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मोहब्बत तो मोहब्बत होती है ।

मोहब्बत तो मोहब्बत होती है । जैसी भी हो ,  बड़ी पाक साफ होती है ।  गम की दुश्मन और ,  खुशी की महबूब होती है ।  मोहब्बत तो मोहब्बत होती है ।  कभी माँ की , ममता होती है । कभी भाई-बहन का, प्यार होती है । बाबा की , दुलार होती ।  मोहब्बत तो मोहब्बत होती है ,  कभी दोस्त की , दोस्ती होती है ,  पति पत्नी का , विश्वास होती है ।  मोहब्बत तो , मोहब्बत होती है । कभी दिल की , प्रीत होती है । कृष्ण की , राधा होती है । हर रिश्ते में इसकी , जगह खास होती है । मोहब्बत तो मोहब्बत होती है ।  ना गरीब होती है न अमीर होती है ।  मोहब्बत दिलों का ,एहसास होती है ।  विश्वास से यह जिंदा रहती है । मोहब्बत तो मोहब्बत होती है । जैसी भी हो ,  बड़ी पाक साफ होती है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सदियाँ गुजर गई , तू आयी और चली गयी ।

सदियाँ गुजर गई , तू आयी और चली गयी ।  कभी कुछ पल ,कभी पूरी हुई । ऐ जिंदगी ! तू कब किसी हुई ।  मिथ्या स्वप्न दिखा कर , भ्रम ये तेरा मेरा का देकर ।  काम क्रोध मोह लालच का , ऐनक पहना कर ।  सूट बूट और फटे हाल में ,इतराकर मचला कर ।  दुख-सुख के , आंसुओं में नहा कर । हट बचपन ठाठ यौवन , वृद्धा लाचार हुई । ऐ जिंदगी ! तू कब किसकी हुई ।  सदियाँ गुजर गई , तू आयी और चली गयी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ढूंढता ही रहा मैं , अनजान रिश्तों की राज़ ए वफ़ा ।

ढूंढता ही रहा मैं , अनजान रिश्तों की राज़ ए वफ़ा ।  न इश्क , न चाहत ही उन्हें पाने की, ऐसा क्या फिर ?  दिल में उसका ही ख्याल क्यों हर दफ़ा। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

कब्जा है किसी और का ,मगर जरूरत है यहां ।

कब्जा है किसी और का , मगर जरूरत है यहां , रहन बसर , करने वाले की । हो पसंद तो ठहर जाओ  ।  मुद्दतों से  ये मकान खाली है ।  सदियों से ताक रही है ,  इसकी दीवारे , छत ,आंगन चौबारा । कोई आये तो एक बार यहां ,  फिर लौटने न दूंगा उसे दोबारा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अभी न जाओ , अभी तो बहुत बातें करनी बाकी है ।

अभी न जाओ ,  अभी तो , बहुत बातें करनी बाकी है ।  कल का क्या ? कल हो न हो । यह चाँदनी रात ,आज बड़ी मस्तानी है ।  पिला दे तू मुझे ,  शराब , अपनी मोहब्बत की । मुद्दतों से , इस दिल की प्यास ,  बुझानी , अभी बाकी है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

क्यूं सताती हो मुझे तुम ।

क्यूं सताती हो मुझे तुम । बात बात पर क्यों , रूठ जाते हो । जबकि मालूम है तुम्हें । तुम बिन हम , रह नहीं पाते । देख कर हमें तुम ,  क्यों नज़र फेर जाते हो । जबकि मालूम है तुम्हें । तुमसे बिन मुलाकात के हम , रह नही पाते । ✍️ज्योति पर रतूड़ी

कुछ तो बोलो , तोड़ डालो अपनी ये खामोशी ...

कुछ तो बोलो , तोड़ डालो अपनी ये खामोशी ... नही सहन होती है ,  अब आपकी ये  खामोशी..... कर रही है कई सवाल मुझसे , आपकी ये खामोशी.... बे गुनाह हूँ मगर बना रही है मुझे  , गुनाहगार आपकी ये खामोशी .. ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यूँ तो मख़सूस हम थे , उनकी नज़र में ।

यूँ तो मख़सूस हम थे ,  उनकी नज़र में । "मगर ऐसा अचानक  , न जाने क्या हुआ के । अब हमसे बेहतर उन्हें नज़र ,  कोई और आने लगे ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यूँ ही नम हो चली थी , ये आंखे ।

यूँ ही नम हो चली थी , ये आंखे । कुछ पुरानी यादें लिए ।  उमड़ पड़े , बादल मेरे दिल के । रिमझिम  सी फुआर लिए । बदल गए है , मायने रिश्तों के । वक्त की गर्त में , हो कर दफन कहीं । ढूंढ रहा हूँ , बेबस हो कर । मिल जाये वो चिराग मेरी , मोहब्बत का कहीं । यूँ तो खिंज़ा ही रही है,  इस दिल के दामन में ,  ने आना तो , कब का ही , छोड़ दिया है ।  मगर इक आश है ,  बची हुई जो सीने में , उसी से दिल लगाना , अब हमने , सिख लिया है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

खुले राज़ कुछ तो , कई और भी दफन है ।

खुले राज़ कुछ तो ,  कई और भी दफन है । ऐ खुदा ! तेरी रंगीन दुनिया में ,  न जाने कितने कातिल ,  अभी और जिंदा है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

इक ख्वाब देखा था के जिंदगी ,बने नाशिबों में आप ,

इक ख्वाब देखा था के जिंदगी , बने नाशिबों में आप , के गुलज़ार हो दमन मेरा । लो बन गयी तकदीर  के , मिले तुम हमें खुशबू की तरह । महक उठा है चमन चमन , महक उठी है ,जीवन की क्यारी । रहे सलामत यह बगिया हमारी , और रहे अमर सदा , तेरी मेरी यह यारी ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यूँ तो बुझा ही दिए थे चिराग ,हमने अपने दिल के ।

यूँ तो बुझा ही दिए थे  चिराग , हमने अपने दिल के । तेरा आना क्या हुआ कि , दिल के चिराग फिर जल उठे । हुआ रोशन मेरा दिल का जहां , ऐ दोस्त ! तेरी मोहब्बत के चिराग से ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम संग हो तो , मुझे क्या कमी है ।

तुम संग हो तो , मुझे क्या कमी है ।  अंधेरों से , मिल रही रौशनी है । लबों पे नाम तेरा है , दिल मे तुम ही हो मेरे । तेरे ख्वाबों में है बजूद मेरा । यह प्यार ही तो है तेरा ,  हकीकत अब और क्या होगी । ढूंढती है ,तुझे मेरे नज़र । रहता ख्याल की के तू है , इधर-उधर । धड़कता है दिल , लौट आता हूँ । दिल मे धड़कनों की जगह , तुझे पाकर । ✍️ज्योति प्रसाद  रतूड़ी

हो रहा है ना जाने क्यों हमको ,यह अहसास ।

हो रहा है ना जाने क्यों हमको , यह अहसास । तेरी बज़्म ए दिल के अब ,  हम धुंधले सितारे  है । जान न सके तुम मेरी मजबूरी , और हमें फरेबी समझ बैठे । चाह जिसने तुम्हे ऐ दिल, हम वो ,तकदीर के मारे है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बस एक तूफान सा आना ये तेरा ।

बस एक तूफान सा आना ये तेरा , झंझोड़ कर मेरे दिल की बगिया को । जिसमें है लाखों अरमान दफन ,  उनको जगा कर जाना तेरा । न जाने कब सरस होगा वो पल , जब मेरे पास हो ठहर जाना तेरा ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कभी रंग ए बहार हम थे,उनकी महफ़िल में ।

कभी रंग ए बहार हम थे, उनकी महफ़िल में । आज सितारे गर्दिश में क्या हुए ,  उन्होंने नज़रें ही फेर ली ।   ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अब कहो भी , बहुत हो गयी

अब कहो भी ,  बहुत देर हो गयी । इंतज़ार में ऐ दिल ! कम वक्त जहन में  कई सवाल उमड़ रहें है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बात कुछ तो ऐसी भी नही थी .....मगर दिल को बुरा सा लगा ।

बात कुछ तो ऐसी भी नही थी .....मगर दिल को बुरा सा लगा । जी से चाहत होती है जिससे ...ना जाने वो ही क्यों जी चुराता है हमसे । मैं तो संभाल लूंगा खुद को...अपने एहसासों को कर दफन कहीं । इस दिल का क्या करें.....इसे तो आदत सी हो गई है , तुम संग रहने की ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बहुत तरसा है ये मन ।

बहुत तरसा है ये मन ,  एक तेरी झलक पाने को । तू डाली सी गुलाब की ,  हवा के झोकों से । इठलाती बलखाती ,  मस्त झूमती सी । चमन  में महक अपनी,  बिखराये हुए । तू भवरों की महफ़िल ,  सजाये हुए । मैं पतंगा , देखता ही रहा । अरमानों की , दुनिया सजाए हुए । अब नही है चाह , कुछ पाने की  तेरे सिवा । हम हो बजूद में या न हो ,  तेरे कभी । तेरा बजूद रहे मुझमे ,  खुदा से है बस इतनी सी दुआ ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हूं खुश बहुत के आज , यार से मुलाकात हो गई ।

हूं खुश बहुत के आज ,  यार से मुलाकात हो गई । कुछ लम्हों की और,   जिंदगानी हो गयी । है यकीन मुझे मेरे यार ,  तेरी यारी पर । तेरे दिल की मेरे दिल पर ,  "मोहब्बत की"  मेहरबानी हो गयी  । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुमसे दिल लगाया तो जाना , प्यार क्या है ?

तुमसे दिल लगाया तो जाना ,  प्यार क्या है ?  होता है कैसे बेकार दिल , किसी की यादों में । तेरी यादों को दिल से लगाया , तो ये जाना दिल ए बेकरार क्या है ? बे रंग सी थी दुनिया मेरी ,  जब तू नही थी मेरे संग । मिला जो तेरा साथ  मेरी दुनिया में रंग भरने लगा है । बुझते हुए दिल के चिरागों में , मुहब्बत के चिराग जलने लगा है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम ही हो मेरे दिल, में समाई ऐसे ।

तुम ही हो मेरे दिल ,  में समाई ऐसे । सागर में सीप और , सीप में मोती हो जैसे । तुम हो चिराग ए उलफत , मेरे सीने की धड़कन हो । दिल की प्यास हो तुम , तुम ही मेरा जीवन हो । रंग ए बहार हो तुम , मेरी आँखों का नूर हो । दिल से दिल की,  करीबियां ही बहुत । मोहब्बत के लिए ऐ "दिल"  मलाला नही कोई भी हमें , जिस्म से जिस्म भले दूर हो । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दर्द ए दिल का बयान है ।

आहें ही है अब , इस दिल में । दर्द के सिवा क्या सुनाऊं मैं , तेरी महफ़िल में । मुद्दतों से यह दिल कभी , मुस्कुराया नही । जो मुस्कुराया था कभी ये दिल  , वो तेरी इनायत थी ।  तेरे जाने के बाद इस दिल को , और कोई भाया ही नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हार चुका हूं खुद से ही खुद मैं ।

हार चुका हूं ,खुद से ही खुद मैं । अब जीतू किसी से , तो क्यों भला ?  आखिर इस संसार में रखा ही क्या ? धोखा ,फरेब और जालसाज़ , हर तरफ है दुश्मन ,  इंसान के इंसान यहाँ । एक चेहरे पे कई चेहरे लिए ,  घूमते है हर कोई  यहाँ । पहचान मुश्किल है अब,  कौन दोस्त है , दुश्मन कौन यहाँ ? टूटते देखे है वफ़ा के रिश्ते ,  शक़ की आंधियों में  । अब वो प्यार की , पुरवाई रही कहाँ । हार चुका हूं ,खुद से ही खुद मैं । अब जीतू संसार से , तो क्यों भला ?  आखिर इस संसार में रखा ही क्या ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हम अपने उसूल न तोड़ सके ..

हम अपने उसूल  न तोड़ सके , न तुम अपनी जिद्द छोड़ सके । अपने-अपने अहम में आकर , इक दूजे से दूर होते चले गए । जीने की राह ,  खोज ली है अब मैंने ।  राह में फूल तो नही , मगर कांटे बे-सुमार है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

चलो अच्छा है यूँ ही , खामोशी से आया करो ।

चलो अच्छा है यूँ ही ,  खामोशी से आया करो । ना दो आवाज मुझको ,  और मुझे देखकर चले जाया करो । होती होगी मुलाकात और से तेरी ,  आते जाते इस रहगुज़र से । सिर्फ हमसे ही नजरें  ,  चुराकर जाया करो । ऐसा नही कि ना देखा हमने तुम्हें ,  रास्तों में आते जाते मगर । चुप ही रहे हम , यह सोच कर । तुम यह सोचो कि ,  हमने तुम्हें देखा ही नही ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तबियत आज फिर ना सहज है ,मुद्दतों से हकीम ।

तबियत आज फिर ना सहज है  , मुद्दतों से हकीम । मैं , तेरे दर पर आया नही । दावा दे या जहर , बस इस मर्ज का , कोई तो ऐसा इलाज़ कर । के सो सकूँ मैं सकून से ,  और उनको मेरे दर्द ए दिल , की न हो कोई खबर ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जिगर के पार हुआ निशाना तेरा ।

जिगर के पार हुआ निशाना तेरा ,  तेरी कातिल निगाहों ने दिल घायल किया । अब तो जाना मुमकिन नही कहीं और ,  दिल - ए - इलाज - ए - हक़ीम , तुमसा  और कहां ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कर के वीरान मेरे दिल की महफ़िल को ।

कर के वीरान मेरे दिल की महफ़िल को ।  तन्हां हमें कर छोड़ दिया , हाय दिल तोड़ दिया मेरा दिल तोड़ दिया ।  मांगा क्या था हमने तुमसे , एक प्यार के सिवा ।  कसूर क्या था मेरा , मैं एक निर्धन ही तो था ।  बतला दे वो हरजाई , मेरे प्यार में थी और क्या कमी ।  जो तलास की है तुमने गैरों में खुशी , और वो हमने तुम्हें कभी न दी ।  कर के वीरान मेरे दिल की महफ़िल को ।  और तन्हा हमें कर छोड़ दिया ,  हाय दिल तोड़ दिया मेरा , दिल तोड़ दिया ।  जला है बाग मेरे दिल का , अब न कभी बहार आएगी  ।  न खिलेंगे फूल वो दिल के , न कभी कोई कली  अब मुस्कुराएगी ।  मैं खाक में अपने , दिल को मिला जाऊंगा ।  बजूद अपना दफन कर , न कभी फिर नज़र आऊंगा ।  रहे सलामत तू , नया जहां मुबारक हो तुम्हे । तेरी बज्म में  फिर अब मैं , न कभी लौट के आऊंगा ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बड़ी हसरत लिए शरीक हुए थे हम ,उनकी महफ़िल में

बड़ी हसरत लिए शरीक हुए थे हम , उनकी महफ़िल में । दिल बुझा बुझा सा हुआ है आज । खाक हुई हसरत वो मेरे दिल की , धुंआ धुंआ ही सा है दिल मेंआज ।  न नज़र थी , उनकी इस तरफ । न दस्तूर ही था मेहमाँ नवाज़ी का । बड़े ही थे कुछ कदम ज्यों ही हम , हमें फिर यह हुआ एहसास । अब लौट कर जाना ही  बेहतर है , उनकी इस महफ़िल से । है कदरदान बहुत उनके । उनकी इस , दिल की महफ़िल में आज । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

क्षण भर की है जिंदगी , न जाने कब वो क्षण आ जाये ।

पल भर की है जिंदगी ,  न जाने कब वो ,पल आ जाये । मुस्कुराते हुए चमन में , न जाने कब बहार-ए-खिज़ा आ जाये ।। गुज़ार लो मुस्कुराकर , वक्त जो मिला है । न जाने कब जिंदगी, की शाम हो जाये ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ना होता शायद प्यार तुमसे कभी ,

ना होता शायद प्यार तुमसे कभी , यह दिल जो, तुम पर आया ना होता । ना मिलती तुमसे  ये नज़र कभी, जो किसी महफ़िल में मैं ,  तुमसे टकराया ना होता । यह दिल है इश्क , हुस्न दिल तेरा । वफाएं प्यार की रहेगी, ये कब तलक । तुम मेरे दिल में , ही रहोगी । मेरे सांसों की , आखरी दम तलक । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

थोड़ा सा और सह लूँ , "दर्द "

थोड़ा सा और सह लूँ , "दर्द " फिर बे-दर्द न हो जाऊं तो कहना । रह जाएंगे निशान , "ज़ख्मों के" ज़ख्म अपने खुद भर न लूँ तो कहना ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दिल पर कहाँ , किसी का जोर चलता है ।

दिल पर कहाँ ,  किसी का जोर चलता है  । यह दिल जिद्दी है बड़ा ,  भा गया जो कोई । इंसान तो इंसान , यह । पत्थरों से भी ,  मोहब्बत करता है  ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दम नही था कि .....

दम नही था कि , कोई दम निकाल दे मेरा । चाह हमारी ही न रही जीने की , और बदनाम शराब हो गयी ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तेरी दोस्ती के दम पर हूं अब जिया जाए जो चार दिन ।

तेरी दोस्ती के दम पर हूं अब  जिया जाए जो चार दिन । मुझको देना साथ अपना यूं ही , मेरा हम राज बनकर । मेरी जिंदगी की किताब खुली है ,  कुछ नहीं रहा अब छुपाने को  । उठ चुका भरोसा इस जहां से , कुछ न रहा अब निभाने को ।  दोस्त अब तेरा ही सहारा है , अपने टूटे दिल का हाल बतलाने को । रखना अपने प्यार का मरहम  मेरे जख्मी दिल सहलाने को । शायद भर जाए जख्म यह कभी , हकीम तुम जो बन जाओ मेरे धड़क उठेगा दिल फिर ये,  तुम जो इसे सहराओगे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुझे ! तेरे चाहने वालों की कमी नही ...

तुझे ! तेरे चाहने वालों की कमी नही , तू जिससे चाहे गुफ्तगू कर । हम तो लौट आये है "अब" तेरे कूचे से , अपनी हसरतों को द-फना कर  ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

शान-ओ-शौकत से "इश्क" क्या , खाक हुआ करती है ।

शान-ओ-शौकत से "इश्क" क्या ,  खाक हुआ करती है । "इश्क" तो वो दीवाने किया करते है ,  जलती रहे समा , और परवाने कुर्बान हुआ करते है । मज़ा क्या उस आशिकी में ये , दोस्त ! जिसमें दर्द न हो । जलते परवाने है तो , समा भी रोया करती है । न मिटा है कभी , न मिटेगा "हुस्न ओ इश्क" जमाने से । यह पाक मोहब्बत है , इसे कौन मिटा सका है इस जमाने से  । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कभी दूर मत जाना हमसे , हम रह न सकेंगे । रह न सकेंगे ...

कभी दूर मत जाना हमसे , हम रह न सकेंगे ।  रह न सकेंगे ...  कितनी मोहब्बत है हमको तुमसे ,  पढ़ लेना दिल से , हम कह न सकेंगे । तेरी जुदाई हम सह न सकेंगे ....  सांसों में मेरी खुशबू है तेरी ,  आंखों में , तेरी सूरत बसी है ।  ओझल न होना कभी  आंखों से मेरी !  जुदाई का गम हम सह न सकेंगे ।  बिन तेरे हम इक पल रह न सकेंगे ,  तेरी जुदाई  हम सह न सकेंगे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हाँ सब खैरियत से है , बस यूँही ।

हाँ सब खैरियत से है , बस यूँही ।  कभी डूब जाता हूँ , ख्यालों में अक्सर ।  कि सच महंगा है या , झूठी शान वो सौकत ।  दिल की बात , करते भी है कई ।  मगर बड़ा दिल तो , रखो तो सही ।  माना कि बहुत है इक चिंगारी ही , अंधेरों को चीरने के लिए । मगर उस चिंगारी को दिल में , दबा कर रखो तो सही ।  हार भी जरूरी है , सबक हासिल के लिए ।  फिर जीतने के लिए वो सबक , याद रखो तो सही । टिमटिमाते है वो ही दीये , जो जला करते थे कभी ,  अपनी रावनियों में ।  जल तो रहे है वो अब भी , किसी तरह बस इतना ,  काफी ही सही ।  हर शुरू का छोड़ , आखरी भी तो है ।  वो अनन्त हो , तो क्या बुरा ।  ढूंढ ही लेंगे उस , छोड़ को मगर । यह बेला दुःख की , कट जाए तो सही ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी । 

नकाबों के पीछे , छुपे है चेहरे यहाँ ।

नकाबों के पीछे , छुपे है चेहरे यहाँ । भरोसा न कर किसी की अदाओं पर । ये हुश्न वाले , बड़े जालिम है साहब !  इत्मीनान से , कत्ल कर जाते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हम बैठे थे इत्मीनान से ,संजोये हुए उनको ।

हम बैठे थे इत्मीनान से ,  संजोये हुए उनको । मगर क्या मालूम था कि हम ,  आस्तीनों में सांप संभाले हुए हैं । हमारी बर्बादी का वो जस्न , सर- ए -आम किया करते है ।   फिर भी न जाने क्यों हम , उनके लिए , मोहब्बत संभाले हुए है ।   ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मुझे शिकायत नही उनसे , कि वो बेवफा निकले ।

मुझे शिकायत नही उनसे ,  कि वो बेवफा निकले । अफसोस तो है कि हम,  उनको पहचान न सके । मुझसे बेहतर अब उन्हें,  गैर आने लगे । गलती मेरी थी या "इश्क", हैरानी तो इस बात की है कि । अब हम उन्हें क्यों ,  याद आने लगे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अभी अभी तो चढ़ी है शराब ए इश्क ।

अभी अभी तो चढ़ी है , शराब ए इश्क । नशा उतर जाएगा तो , पूछेंगे हाल । तेरी ख़ुमारियाँ-ए-बदहाल -ए-मोहब्बत  हासिल इश्क में बेवफाई की । सुनेंगे फिर हम , तेरी दास्ताँ ए इश्क । हर जुल्म -ओ- सितम की , बड़े इत्मीनान से ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

प्रेम अच्छा ताँ भला ।

प्रेम अच्छा ताँ भला ,  प्रेम जो जाने कोई । चुन पात्र वो प्रेम का ,  जो प्रेम के काबिल होए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जाम ए हुश्न से , दूर ही बेहतर ।

जाम ए हुश्न से ,  दूर ही बेहतर  । सुना है कि ये नशा , बर्बाद कर देता है । न आये पहगाम , किसी ऐसे मयकदे से , तो बेहतर । फायदा क्या ?  इश्क में मयकशी होकर।  इस मयकशी से तो ,  अपनी फकीरी बेहतर ।।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

गुम-शूम गुम-शूम सी है , आज जिंदगी ।

गुम-शूम गुम-शूम सी है ,  आज जिंदगी । न आये वो ,  न पहगाम ही कोई । चित है व्याकुल ,  और मैं हूँ खोई खोई । नज़र एक घड़ी भी क्या ? मजाल है जो ,  हट जाए उस राह से । जिस राह से आना-जाना था ,  उसका रोज-रोज । मगर न जाने क्या हुआ ?  वो क्यों न आये इस ओर ।  चित है व्याकुल , और मैं हूँ खोई खोई । हर आहट पर चौंक जाती हूँ ,  कहीं होंगे  वो ही शायद । दौड़ी चली जाती हूँ , बे-सुध होकर । गुम-शूम गुम-शूम सी है ,  आज जिंदगी । न आये वो ,  न पहगाम ही कोई । चित है व्याकुल ,  और मैं हूँ खोई खोई । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मिलती नही जमीं सबको , न आसमां ही ।

मिलती नही जमीं सबको ,  न आसमां ही । ये तो नसीब है अपना-अपना , कोई तो महलों में है अकेला। कोई फूस में और , किसी का घर है ,  खुला आसमां ही । सजती है किसी महफिलें,  रास-रंगरलियों में ।  गम और खुशियों में ,  डूब जाता है कोई ,  शराब की पियालियों में । कोई भटक रहा होता है , फाटे- हाल ,  भूखा प्यासा उन्हीं की , रंगीन गलियों में । धूप हो या छाव मिलती है ,  हर किसी को , अपने ही नशीबों से । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

शान-ओ-शौकत से "इश्क" क्या , खाक हुआ करती है ।

शान-ओ-शौकत से "इश्क" क्या , खाक हुआ करती है । "इश्क" तो वो दीवाने किया करते है , जलती रहे समा और परवाने कुर्बान हुआ करते है । मज़ा क्या उस आशिकी में ये दोस्त ! जिसमें दर्द न हो । जलते परवाने है तो , समा भी रोया करती है । न मिटा है कभी , न मिटेगा "हुस्न ओ इश्क" जमाने से । यह पाक मोहब्बत है , इसे कौन मिटा सका है इस जमाने से  । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तेरी जुदाई हम न सह सकेंगे , दूर मत जाना हम रह न सकेंगे

तेरी जुदाई हम न सह सकेंगे ,  दूर मत जाना हम रह न सकेंगे ।  रह न सकेंगे ...  कितनी मोहब्बत है हमको तुमसे ,  पढ़ लेना दिल से , हम कह न सकेंगे । तेरी जुदाई हम सह न सकेंगे ....  सांसों में मेरी खुशबू है तेरी ,  आंखों में , तेरी सूरत बसी है ।  ओझल न होना कभी  आंखों से मेरी !  जुदाई का गम हम सह न सकेंगे ।  बिन तेरे हम इक पल रह न सकेंगे ,  तेरी जुदाई  हम सह न सकेंगे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वो पहले सी बात कहाँ , सच ही तो कहा है किसी ने :

वो पहले सी बात कहाँ , सच ही तो कहा है किसी ने हर कोई बदलता है वक्त की तरह । वक्त ने कहां किसी को छोड़ा है । जमीन से आसमां पर बिठाया भी है । तो कभी किसी को गिराया भी है । यही चराचर का खेला है । भीड़ भी बहुत है , और हर कोई अकेला है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज फिर मन , न जाने क्यों भर आया ।

आज फिर मन , न जाने क्यों भर आया ।  अपनी खोई हुई मोहब्बत का ,  न जाने क्यों फिर ख्याल आया ।  दगा बाज़ तो , न कहेंगे हम उनको ।  न जाने क्यों उनकी वफ़ा पर ,  फिर आज सवाल आया ।  आज फिर मन , न जाने क्यों भर आया ।  बदगुमानियाँ रही कभी हमें , जिस मोहब्बत पर । न जाने क्यों आज , उस मोहब्बत पर हमें , गुमान आया । अपनी खोई हुई मोहब्बत का , न जाने क्यों फिर ख्याल आया ।  आज फिर मन न जाने क्यों भर आया .... ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

खो गया हूँ मैं , उनके के ख्यालों में ।

खो गया हूँ मैं , उनके के ख्यालों में ।  अब जो भी हो , अंजाम ए मोहब्बत ।  कबूल है हमें । अपना दर्द ए दिल उन्हें दे आया हूं , उन पर यकीं है हमें ।  इस दर्द का शिफा , है उनके पास ।  कहीं दुरुस्त होकर । गुरुर न कर जाए  ,ये दिल मेरा । इस लिए मैं..! उनकी यादों को , साथ ले आया हूँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज फिर वही दास्तान ए इश्क , मुझे याद आया

आज फिर वही दास्तान ए इश्क , मुझे याद आया ।  वो पहली मुलाकात , वो तेरी झुकी हुई निगाहें । वो तेरे सवालात के दिन , याद आया ।  आज फिर वही दास्तान ए इश्क , मुझे याद आया ।  मुझसे न सह जाना , कि तू करे गुफ्तगू किसी और से !  कही छोड़ न दे तू मेरा साथ , इस बात से मेरा घबरा जाना ।  और तकरार की आग में , दोनों का झुलस जाना । वो हमारे कदम दर कदम , मोहब्बत में बढ़ जाना ।  और धीरे तेरा , मेरे दिल मे बस जाना ।  रोया कभी मैं तो कभी तू , अपने हाल ए दिल बयाँ करके ।  मैने तो इस जहां में , अनमोल हमसफ़र तुझे पाया ।  मैंने जो तेरी आँखों में , इक नूर मोहब्बत की देखी ।  उस नूर को मेरा पा जाना , आज फिर वही दास्तान ए इश्क , मुझे याद आया ।  मालूम नही था के ऐ मेरे जान ए जहां , खुद को खो कर हासिल तेरी मोहब्बत होगी ।  खोया है बहुत , तन्हां ए शाम ए गम में ।  हासिल है जो अब सकून ए बहार मुझ को ,  ऐ सनम मैंने तेरे दिल से ही पाया ।  आज फिर वही दास्तान ए इश्क , मुझे याद आया ।  वो तेरा शर्म से , पलकों का झुका ना ।  और नज़रों को तेरा , धीरे...

कोशिशें तो बहुत की मुस्कुराने की , मगर मुस्कुरा न सके।

कोशिशें तो बहुत की मुस्कुराने की , मगर मुस्कुरा  न सके।  रोने का जी हुआ बहुत , मगर हम रो न सके ।  रहे अनजान बे-खबर हम उनकी फितरत से ।  उनके फरेब ए मोहब्बत को हम, जान न सके । माना कि न रही तकदीर , मुझ पर मेहरबान कभी । लाखों जुल्म वो सितम सहे हमने , जमाने के । मुकद्दर से हमने अपने  शिकायत , न की थी कभी । मगर आज शिकवा है मुझे , उस मुकद्दर से ।  जिसने ठगया मुझे मोहब्बत के नाम से । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आरजू है यही मेरी के , बनूँ चिराग मैं उनके दिल का ।

आरजू है यही मेरी के , बनूँ चिराग मैं उनके दिल का । दामन में उनके सदा मैं , टीम टिमाऊँ   जुगुन की तरह । गर पड़े धीमी लौ इसकी ,  तो उनके प्यार का मैं तेल पाऊं ।  बसर हो जिंदगी कुछ इस तरह ,  उनके दिल में मैं बन्द रहूँ , सीप में मोती की तरह । ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी

क्यों सिलसिला चला ये , मोहब्बत के सफर का ।

क्यों सिलसिला चला ये , मोहब्बत के सफर का । जिसकी न कोई मंज़िल है , न कोई ठिकाना ही । ना जाने किस ओर जाएंगी ये राहें , हमसफर बनकर । ना जाने कौन से मोड़ पर हो , इसका खुदा-हाफ़िज़ ! यह खुदा जाने । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सो रहा हूँ अब के , तू ख्वाबों में आ जाये ।

सो रहा हूँ अब के , तू ख्वाबों में आ जाये  । हकीकत में न हो सके जो , वो कहीं ख्वाबों में ही , हो जाये । ऐसा कुछ भी नही है , मनशा मेरे दिल की ।  सिर्फ तेरी बाहों में , सिमट जाने की , इस दिल की तमन्ना , पूरी हो जाए ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम को पाया भी नही और खोने का डर क्यों है ?

तुम को पाया भी नही और खोने का डर क्यों है ? बता मेरी जिंदगी , यह राज ए उल्फत क्या है ? तुम संग रहे भी नही , और उम्र भर का साथ है ।  बता मेरी जिंदगी हमें यह अहसास क्यों है ?  है तो कई जमाने में , मगर किसी को हमनें बे-हद चाह नही ।  मालूम है हमें कि तुम , अमानत हो किसी और की ।   मगर तुझ पर ये दिल , अपना हक जताता क्यों है ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जिधर भी देखता हूँ , तू ही तू नज़र आये ।

जिधर भी देखता हूँ , तू ही तू नज़र आये ।  सोचता कुछ और हूँ , मगर ख्याल तेरा ही आये ।   अब क्या क्या , बयाँ करूं मैं हाल ए इश्क । दीवानगी की बे-इंतेहा हो गयी है ,   हुए हम मयकश के तुझे भूल जाएं । सोहबत ए महकशी तुम्हारी ही रही  ख्याल बनकर । जाम ए शराब में हमें , तू ही नज़र आये । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज मेरा कल , फिर लौट कर आया ।

आज  मेरा कल , फिर लौट कर आया ।  था वो ख्वाब  ही  , मगर आनंद बहुत आया ।  वही सुरूर वही उमंग ,  वही मस्ती भरे पल जो , थे कभी जवानी में ।   कब रात गुजारी , कुछ मालूम ही नही हुआ ।  ख्वाब टूटा , दिल फिर वहीं लौट आया , अपनी तन्हाइयों में । आज फिर मेरा कल लौट कर आया ,  था ख्वाब ही , मगर आनंद बहुत आया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हर किसी ने अपना वक़्त ही तो गुज़रा है , हमारे साथ ।

हर किसी ने अपना वक़्त ही तो गुज़रा है , हमारे साथ ।  एक हमारा वक्त अभी भी वहीं ठहरा है ,  किसी के इंतजार में ।  हो कोई अपना , जो समझ सके मेरे जज्बात को । बरना खेलने वाले तो कई थे , जो मेरे दिल से खेल कर चले गए ।  मगर जख्म हर किसी को दिखाऊं , ये कहां मुमकिन था ।  दिल के बहते लहू को हमने , मज़बूती से रोका था ।  इबादत एक और जुड़ गई थी मेरी इबादतों में । उनकी सलामती की दुआ माँगता ही हर दम ।  जो खिलोने की तरह , मेरे दिल से खेले और तोड कर चले गए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अपने इन लबों से हमें , शिकायत है बहुत ।

अपने इन लबों से  हमें , शिकायत है  बहुत ।  हमारी दिल की जो , ये तुम से कह देते है । वरना तुम्हें मेरे दिल की ,कहाँ खबर होती । के हम तुमसे बे-इंतेहा , मोहब्बत करते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ये कौन सी धारा है , जो मुझे बाहे ले जा रही है तेरी ओर ।

ये कौन सी धारा है , जो मुझे बाहे ले जा रही है तेरी ओर ।  ये तूफान है कैसा जो , मन उड़ा जा रहा है मेरा , तेरी ओर ।  बांध लें इसे अपने प्रेम डोर में , आशाओं का सागर भर जाए ।  रही लालसा जो बर्षो की, वो मेरी  पूरी हो जाये । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यादों में ही बसर कर जाएंगे..

यादों में ही बसर कर जाएंगे,  जिंदगी हम अपनी ।  कभी भीड़ में ,  तो कभी तन्हां रहकर ।  खुश रहना तुम सदा  ,  अपना नया जहाँ बसाकर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

लिख कर दास्तान ए इश्क ।

लिख कर दास्तान ए इश्क । के हम , सारे आम , बदनाम हो गए ।  न आये वो , अब तलक । हम अपनी सारी उम्र ,  उनके नाम कर गए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बहुत आरजू थी मरने की ऐ दोस्त !

बहुत आरजू थी मरने की ऐ दोस्त !  हाल ए उल्फत कुछ यूं हुए । हम अपनी , आखरी साँसों तलक । उनका ही , इंतज़ार करते रहे । कब जाने वक्त गुजरा , देखते ही देखते । इसी इंतज़ार में , हम बहुत जी लिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

न जाने अब , कब मुलाक़ात हो ।

न जाने अब , कब मुलाक़ात हो । इक मदहोश यादें है , तुम्हारी इस दिल में । तेरे होने का जो , अहसास कराती है । बुझा था यह दिल का दीप , रोशन तूने इसे किया । मेरे सूने जीवन मे तूने प्यार का रंग भर दिया । अब तो मुश्किल हो गया है , रहना तेरे बिगैर , न जाने तूने , ये क्या जादू कर दिया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कैसे रहूंगा मैं तेरे बिना..

कैसे रहूंगा मैं तेरे बिना , कैसे रहूंगा कैसे रहूंगा ।  तेरी याद पल पल , जो आएगी मुझको । इस दिल को मैं , क्या कह के कहूंगा ।  कैसे रहूंगा कैसे रहूंगा.. तेरी याद पल पल , जो आएगी मुझको ।  वो पल वो लम्हे , जो साथ गुजारे ।  गुलाबों की कलियां , सा चेहरा तुम्हारा ।  तेरे तन का छुआ , जो मन को लागे ।  सांसों में सामिल है , जो खुशबू तेरी ।  दिल मे बसी है , जो सूरत तेरी ।  दिल से उसे मैं , कैसे भूलूंगा ।  तेरी याद पल पल , जो आएगी मुझको ,  इस दिल को मैं क्या कह के कहूंगा ।  हाथों में मेरे , तेरा हाथ का होना ।  वो चंचल तेरे पैरों की शरारत ।  वो झुकती निगाहे , वो दिल का खोना ।  विन मेरे , तेरी वो बेचैन रातें । पाया मुझे फिर , तेरा खुश होना ।  इस दिल से उसे मैं , कैसे भूलूंगा । कैसे भूलूंगा ।  कैसे रहूंगा मैं तेरे बिना , मैं कैसे रहूंगा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जिंदगी न जाने कब , साथ छोड़ जाए ।

जिंदगी न जाने कब , साथ छोड़ जाए ।   इसलिए जब तक साथ है , जियों प्यार से ।   ये जिंदगी दुबारा नही ,  मिला करती है । होगी किसी से मोहब्बत तो , निभाने का दम रखना । जिन्दगी में मोहब्बत , नाशिबों से मिला करती है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तू मेरी प्रेरणा बनकर , मेरे गीतों में ढली ।

तू मेरी प्रेरणा बनकर , मेरे गीतों में ढली ।  बनकर तू कोयल , मेरी वाणी में पली । पाँवों बनकर तू मयूर , मेरे नृत्य में ढली ।  राधा बनकर तू मुझे निहारे ,मन तेरे छवि किशन की बनी ।  बनी चाहत पक्षी चातक जैसी , तज्यो प्राण संग मन में ठनी ।  अमर प्रेम यह जीवन का , बर्षो से यह रीत चली । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ घाव जिंदगी के भरे , कुछ खुले पीड़ा सहने को ।

कुछ घाव जिंदगी के भरे ,  कुछ खुले पीड़ा सहने को । कुछ हर्ष लिए , कुछ खट्टे-मीठे , एहसास जिंदगी के । लालसा लिए वो ,  जिसका न रहा मुकद्दर , है दर्द यही । क्यों तृष्णा में मन बने मृग , कदाचित हो भाग्य यही ।  दुख-सुख अनुभूति हृदय का , हृदय ही शत्रु -मित्र है जीवन का । अंकुश लगे इस पर जो , न करे ये फिर अपनी मनमानी । बना फिर क्यों न रहे , संतुलन जीवन का । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मेरी ख्वाबो के सफर की , तूम हमसफ़र हो मेरी ।

मेरी ख्वाबो के सफर की ,  तूम हमसफ़र हो मेरी ।  मेरे राह ए मोहब्बत की ,  हम नशीं हो तुम मेरी ।  सुन अफसाना , मेरे ख्वाबों का ।  रहती है तू ही संग मेरे , हर रोज ।  मेरे ख़्वावों की दुल्हन बन कर ।  रहती है कभी तेरी तो , कभी मेरी गोद , इक दुझे का , सिरहाना बनकर । मेरी ख्वाबों के सफर की ,  तुम हमसफर हो मेरी ।  मोहब्बत कोई गुनाह नही ,  यह खुदा की दी हुई ,  पाक रहमत है । हो जाये जो किसी से तो , यह खुदा की रहमत है । मेरी ख्वाबो के सफर की ,  तूम हमसफ़र हो मेरी ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

इन हवाओं से , इन फ़िज़ाओं से ।

इन हवाओं से , इन फ़िज़ाओं से ।  खुश्बू तेरी , आ रही है । आ जा अजा रे ,मुझको ।  याद तेरी , आ रही है ।  इन बहारों की मस्ती ,  देख दिल मचलाया है ।  देखु फिर मैं , ख्वाब तेरे । दिन रैन यूँ  बिताया है ।  आजा आजा रे , मुझको ।   याद तेरी , सता रही है ।  दिल मे हो , तुम दिलदार मेरे ।  तुम दर्पण , नैनों के मेरे ।  छवि तुम्हारी बसी है इसमें , जैसे प्राण बसे हो जीवन में । आ जा अजा रे ... ✍️ज्योति प्रसाद

मालूम न था कि , हम यूँ उनके के लिए बेताब रहेंगे ।

मालूम न था कि , हम यूँ उनके के लिए बेताब रहेंगे । वो अपना भी नही ,और हम उन्हें अपना कहेंगे ।  ये कैसी मोहब्बत है , ऐ मेरे खुदा !  है उनसे  लगाव भी बहुत , मगर दो पल ,साथ रह भी नही सकते ।  सोच भी लूँ उनसे दूर रहने की ,  आंसुओ का सहलाब उमड़ जाता है ।  कुछ पल भी न हो मुलाकात तो ,  दिल बैचैन हो जाता है ।  इक पल भी गुजरना ,  मुश्किल है अब उनके बिना | खुदा जाने यह इश्क , क्या कर जाए , हम दोनों के दरम्याँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वो नफरत पालते रहे उम्र भर , और हम मोहब्बत समझते रहे ।

वो नफरत पालते रहे उम्र भर , और हम मोहब्बत समझते रहे । सुक्रिया उनका आज वो अपनी हकीकत बयाँ कर गए ।  दिल की रावनगियाँ क्या सुनाए तुम्हे जहाँ वालों ,  मेरे दिल ने उनके नाम से अब धड़कना छोड़ दिया ।  अब सुलह भी हो जाये तो मुझे कोई हर्ष नही ,  मैंने अब उनके लिए रोना और मुस्कुराना छोड़ दिया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मुझे तो नींद नही आती है, इक रात ही तो है जो मुझे ।

मुझे तो नींद नही आती है,  इक रात ही तो है जो मुझे ,  मेरे अतीत में जो ले जाती है ।  घूम लेता हूँ मै , अतीत की वादियों में,  थक जाऊं ये मुमकिन कहाँ । दिल में सिमिट आती है , बीते हुए लम्हों की दास्ताँ ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

गम तेरी जुदाई का है या , हसीं हमसे रूठ गयी है ।

गम तेरी जुदाई का है या ,  हसीं हमसे रूठ गयी है । न जाने ये कैसी बेकसी है । प्यार तो तुमसे हम ,  करते ही नही थे । तो क्यों ? हम को ये जहाँ तेरे बिन ,  सुना सा लगने लगा है । बेचैन क्यों है ये नज़र ?   ढूढती है तुम्हें क्यों इधर उधर । न जाने ये कैसी बेबसी है । कोई मुझे तो बतलाओ , क्या प्यार इसी को कहते है ? 🤔 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कश्ती भी अपनी थी और , पतवार भी ।

कश्ती भी अपनी थी और , पतवार भी । अफसोस कि हम , तूफानों का रुख न भाँप सके ।  जद्द-ओ-जहद बहुत की निकलने की मझधार से , मेरी तमाम कोशिशें नाकाम हो गयी ।   था तूफानों का जोर बहुत और , पतवार भी हाथ से छूट गयी ।  डगमगाए और छट पटाए बहुत , तूफानों पर कब किसी का ज़ोर रहा ।  डूबे भी तो इस तरह से कि , कोई नामों निशां बाकी न रहा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दिल में बस गयी है तेरी आहे ,संग नैन तेरे नीर बहाए ।

दिल में बस गयी है तेरी आहे , संग नैन तेरे नीर बहाए ।  कैसा है यह बंधन प्यार का , कुछ समझ मे न आए ।  मोहब्बत तुझसे ,  और इश्क छुपता नजर आए ।  कैसा यह बंधन प्यार का ,  कुछ समझ मे न आए ।  कभी ख़यालों में तू आती है ,  खामोश हो कर ।  कभी इज़हार ए मोहब्बत ।  दासताँ ए हकीकत क्या है ?  तेरे मेरे ।  कैसा है ये बंधन प्यार का ,  कुछ समझ मे न आये । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ खामियां मेरी भी रही , कुछ तुम्हारी भी ।

कुछ खामियां मेरी भी रही , कुछ तुम्हारी भी ।  फर्क सिर्फ इतना था कि, तुम जीत गए और हम हार गए ।  हो भी अब सुलह तो , वो अब बात कहाँ ,  तुम तो हमसे अपनी , दिल ए ख्वाइस भी तोड़ गए ।  वक्त से गिला है मुझे , तुझसे सिकवा क्यों करूँ ।  हम तुझ पर से अपना , हक नामा भी खो गए ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कभी राहें वफ़ा थी उनकी , हमसाया बनकर ।

कभी राहें वफ़ा थी उनकी , हमसाया बनकर ।  न जाने ऐसा कौन सा मोड़ आया कि , हमसफ़र बदल गया ।  माना कि हम लाचार थे चलने में दो कदम , मगर कभी तो साथ चले हमकदम बनकर ।  इतने बे-रुख हुए वो हम से , उनको हमारी वफाओं ख्याल भी न आया । अब आजाद है वो , बहुत हमने जिरह कर ली ।  न मेरे दिल की , कोई गवाही  काम आयी , न सबूत मेरे जज्बातों के  । कर लिए फैसले उसने ,  अपने ही हिसाब से । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मत पिला तू इन आँखों से मुझे , शराब-ए मोहब्बत ।

मत पिला तू इन आँखों से मुझे , शराब-ए मोहब्बत । कहीं बहक न जाऊं मैं तेरे प्यार में , कुछ तो ख्याल कर पिलाने से पहले ।  कही सहारा न बन जाये  कंधा तेरा मेरे सहारे के लिए । कहीं बहक न जाऊं में तेरे प्यार में , कुछ तो ख्याल कर पिलाने से पहले ।  मत पिला तू मुझे और शराब-ए मोहब्बत , अपनी इन आँखों से ।  कहीं मैं बेहोश न हो जाऊं इतना कि ,  तेरी गोद हो जाये सिरहाना मेरा ,  उम्र भर के लिए  । कहीं बहक न जाऊं मैं तेरे प्यार में , कुछ तो ख्याल कर पिलाने से पहले ।  कहीं तेरा अंचल ही न रह जाए बन कर , ओढ़नी मेरी ,उम्र भर के लिए । मत पिला तू इन आँखों से मुझे ,शराब-ए मोहब्बत । तेरे गेशुओं की गिरफ्त में कहीं , गिरफ्तार न हो जाऊं मैं त-उम्र , दिल के तेरे खूब सूरत , कैद-खाने के लिए । कहीं बहक न जाऊं मैं तेरे प्यार में , कुछ तो ख्याल कर पिलाने से पहले ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हुज़ूम बेशूमार है यहां , फिर भी तन्हां हूँ मैं ।

हुज़ूम बेशूमार है यहां , फिर भी तन्हां हूँ मैं । ढूंढती है ये नज़र हर नज़र , थक सी गयी अब । मिला नही कोई हमनवाज़ अब तलक । आये जो मेरी तन्हाइयों में , ख़लल बन जाने को । रही तलास हमकदम की हर उस रहगुजर में , था कारवां जिस रहगुजर में । मिला न कोई हमनशीं ,अब तलक । जो चले साथ मेरे , मेरा हमकदम बनकर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वफ़ा से निभाये हमने रिश्ते , सिला ये जो मिले ।

वफ़ा से निभाये हमने रिश्ते , सिला ये जो मिले ।  क्या खूब मिले ये जो भी मिले , रहा जो मुकद्दर ।  जो भी मिला रंज ओ गम ले लिया । हमने कुछ नही मांगा कभी ,तलबगारों की तरह ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आशाओं की इक , किरण दिखी है ।उस किरण का , तेज बन जाना तुम ।

आशाओं की इक , किरण दिखी है । उस किरण का , तेज बन जाना तुम ।  उनकी सांसों में बन , सुगंध मधुबन की । सदा महकते रहना तुम ।। बसा ले वो तुम्हें , अपने मन-जीवन में । बदरा बनकर , प्रीत बरसाते रहना तुम । तरुणाई बन , उन कलियों में छा जाना तुम । मन आंगन का श्रृंगार बन यूँ  तुम,  प्रफुलित हो उठे जो उसका मन  । नैनों की "ज्योति" बन कर ,  सुलभ राह दिख लाना तुम । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अब क्या हाल है ? उतरा हो नशा ,मोहब्बत का तो ,कुछ कह डालो ।या अब भी वो ही, विचार है ?

अब क्या हाल है ? उतरा हो नशा , मोहब्बत का तो ,कुछ कह डालो । या अब भी वो ही, विचार है ? कहा था , संभल कर चलना । घर के बड़े बुजर्गों ने । ठोकर न खा जाना  , बहुत पथरीले है रास्ते, जिंदगी के । न सुनी एक भी , करते रहे अपनी ही मनमानी । लो बेटा ! भुक्तों अब , करते रहो खींचातानी । बताओ तो अब ,और क्या विचार है ? इतनी ठोकरें बस है , या और खानी बाकी है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ना सोचना कि ,हम कभी रूठ जाएंगे .

ना सोचना कि , हम कभी रूठ जाएंगे ,  ये दिल की मोहब्बत है , मरते दम तक निभाएंगे ।।  ये बात अलग है के कभी , हालातों से समझौता भी , कर ना भी पड़ जायेगा ।  यह रूहानी मोहब्बत है हमारी ,  खामोश रहकर ही हम । इक दूजे के दिलों में , एहसास ए मोहब्बत जाएंगे ।।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ख्वाबों का क्या , वो तो आते और जाते रहते है ।

ख्वाबों का क्या , वो तो आते और जाते रहते है ।  है हकीकत क्या तेरी मेरी , यह हम जानते है । प्यार पाना ही नही खोना भी है ,  सच्ची चाहत वाले , खोने से कहां डरते है ।  अपनी चाहत को सीने में दफन कर मरते है । तेरी अदाओं का मैं दीवाना इस कदर हुआ , भुला के गम अपना मैं मस्ताना तेरा हुआ । बहारें जब भी आएंगी , यादें वो हमारी पहली मुलाकात की ।  होंगे हम ख़यालो में तेरे , तुमको भी गुजरे लम्हे याद आयेंगे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

न करो तुम , इकरार ए मोहब्बत ।तेरी चेहरे पर हमने इक ,कशिश देखी है ।

न करो तुम , इकरार ए मोहब्बत । तेरी चेहरे पर हमने इक , कशिश देखी है । कुछ कहने को , खुलती जुबाँ  बंद देखी है । हुए तैयार हम तेरे कूचे से ,  होने को रुख़सत । अश्कों की कतारें तेरे चेहरे पर , हमने तेरी बंद पलकें देखी है । अब न करेंगे हम ,  कोई शिकवा तुमसे । है मोहब्बत तुम्हें हमसे , इकरार ए मोहब्बत की आज , हमने , तुझमें बेबसी देखी है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सोचता हूँ के वो मुकद्दस रात , कैसी होगी ?

सोचता हूँ के  वो मुकद्दस रात , कैसी होगी ? होंगे रूबरू , जब हम उनके । वो फूलों की सेज़ पर , घूंघट में बैठी होगी । हल्के से जब मैं , उसका , उठाऊं घूंघट। सोचता हूँ के  वो मुकद्दस रात , कैसी होगी ? होगी उनकी , नज़र मेरे चेहरे पर। मेरे दिल के , धड़कने की , रफ्तार फिर ,क्या होगी ? होंगी सरगोशियां , कुछ करीब हो कर । झिझक शायद फिर , कुछ कम तो होगी । सोचता हूँ के  वो मुकद्दस रात ,कैसी होगी ? ✍ज्योतिप्रसाद

बिछाई है हमने , अपने दिल की सेज यार ..

बिछाई है हमने ,  अपने दिल की सेज , यार तेरी खातिर ।  बे सब्र है हम तुझ से ,  इक मुलाकात की खातिर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सूरत ए हाल , ये हुश्न ! क्या बयाँ करूँ अब ?

सूरत ए हाल , ये हुश्न ! क्या बयाँ करूँ अब ?  तेरे दम से ही निखरा है  , निखार मेरे इश्क का । अपने रहमतों में हमको यूँ ही बनाये रखना ।   भूल चुके है हम गम अपने , वो सफर बेकसी का । तुम से ही हासिल हुआ है , मुझे ये मुकाम मेरी खुशी का । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

न कोई रुसवाई होगी , ना कोई हया होगी ।

न कोई रुसवाई होगी , ना कोई हया  होगी ।  मेरी मोहब्बत में , वफ़ा ही वफ़ा होगी । न कसमें होंगे , न कोई वादे होंगे । मेरी मोहब्बत के , नेक इरादे होंगे । हो यकीं जो तुम्हें , मेरी मोहब्बत पर ।  नज़र उठा कर , एक नज़र हमें देख लेना । समझ जाएंगे हम तेरी , खामोश लबों की  जुबाँ । तुम्हें जुबाँ से फिर , कुछ कहने की जरूरत न होगी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

समझ पाओ तो , यह अल्फ़ाज़ मेरे ।

समझ पाओ तो ,  यह अल्फ़ाज़ मेरे । हकीकत बयाँ ,   कर रहे है मेरे ।  कि जी रहा हूँ मैं ,  तेरी पन्हों में । एहसास ए इश्क , पाया तुम्हीं से ही ।  वरना कहाँ ,  बजूद होता मेरा । इस बे-रहम जमाने में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जिक्र ए वफ़ा हो जब , महफ़िल में तेरी ।

जिक्र ए वफ़ा हो जब , महफ़िल में तेरी ।  खुदा की कसम , हमें ही तुम पाएंगे ।  मेरी मोहब्बत की , पहचान ही  कुछ और है । हम सबसे अलग ही , तुमको नज़र आएंगे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

उम्मीद अश्क बनकर , न बह जाए जो ।

उम्मीद अश्क बनकर , न बह जाए जो ।  तो सुना है इंतज़ार ,बहुत सकून देता है ।  हर पल का , वो हिसाब बेताबी का ।  इक मुलाक़ात में , पूरी कर देता है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जो खुशी मिली है मुझको , वो मैं कैसे तुझे बताऊं ।

जो खुशी मिली है मुझको , वो मैं कैसे तुझे बताऊं ।  छुपा के रखा है सनम प्यार तेरा , वो  प्यार मैं कैसे तुझे इस हाल में बताऊं ।  हाल ए दिल सुनाऊं तुझे कैसे , वफ़ा पर मेरी शक न कीजिये ।  बन शबनम , अश्क पलको में ही रहे ।  दबी दबी सी मोहब्बत लाया हूँ , मैं तेरे लिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मुझे तुम समझ पाए , यह तेरी मोहब्बत है । तुम्हें मैं समझ पाया , यह मेरी मोहब्बत है ।

मुझे तुम समझ पाए , यह तेरी मोहब्बत है ।  तुम्हें मैं समझ पाया , यह मेरी मोहब्बत है ।  फर्क सिर्फ इतना सा है , इज़हार ए मोहब्बत ।  इक खामोशी की अदा और , इक अदा ए बयान है ।  है मोहब्बत हमारी , जल बिन मछली की तरह ।  यह एहसासों में इक दूजे के , राधा-किशन की तरह ।  दिल का प्रीत हूँ मैं , प्रीत का दिल है तू ।  हमरा प्यार है दिल से दिल का । तलास नही है हमें , किसी साहिल की । इक मस्त-मलंग मुसाफिर की तरह । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

छलक जाए न , नीर मेरे नैनो का ।

छलक जाए न , नीर मेरे नैनो का । कभी हमसे दूर न रहना ।  मेरी दिल की वादियों में ,  यूँ ही  हर पल  , आते जाते रहना । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जिंदगी से अब मुझे , कोई सिकवा नही है ।

जिंदगी से अब मुझे , कोई सिकवा नही है ।  प्यार से भी प्यारा मुझे , मेरा दिलवर मिल गया ।  हुआ है जिसे मेरे , दर्द ए दिल का एहसास ।  वो हमदर्द मुझे , मेरा वो खुदा मिल गया ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

फिक्र क्यों करें हम कि, कल क्या होगा ?

फिक्र क्यों करें हम कि,   कल क्या होगा ?  आज को बेहतर जिया जाए ,  कल जो होगा देखा जाएगा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सकून ए जिंदगी , खाक हुई अब ।

सकून ए जिंदगी , खाक हुई अब । जीने की तमन्ना खुद से ,  हम दूर कर गए ।  हसरतों का अब ,   उठने को है जनाजा ।  दफन हम अपनी हर , आरजु कर गए । 💔 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ज़ख्म पुराना भरा भी न था कि , फिर इक ज़ख्म और मिल गया ।

ज़ख्म पुराना भरा भी न था कि ,  फिर इक ज़ख्म और मिल गया ।  कम वक्त दिल है ,  समझाए समझता ही नही ।  मंज़िल है वो किसी और की । फिर भी आरजू उनकी ही , किया करता है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

खता हो गयी , मुझसे क्या ?

खता हो गयी , मुझसे क्या ?  जो इस कदर तूने , खुद को कोस लिया ।  यह था प्रेम मेरा,   जो तुमसे इस कदर मैं बोल गया ।  चाहत दिलों कभी छुपाई नही जाती ,  यह वो आग है जो लग जाती है ,  इसे कभी लगाई नही जाती ।  हमने खुद को तेरे हवाले ,  सारे आम कर दिया ।  अब तुम पर ,  फैसला है मेरे गुनाहों का ।  हमने अपना नसीब , अपनी आरज़ू तुमको बना लिया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अब क्या बताऊँ मैं तुम्हें , ऐ दोस्त !

अब क्या बताऊँ मैं तुम्हें ,   ऐ दोस्त ! मेरे गम ए सबब ।  बस जख्म पुराना था, और दर्द नया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

किसी के ख्यालों में डूब जाना ,क्या ऐसा होता है ?

किसी के ख्यालों में डूब जाना ,क्या ऐसा होता है ?  यह जिंदगी में , पहली बार जाना है ।  इक खास नशा सा हो जाता है ,  बैठ जाता है ,कोई दिल की गहराईयों में इस कदर । धडकनों का , साथी बनकर । महसूस होता है जैसे वो हो , मेरे लहू के हर कतरे पर ।  जिसके बिना मेरी , सुबह नही होती । और शाम मेरी , खुशगवार नही होती I  किसी के ख्यालों में डूब जाना , क्या ऐसा होता है ?,  यह जिंदगी में , पहली बार जाना है ।  हवाओं का छूना मेरे चेहरे पर ,  और उनकी , सांसों का अहसास होना ।  मेरे पलकों पर , चिपके अश्कों की बूंदों का , उनकी पलकों पर घिरे , शबनम का दिखना ।  मेरे मुस्कुराते होंठों में , उनके हसीन लबों का सामिल होना । किसी के ख्यालों में इस कदर  डूब जाना , शायद इसी को मोहब्बत कहते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अजीव दास्ताँ है , हमारी मोहब्बत की ।न पाना चाहते है , न खोना ही ।

अजीव दास्ताँ है , हमारी मोहब्बत की । न पाना चाहते है , न खोना ही  ।  मोहब्बत बेपनहां है , दिलों में एकदूजे लिए ।  बताना भी चाहते है, और छुपाना भी ।  अजीव दास्ताँ है , हमारी मोहब्बत की .... ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

हो कभी हालात कि, मैं ग़ज़ल न लिख पाऊँ ।मेरे मन की बात ,मेरे मन ही रह जाये । मेरी

हो कभी हालात कि, मैं ग़ज़ल  न लिख पाऊँ । मेरे मन की बात ,मेरे मन ही रह जाये । मेरी आँखों से , मेरी बेबसी पढ़ लेना ।रखना मुझे तू , अपने प्यार की छाओं में ।  आदत हमें जो है तेरी , मेरी आदत को , अपनी आदत बना लेना । हो जाऊं मैं बैचेन , और कुछ न कह सकूं ।  मेरे जज्बात मेरे ख्यालात, मेरे अश्कों में पहचान लेना । लेकर मुझे तुम अपनी बाहों में ,  मेरा सर तुम  अपनी उंगलियों से सहला देना । ✍️ज्योति प्रसाद

तेरे प्यार के सहारे है हम उम्र भर , जिंदगी में तेरी ही कमी थी ।

तेरे प्यार के सहारे है हम उम्र भर , जिंदगी में तेरी ही कमी थी ।  हुई अब तलास खत्म , जो उम्र भर रही  ,  खत्म हुई अब , आंखों में जो नमी थी ।  रब से दुआ मांग कर ही तो, तुम सा प्यार पाया है ।  निभाउंगा वफ़ा तुमसे , आखरी दम तक ,  बड़ी सिदतों से तो , तुम सा यार पाया है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तू क्यों उदास होता है , "प्राणी"वक्त वक्त की बात है ।

तू क्यों उदास होता है ,  "प्राणी" वक्त वक्त की बात है । यह जीवन है ,  कभी मेले है ।  तो कभी ,  हर कोई अकेले है ।  आज बारी तेरी है ,  कल बारी उसकी है ।  तकदीर के आगे ,  "यहां"  चलती किसकी है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यूँ ही रफ्ता रफ्ता , गुजर जाएगी जिंदगी ।

यूँ ही रफ्ता रफ्ता , गुजर जाएगी जिंदगी ।  सिसकियों से भरी , किसी की याद में ।  सहारा न जाने कब तलक का , जिंदगी !  न जाने कब , साथ छोड़ चली जाएगी ।  न जाने कौन सी , करवट ले ले वक़्त ।  आ सो जायें , मस्त नींद हम । न जाने कब , फिर ऐसी रात आएगी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तेरी दर्द ए दास्ताँ , अलग तो नही है , मेरी दास्ताँ से ।

तेरी दर्द ए दास्ताँ ,  अलग तो नही है ,  मेरी दास्ताँ से ।  फर्क शायद ,   इतना सा रहा ।  हम घुटते ही रहे ,   दिल ही दिल में ,  तुम बयाँ कर गए ।  बेहतर है ,  जज़्ब कर लेना ,  अश्कों को ।  अब कहाँ कोई,  हमदर्द यहाँ ।  हर कोई दे जाता है ,  इक दर्द नया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वफ़ा है तुम्हारी चुम्बन में , सुख है तेरी आगोश में ।

वफ़ा है तुम्हारी चुम्बन में ,  सुख है तेरी आगोश में ।  मिले है दिल दिल से ,  अजीब सी लहर छाई है ।  इक कशिश है तेरे छूने में ,  ये महसूस किया हमने ।  रहे हम अब तलक महरूम ,  जिस मोहब्बत से ।  बड़ी वफ़ा से वो मोहब्बत ,  दी है हमें तुमने । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आशाओं का दामन थाम रखा है ..

