सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

अक्टूबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

न आजमाना कभी....

न आजमाना कभी ,  हमारी सच्ची महोब्बत को । कहीं हमें आजमाते - आजमाते तुम्हें ,  हमसे महोब्वत न हो जाये । ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वो आए याद इतना कि जी भर आया

वो आए याद इतना कि, जी भर आया । कम वक्त अश्क छलक गए , और चेहरा धुंधलाया । देखता था जिसे मैं जी भर ,  वो देखो वो चांद भी निकला बेवफा अब । जरा सी नज़रें क्या झुकाई हमने , वो  बादलों के बीच समाया । हमें डर गलता है अब रोशनी से , बुझा दो चिराग महलों से । हमें छोड़ दो अब तन्हा यारों , महफिल से अब डर लगता है । वो आए याद इतना कि, जी भर आया । कम वक्त अश्क छलक गए , और चेहरा धुंधलाया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तू इतना बदल जाएगा , यह इल्म न था ।

 तू इतना बदल जाएगा , यह इल्म न था । तेरी वफ़ा के हम चर्चा , आम किया करते थे । ना जाने नज़र किसकी लगी कि ,  तुम पास होकर भी हमसे दूर हो गए । अब तो तरस गई है मेरी ये निगाहें ,  तुमसे नजरें  मिलने को ।  काश के तू देख ले इक बार पलट कर ,  और हमें करार आ जाए । सहे है हमने सितम तुम्हारे , ऐ सितमगर ! रोए है घुट घुट कर , हम हर रात भर । फिर भी रहा लबों पर , नाम तेरा ।  तू ज़फा कर कोई गम नहीं,  मगर मेरी वफ़ा पर इल्ज़ाम न कर । तू इतना बदल जाएगा , यह इल्म न था । तेरी वफ़ा के हम चर्चा , आम किया करते थे । ना जाने नज़र किसकी लगी कि ,  तुम पास होकर भी हमसे दूर हो गए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अंधेरों में कही फना न हो , मेरे इश्क का चिराग ।

अंधेरों में कही फना न हो , मेरे इश्क का चिराग । सुना है आपके शहर में , बवंडर बहुत चला करते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

थोड़ा थोड़ा ही सही मगर

थोड़ा थोड़ा ही सही मगर , बातें हम से हर रोज किया करो । हम बीमार ए इश्क तेरे ही है , और इलाज ए इश्क भी तुम हो , दिखा कर झलक अपनी , हर रोज । दवा थोड़ा थोड़ा दिया करो । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी