ना जाने क्यों आज मुझे रोने को जी चाह रहा है। हुआ क्या ऐसा अप्रत्यक्ष, क्यों कुछ भविष्य की गोद में घटित एहसास हो रहा है? मुझे मेरे किसी अपने के दूर होने का डर सता रहा है। ना जाने क्यों आज मुझे रोने को जी चाह रहा है। 😔😢 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
वो कोई अब नहीं पूछता , हाल ए दिल । बनते फिरते थे जो हकीम , हमारी सलामती पर । शिफा की जरूरत थी अब , और वो नदारद है , हमारी गम ए महफिल से । आंखे पथरा गई है , उनकी राह निहारते । न जाने वो हमारी सूनी महफिल में , आएंगे कब। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
जब जागो तो , हमें याद कर लेना । इक झलक ही सही , हमें अपना दीदार करा देना ।। देखो चाहत में हमारी , तुम हो । तुम्हें यकीन हो न हो , हमारी उल्फत हो तुम । हमसे बातें-मुलाकातें करो , या न करो तुम । बस दुआओं में कभी , हमें भी याद कर लेना तुम । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
वो जरा सा आए और चले गए , एक झलक ही देखा उन्हें , हमने । और...! मन में मेरे उल्फत की , बुझी आग थी जो , वो जलकर दमक उठी , बहुत ढूंढा उन्हें हमने , न जाने कहां- कहां । ना जाने वो कहां चले गए ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी