बहुत दर्द सह है मैने हे मेरे दाता तुम्हारे जाने के बाद । मुझे अकेला छोड़कर गये क्यों , मुझे दुनिया में लाने के बाद । काश संग में अपने ले जाते , गुनाह तो नहीं था कोई ? मैं भी रह लेता संग तुम्हारे , मर जाने के बाद । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
सब कुछ कुशल है किंतु, फिर भी हृदय मेरा चिंतित और व्यथित है । नहीं बिठा पा रहा हूँ खुद को , उनके बनाए सांचे में । शायद बूढ़ा हो गया हूँ , कुछ खुरदुरा और कुछ अड़ियल भी । और.....! और अब तो उनके लिए मैं तथाकथित भी । सोचता हूँ कि कर लूं किनारा अब मैं अपनी जर्जर कश्ती को । शायद मेरी पुरानी क्षय पतवार में अब ,खेने की वो ताप नहीं । मतलबी है यह संसार , सिवा जन्म दाता के । संताप से क्षुब्ध हूँ ,हृदय पीड़ा से संकुचित है। मन में एक टिश सी चुभी है जो मेरे वो , कमवक्त निकलती ही नहीं । बस इसी कशमकश से मन बेचैन और द्वंदित है । सब कुछ कुशल है किंतु, फिर भी हृदय मेरा चिंतित और व्यथित है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
हुआ है इश्क तुमसे, न जाने क्यों? कुछ तो खास बात होगी तुझमें। वरना ज़माने में हुस्न की, कोई कमी तो नहीं थी । आओ करीब और , थाम लो हाथ मेरा । कर लूं तुझे खुद में मैं जज़्ब , कुछ इस तरह । हो बंद जैसे सीप में , मोती की तरह । न फासले रहें दरमियाँ, न कोई परदा हो, तू मेरी रूह में उतरे, कुछ इस तरह। कि दुनिया ढूँढती रह जाए तुझे, और तू मिले मुझमें, एक साए की तरह। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
सुनकर नज़्म तेरी सकूं मिला है कि ,है कोई जमाने में घायल मेरी ही तरह । काश कि रूबरू होते , जज़्बात तो कुछ और बात होती । कट जाता वक्त जो बचा है कुछ , अपनी कह सुनी में यूं ही । खामोशी के दरमियाँ जैसे , बजते हो ढोल निन्यारों के । झरते कुछ उधर कुछ इधर झरने रुखसारों पर । कुछ तुम कुछ हम ,घिरे रहते कुछ यूं अपने अपने विचारों से । यूं ही गुजर जाती गाड़ी जिंदगी की, रफ्तां रफ़्तां वक्त के इन रेगिस्तानों से । ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी
होकर मजबूर अब हमें चलना होगा । कयामत न जाने कब आ जाए , उससे पहले हमें अब ,हालातों में ढालना होगा । होगी जीत भरोसा तो है , मरते दम तक , ठहर का शायद अब ,आगाज रोकना होगा । ग़म तो है और दर्द भी ,ज़ख्म भर तो जायेंगे मगर , टीस को जगाये रखना होगा । कहीं भूल न जायें ,ये दिल सितम जमाने के इसे हर सितम की यादों से , रूबरू करवाना होगा । क्यों रोता है "मलंग" किसी की बेवफाई से तुझे अपनी वफ़ा को , अपनी कलंदरी से लगाए रखना होगा । ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी
क्या खाक कहते हो तुम अहल-ए-वफ़ा, जिधर भी देखो हर तरफ़ ज़फ़ा ही ज़फ़ा है। है मुमकिन तो खोज लाओ मेरा वो सकून, आज ब-ए-गुनाह हुए करार तो क्या? दर्द में डूबी उन शामों का हिसाब लाओ भी तो क्या? नहीं चाहिए तुम्हारी हम दर्दी अब, हर कोई था तब दफ़ा ही दफ़ा। सहा है अकेले ही इल्ज़ाम, ब-ए-वफ़ाई का। अब साथ निभाओ भी तो क्या? अब खंजर गढ़ चुका सीने में जज़्ब होकर, अब मरहम भी लगाओ तो क्या? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
वक्त वक्त की बात है , तब कुछ और बात थी । और अब कुछ और बात है। तब ग़म से डूबे थे जज्बात हमारे , तन्हां थी हर एक रात । अब न ख़बर है कि , कैसे है हालात । पत्थर सा हो गया है दिल और , लापता से है अब हर जज्बात । फायदा क्या ? कुरेदू जो जख्म अपने , भरे भी नहीं ठीक से जो , अब तलक। हालात ये है कि , बंद है अब ,तेरी तरफ से मरहम की खैरात । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ☹️