क्या कहूँ मैं कौन हूँ , मैं तो इक ऐसी बयार हूँ । टूटकर बिखर गया हो जो , बसंत में । मैं वो इक अनचाही बहार हूँ । घटाओं को , निहारता रहा मैं "मलंग" के किस और बरसे । एक आस सी लिए , भिगूँ मैं भी । ना जाने कब , मेरे भाग का , सावन बरसे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी