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मैं अब बुझ जाऊंगा...

मैं अब बुझ जाऊंगा , क्या पता कब । ठहर कुछ देर और , ऐ मेरे दोस्त ! मालूम क्या कब , थम जाए ये सांसें । और तुझे लौटने में , वक्त लग जाए ।। फिर गिला रहेगा तुझे खुद से ही , के काश मैं  होता । और रहेगी बेचैन मेरी रूह भी , के काश तू होता ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अब तो मक़सद ही न रहा कुछ ,जीने का ।

अब तो मक़सद ही न रहा कुछ ,जीने का । बस....! अब तो बेवजह ही , जीती लाश ढोए जा रहा हूं मैं । बची हुई उम्र न जाने कब ,खत्म होगी । बस....! अब इसी इंतजार में , जिए जा रहा हूं मैं । हैं तो बहुत अपने आसपास मेरे , मगर खामोश है सब.....! करे कोई गुफ्तगू मुझसे भी , क्यूं यह आश किए जा रहा हूं मैं । खुदा भी रूठ गया है , शायद मुझसे । अपनी आगोश में काश , भर लेता वो मुझे ।  तो , क्या हर्ज था ? ना जाने वक्त क्यों  , इतना लगा रहा है वो । यही हर दम , सोचे जा रहा हूं मैं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कोशिश तो बहुत की...

 कोशिश तो बहुत की जवां वक्त लौटाने की ,  कमवक्त....! वक्त के साथ साथ सूरत ए हाल भी बदल गए । कैसे कटे अब वक्त खामोश होकर । हम तो वो थे...! जिनके आने से महफिल , रोशन हुआ करती थी । बदले वक्त में अब , कहां वो नूर रहा । पास पास है सब माना मगर ,  दिल से.... हर शक्स हमसे अब , दूर ही रहा । शोर बहुत है इस शहर  मगर ,  जो पुकारे मुझे चाह से.... वो आवाज अब , मुझसे दूर ही रहा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी