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नशीब में तू न सही पर , नशीब हो तो सही ।

 नशीब में तू न सही पर , नशीब हो तो सही   ।  तुझे हासिल करना , मुश्किल फिर कहाँ । तिलिस्मी आंखों से तेरी जो , इक टक मेरी ओर पड़ जाए । मेरे चेहरे का नूर बन , आफताब बिजली चमक उठ जाए । तेरे दमकते बदन को , अपनी आगोश में लपेट कर । चंचल चपला सी बन , घनघोर घटाओं को चीर कर । मन की अलौकिक दिव्य ज्योति को पा जाऊं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यह वही , रहगुजर है ।

यह वही  , रहगुजर है । जहाँ यारों संग , हँसी खेल में । वक्त , गुजरता था कभी । आज अकेला ही हूँ यहाँ , आया मैं वर्षों बाद । कुछ बीते हुए वक़्त की ,  यादों के साथ । खो गया हूँ मैं कुछ घड़ी , कुछ पल , हाँ कुछ पल , सकून मिला जरूर । मगर लौटा फिर यादों से ,  मायूस होकर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हाँ इतना काफी है , तेरी यादों को बिसराने के लिये ।

हाँ इतना काफी है , तेरी यादों को बिसराने के लिये । बस एक झलक तू दिखे , या तस्वीर तेरी ।  दिल को थामे बैठे है हम , चुप से यूँ ही उदास राहों में । मुद्दतों से हमें इंतज़ार है , एक तेरी झलक पाने को  । आ जाओ तुम तो , ये मुमकिन नही मगर ।  हाँ तस्वीर ही काफी है , आसरा ए दिल की तसली के लिए ।  ✍️ज्योति प्रसाद  रतूड़ी

मेरा कहा ही रहा बाकी , याद शायद उनको ।

मेरा कहा ही रहा बाकी , याद शायद उनको । अपनी कही वो क्या , हर कोई भूल जाते है । यही उम्मीद भी थी मुझे , उनसे के इश्क में ।   चंद रोज़ का ही , जुनून था उनका । वो ही क्या हर कोई , मतलब निकलते ही भूल जाते है । लो आज फिर धुंआ धुंआ सा , होने लगा है सहर । शायद रात भर फिर किसी के , अरमान जल उठे हो । शबनम पिघल कर , शायद टपक रहे हो उन शोलों पर । जो जल उठे हो शायद , किसी की बिरहा में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुरबानी किस मोल से दी भला , क्यों कर छोड़े ।

कुरबानी किस मोल से दी भला , क्यों कर छोड़े । अपने घर-बाहर , शहर भाई-बंधु ।  इन के लिए खाई क्यों गोली सीने में ।  क्या सोच कर तोड़ा दम तिरंगा की शान में ।  के तेरे देश में अब , अपनी कुर्सी की खातिर ।   तिरंगे  को , उछाल देंगे धरा पर । दर्द में कराह रहा हो जो , पीड़ा जिसे है वो ।  गुमनाम देश का सपूत , आंखों में नमी लिए ।  आज खुद को कोस रहा है , बेबस है वो कुछ नही कर पा रहा है वो । किसान आंदोलन  के नाम पर आज , ठगा जा रहा है वो । कुछ कर भी ले यत्न , सामना उनका कर ले भी । मगर शेर की खाल में , गीदड़ छुपा जो । वो नकली किसान , असली दिख रहा है लोगों को । बस यही बिडम्बना है , वरन गोलियां गिनना अब तो प्रतिबंधित है । इसलिए नकली असली के रूप में , आनंदित है । ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी

देखा है माँ ! तुझे जिंदगी के सफर में , दुःख में भी मुस्कुराते हुए ।

देखा है माँ ! मैंने तुझे । दुःख में भी , मुस्कुराते हुए । मुझ में भी वो , शक्ति दे दो माँ !  मैं भी तेरी तरह रहूँ सदा , हंसते मुस्कुराते हुए ।   और अंत में गुमसुम होकर , इस जहाँ से रुख़सत हो जाऊं । किसी को खबर भी न हो , और मैं तेरे पास आ जाऊँ । ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम मुझे बहुत , याद आती हो माँ ।

तुम मुझे बहुत , याद आती हो माँ । नींद तो आती है अब भी , मगर माँ ! अब वो फुरसत की , नींद कहाँ ! जो थी कभी तेरी गोद में ,  तेरी अंचल की छांव तले । नही है अब कोई , जो सुलाये मुझे , मेरे सिर को सहलाये । मेरे दिल की जाने जो ,  मेरे मन की माने जो ।  नही है कोई तेरे सिवा माँ ! तुम बिन सूना है मेरा ,  दिल का जहाँ । तुम मुझे बहुत , याद आती हो माँ । 😭😭😭😭😭😭😭😭 @ज्योति प्रसाद रतूड़ी