विरानों में है अब , बसर जिंदगी । कहने को तो है बीच , सबके मगर । हर कोई गुम है , अपनी अपनी धुन में । किस को किसी की , क्या खबर । डूब चुका है सूरज न खबर , उगा कब । ऊंचे आसमान पर , इक टक टकी सी भरी नजर । न जाने , झुकेगी कब तलक । है इंतजार में , झरझर लिए काया "वृद्ध " कोई तो आए करीब , कुछ पल ही ...हां कुछ ही , पर बतियाए । हर पल मन में, यही बात धर । मगर किसको परवाह अब , उस माझी की जो डूब रहा हो सबको , किनारे पर उतार कर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी