कुरबानी किस मोल से दी भला , क्यों कर छोड़े । अपने घर-बाहर , शहर भाई-बंधु । इन के लिए खाई क्यों गोली सीने में । क्या सोच कर तोड़ा दम तिरंगा की शान में । के तेरे देश में अब , अपनी कुर्सी की खातिर । तिरंगे को , उछाल देंगे धरा पर । दर्द में कराह रहा हो जो , पीड़ा जिसे है वो । गुमनाम देश का सपूत , आंखों में नमी लिए । आज खुद को कोस रहा है , बेबस है वो कुछ नही कर पा रहा है वो । किसान आंदोलन के नाम पर आज , ठगा जा रहा है वो । कुछ कर भी ले यत्न , सामना उनका कर ले भी । मगर शेर की खाल में , गीदड़ छुपा जो । वो नकली किसान , असली दिख रहा है लोगों को । बस यही बिडम्बना है , वरन गोलियां गिनना अब तो प्रतिबंधित है । इसलिए नकली असली के रूप में , आनंदित है । ✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी