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ऐ मेरे बचपन तू लौट आ , मुझे तेरे बहुत याद आ रही है ।

ऐ मेरे बचपन तू लौट आ , मुझे तेरे बहुत याद आ रही है ।  मां का लाड बाप की डांट, भाई बहनों का प्यार । संग सखाओं की हमझोली , वो नंगे पांव का चलाना । फटा झगा तन में , वो शान से चलाना कुचे कूचे । आ लौट आ मेरे बचपन , मुझे तेरे याद आ रही है । वो खाने की थाली मां की परोशी ,  वो नखरे मेरे खाना ना खाने के । ना पसंदी में उठकर , खाना छोड़ना और  रूढ़ जाना । मां का मनाना , प्यार से पुचकारना । अपने हाथों से फिर , मुझे खाना खिलाना । नलहना धुलाना , प्यार से संग अपने बाजार घूमांना । हाय कितना अच्छा था , बचपन का वो गुजारा जमाना । ऐ मेरे बचपन तू लौट आ , मुझे तेरी बहुत याद आ रही है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तन्हां भी नही हम , और न महफ़िल ही ।

तन्हां भी नही हम  , और न महफ़िल ही । दूर हो  तुम मगर  हो दिल के करीब , मेरे लिए यही काफी ही ।  हो जाती है गुफ्तगू तुमसे रह रह कर....! बस तुम अपने हो मेरे , मेरे लिए यह एहसास काफी ही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुझमें और मुझमें...

तुझमें और मुझमें बस ,  यही एक बराबरी है । कि.......! तू मुझमें , और मैं तुझमें हुं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ तो बोल दिया होता तारीफ में हमारी।

 कुछ तो बोल दिया होता , तारीफ में हमारी । हम कौन सा तुमसे , नजराना मांग रहे थे । दर ओ दीवार भी अब अजीब लगती है,  इस दिल ए मकाम की । खुला ही है ये कई सदियों से , एक तेरे इंतज़ार में । आ भी जा अब , बर्दास्त के बाहर है  तेरा इंतजार इसे । ना जाने कब , रुखसत हो जाए "दिल" मौसम ए बहार से । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी