम सदा इसके संग में रहना ।। बहन : प्रभु ! इस बहना का तुमसे बस , यही है कहना । सदा मुस्कुराता रहे भाई मेरा, तुम सदा इसके संग में रहना ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

मेेरा भय्या मेरा राज दुलारा ।

मेरा भय्या मेरा राज दुलारा , बहना की आंखों तारा । सलामत रहे तू जग में ,  किस्मत से है मैंने , तुझ सा भय्या पाया । तू है मेरा जीवन सारा , तू ही मेरी कश्ती का सहरा । तू ही मेरी खुशी सुहानी , तुझ से मेरा मायका प्यारा । मेरा भय्या मेरा राज दुलारा , बहना की आंखों तारा । रहें चिरंजीवी सदा तू , प्रभु हो सदा तेरा रखवाला । दुख दरिद्रता न आए , पास तेरे । खुशी में झूमे  तू , बन कर मतवाला ।  रक्षा बंधन की ढेरों शुभकामनाएं ! ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम रूठे हो हमसे हम नहीं..

तुम रूठे हो हमसे हम नहीं ,  न जाने क्यों ?  बात करनी तुमने छोड़ी है , हमने नहीं । फुर्सत हो तो चले आना , दिल मेरा अभी भी, तेरे इंतजार में धड़क रहा है । कोई भी नहीं हमारा ,  इस हजारों की भीड़ में । इससे अच्छा तो था,  अकेले ही करते सफर हम जिंदगी का । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तेरे प्यार में पागल ,हुआ जा रहा हूं मैं ।

 तेरे प्यार में पागल ,हुआ जा रहा हूं मैं । ना जाने क्या कशिश है तुझ में ,  तेरी और खींचा चला जा रहा हूं मैं ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी