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दिसंबर, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मै आऊं आपके साथ....

 👧मै आऊं आपके साथ 👨हो यह मुमकिन गर , तो कयामत आ जाये । रोक लूंगा मैं हर वो तूफान जो हम दोनो के दरम्यान आ जाये । 👧क्या बात है 👨सब असर आपका है , वरना हम कहां , बुझते दीये की रोशनी की तरह । 👧गजब 👨मत दिलासा दिला , कह कर "गजब"  हम दिल जले है , हर कदम पूंक कर रखा करते है । 👧ओह 👨हैरान न हो , हम दिल में बहुत दर्द लिये हुए है । शिकवा हम तुम से क्यों करे , जहां इतने है वहां एक और सही । 👧उफ्फ़ 👨ऊफ न कर ! न परेशान हो , हम तेरे शहर से चले जायेंगे । हम तो मुसाफ़िर  है , जिनकी ना कोई मज़िल है । जहाँ सांझ ढले ,  वहाँ ठहर जाएंगे । 👧आज की रात खास  होगी  👨हर  रात का आलम , एक सा है हमारे  लिये । अखिर जख्म सहलाने का , मज़ा ही कुछ और है । ✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी 

देखे हैं हमने फना होते हुये ...

 देखे हैं हमने फना होते हुये ,  मोहब्बत में कई थे जो .... किरदार ए इश्क इस जहाँ  में । अपनी कहूं तो , मेरी मोहब्बत  अधुरी भी रही , और फना भी हुई । ✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी 

हाल ए गम , क्या बतायें हम ।

 हाल ए गम  , क्या बतायें हम । बड़ी  तब्दीली हो गयी है यार! अब , तेरे मयखाने में ।  बदले बदले है यहाँ , साखी और पैमाने भी । अब नही है इलाज़ कोई ,  मेरे इस दिल का , तेरे इस मयखाने में। तेरे लब ए जाम की , नही  कोई मिशाल  ऐ मेरे हुश्न ए दिल ! यह चित मेरा , तुझ पर ही बुझा है । तू गैर है.....! बहुत थक गया हूँ , खुद को यह समझाते-समझाते । मालूम है कि ,  तू हासिल नही है मुझे । ना जाने क्यूं उम्मीदों से लगा हूँ , तुझे पाने  में । डर  है कि कहीं यह ,  जनून ए  इश्क मेरा , कयामत न ला दे  । ले लो इज़ाजत अब तुम , मेरे दिल से निकल जाने की । ✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी 

रूपसी तू मेरी माया मोहनी , तू मेरी जुकूड़ि कु धक्ध्याट छैं ( गढ़वाली)

  रूपसी तू मेरी माया मोहनी ,   तू मेरी जुकूड़ि  कु धक्ध्याट छैं । लुकि  छुपीक  कीलें छैं , धै  लाणि तू । सैन्दीक औ दें म्यरा समाणि   , हे लठ्याली ! तू ही मेरी ,आन्खियों कु  रगर्याट छै ।  ✍️ज्योति  प्रसाद रतुड़ी 

जौंका जिकुडी का काख म थै हमु , कभि का दिनु ( गढ़वाली)

 जौंका जिकुडी का काख म थै हमु , कभि का दिनु  आज कुज्याणी किलै रूसायां छिन उ मुख मोडिक । अब नि औणन उ दिन हैंसदा खेल्दा सच्ची , कभी बोड़िक । बचपन कु सँग  साथ  छूटी  , छूटीन गौं  गूठ्यार  । ना  जाणि  कै देश , कै मुलूक छिन उ ,   ना जाणि कथगा छ उकाल ,  वख जाण कय्यिं  । अर  न जाणि कथगा छे, उन्ध्यार । ✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी 

तुम तो नहीं थे कभी , मेरे ख्वाब ओ ख्याल में

तुम तो नहीं  थे कभी , मेरे ख्वाब ओ ख्याल में । फिर भी ना जाने क्यों , मेरे इस दिल में । तेरे होने का एहसास , नज़र आता  है ।                    *** ऐ मेरे दिल के अरमान  , ऐ मेरी जान ए  गज़ल । मेरी अनबुझी सी , प्यास हो तुम । कैसे करार आये अब तेरे बिन ,  मेरे प्यार का , पहला एहसास तो तुम । ✍️ज्योति  प्रसाद  रतुड़ी 

कोई लज़बाव , जिसका कोई शानी नही ।

 कोई लज़बाव  , जिसका कोई शानी नही ।  मेरे दिल में दफन वो  सूरत , है मेरे यार की । करूं न तारीफ मैं क्यों न उसकी ,  वो है ही , काबिल ए तारीफ इतना । क्या गजब का आफताब है , उसके चेहरे का । कम वक्त यह नजर , उसके चेहरे पर से हटती ही नही ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मेरी तारीफ में इतने ही , अल्फाज काफी है ।

 मेरी तारीफ में इतने ही , अल्फाज काफी है ।  कि  दर्द का गुबार हूं । और न पूछना क्यों किस कर , कहीं फूट गया तो , मुश्किल होगी ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हटा दिया है पैमाना अब हमने , जितना जी चाहे तू पी ।

हटा  दिया है पैमाना अब हमने ,  जितना जी चाहे तू पी । बे-हिसाब पी.... मगर रहे ख्याल इतना कि  , कदम कभी तेरे , लड़खड़ाने न पाये । वर्ना होगी रुसवाई , मेरे मयखाने  की । ज्योति प्रसाद रतुड़ी........✍️

तू गुल्लक बनकर , मेरे दिल का ।

 तू गुल्लक बन कर, मेरे दिल का । रखना मुझे , सम्भाल कर । हम दिल के बहुत खुले है ,  कहीं  भी बिखर जाते है । ज्योति प्रसाद रतूड़ी.......✍️

उजाले कहाँ , हर किसी को...

उजाले  कहाँ , हर किसी को रास आते है । वो देखो उल्लुओं को....! जो सूरज के आते ही , उदास हो जाते है ।। ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️