आशाओं का दामन थाम रखा है , दिल में तुम्हारा ही नाम लिख रखा है । है तुमसे मोहब्बत हमें यह , हमने जमाने से छुपा रखा है । ✍️ज्योति प्रसाद प्रसाद

वो दिन कभी न आए ...

वो दिन कभी न आए , के तुम हमसे रूठ जाए । होगी वो घड़ी आखरी जीवन की , जो ये दिल तुझे कभी भूल जाए । लो चले अब ख्वाबों के शहर , शायद कोई ख्वाब पूरा हो जाए । राह ए मंज़िल , मिले या न मिले । पा ही लेंगे , मंज़िल को हम । बस मंज़िल का , पता हासिल हो जाए ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मालूम नहीं के यह डगर , कहां ले जाए मुझे ।

मालूम नहीं के यह डगर , कहां ले  जाए मुझे । सफर है कठिन बहुत  , और मजिल तेरे प्यार की । इक तलाश थी जिंदगी, हासिल हो खुशी दिल की । नहीं हो तुम नसीब में , फिर ये इश्क ,क्यों हुआ बेवजह । क्यों बस गए हो तुम इस दिल में , मेरे दिल की , धड़कनों की जगह । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यह मेरी ही वफ़ा का सिला , मिला हो मुझे शायद ।

यह मेरी ही वफ़ा का सिला , मिला हो मुझे शायद । के तुम लौट आये मेरे पास । छोड़ो , अब गीले शिकवे । बताओं कैसे जिये तुम ,  मेरे बगैर । अस्कों को पिया हमने ,  तेरी याद में जो बहे । कहीं कोई पूछ न ले , सबब मेरी उदासी का । छुप छुप कर , बहुत रोये हम । अब न जाना मुझसे ,  कभी रूठ कर तुम । जी नही पायेगा अब ,  यह दिल मेरा तेरे बगैर । इस दिल की , धड़कन हो तुम । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

है दूर तो क्या ? फर्क इतना सा है अब वो नज़र नहीं आते ।

है दूर तो क्या ?  फर्क इतना सा है , अब वो नज़र नहीं आते । बुना करते थे जिसमें हम , अपनी मोहब्बत का घरौंदा । बिखर गए है ख्वाब वो , अब वो ख्वाब  नहीं आते । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

नया जीवन सृजन हार हुआ ।

नया जीवन सृजन हार हुआ ।  किसी अजनबी से मुझे प्यार हुआ ।  रहेगी मुस्कुराहट मेरे जीवन की वो,  मेरे स्वप्नों का अब वो संसार हुआ ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बने न ख्वाब के ताबीर में बन्द हो जाए ।

बने न ख्वाब के ताबीर में बन्द हो जाए । जजबात दिलों के दिलो में दफन न हो जाए। आओ तोड़ डाले खामोशी अपनी । कुछ तुम कहो कुछ हम कहें । न जाने कब जीवन की शाम हो जाये । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मेरी चाहत में नही तुझे पाना ।

मेरी चाहत में नही तुझे पाना , बस मुझे तेरा दीदार चाहिए । मिले थोड़ा ही मगर ,  मुझे तेरा प्यार चाहिए । न हो गुफ्तगू बहुत देर तलक, थोड़ा ही सही मुझे तुमसे ,  मुलाकात चाहिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

साफ नजर आता है , उनके रुख से ।

साफ नजर आता है , उनके रुख से । नही है अब चाव उन्हें कोई,  मेरी दोस्ती का । वरना पहले तो कभी ऐसे , अलफ़ाज़ उनके हरगिज़ न थे  । उभर जाए जो दर्द फिर से ,  मेरे मुर्रामत हुए  दिल का । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अगर मेरा दिल तोड़ने से हासिल , तेरे दिल को ख़ुशी हो जाए ।

अगर मेरा दिल तोड़ने से , हासिल ।  तुझे ख़ुशी हो जाए ।  नही करेंगे अब सिकवा हम , कोई तुमसे ।  मेरे सिकवा करने  से जो , तुम्हें कोई गम हो जाये । तुम न कहो तो न सही , एहसास है मुझे कि । न रही अब वो बात ,दोस्ती में न जाने क्यों ? बदल गए हो तुम इस तरह । काश वो बात मुझे भी , मालूम हो जाये ।  आज एहसास हुआ ,क्या होती है दिल ,  लगाने की सजा । काश तुझे भी यह , एहसास हो जाये ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

कितना गुमान था , इस दिल को तेरी मोहब्बत का ।

कितना गुमान था इस दिल को,  तेरी मोहब्बत का । जुबाँ चुप है देख कर , जमाने की रुसवाई से। पढ़ सको तो पढ़ लो ,  मेरीआंखों के शबनम ने । मेरे दर्द ए दिल का , हाल बता दिया  ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मालूम न था कि तुम ,यूँ दबे कदम आओगे ।

मालूम न था कि तुम , यूँ दबे कदम आओगे , मेरे दिल के आंगन में । वरना हम गम अपना , छुपा के रख लेते , किसी सुनसान राहों में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मैं कुछ कहूँ तो नाराज न होना ।

मैं कुछ कहूँ तो नाराज न होना , बस दिल है इसे ही , रह गया अब मनाना । इरादा तो बना लिया है हमनें , तेरी महफ़िल से है अब लौट जाना । न रही बात अब वो , न कशिश ही रही कोई  । न बजूद ही रहा  मेरा अब, दिल में तेरे किसी तरह । न खालिस ही रही है अब , मोहब्बत में किसी तरह । तन्हाँ के इस सफर में , लड़खड़ाये है कदम माना । धड़कनें भी चुप सी , नज़रे है खोई खोई ।  न रही बात अब वो , न कशिश ही रही कोई  ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वक्त की धरोहर से निकल गए जो दिन ।

वक्त की धरोहर से निकल गए जो दिन ,  वो फिर लौट कर नही आते । उम्मीद भी क्या रखे कि , कोई होगा अपना ,इस रहगुज़र में । मिटा चुके है जो हमें , अपने दिल से । उन्हें हम अब कभी , याद भी नही आते । ✍️जय प्रसाद रतूड़ी

ऊम्र का क्या , महोब्बत दिलों से की जाती है।

ऊम्र का क्या , महोब्बत दिलों से की जाती है। मिल जाए महबूबू कोई मन का तो , हुश्न और इश्क जवाँ ही रहती है , फिर जीने तमन्ना और बढ़ जाती है। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

इक ख्वाब देखा था , ये जिंदगी ।

इक ख्वाब देखा था , ये जिंदगी । बने नाशिब के मिले ,  कोई महबूब हमें । हो गुलज़ार , दमन भी मेरा । लो बन गयी तकदीर  के , तुम हमको आन मिले । मिले तुम हमें , खुशबू की तरह । महक उठा है ये  चमन -चमन , ये मन मेरा । सदा जलता ही रहे  दिलों में ,  चिराग़ ए उलफत के । बुझ न पाए कभी ,  तू लौ मेरे दिल की । करेगा प्यार मेरा ,  तूफानों से हिफाज़त  इसकी ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अब न वो कशिश ही रही, न वो जुस्तजू ही ।

अब न वो कशिश ही रही, न वो जुस्तजू ही । अब न वो पहली सी चाहत ही रही उनकी ,  न कोई गुफ्तगू ही । सुना है उनकी महफ़िल में ,अब फ़नकार बहुत है । जलाल होगा उनको , उनकी अदाकारी पर  । जख्मी हुआ है दिल मेरा तो क्या ,  इसमें अभी भी झंकार बहुत है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बहुत सुंदर दिखती होगी तुम तब , जब पानी की बूंदे ।

बहुत सुंदर दिखती होगी तुम तब , जब पानी की बूंदे । बालों से होते हुए , तेरे चेहरे पर आते हुए चमकती होगी ।  भीगा हुआ बदन तेरा , चाँदनी में जैसे नहाया हुआ सा ।  चेहरे पर प्यारी सी , मुस्कान रहती होगी ।  मस्त अल्हड़ होकर तुम जब , बालों को छटकती होगी । बड़ा दिल काश वो , प्यारा नजारा होता होगा । मंद मंद मुस्कान लिए , दर्पण को जब निहारती होगी । होता होगा ख्याल प्रीतम का और , खुद से खुद शरमाती होगी । फिर कोई गीत मनभावन का , जब गुनगुनाती होगी । थिरकते होंगे कदम तुम्हारे ,मन सरगम संग बंदगी होती होगी । काश मैं होता मेहमान वो , तेरे दिल की महफ़िल का , मुझे फिर खुदा से , कोई शिकायत न होती । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

न पूछते तुम मेरे , राज़ ए गम तो अच्छा होता ।

न पूछते तुम मेरे , राज़ ए गम तो अच्छा होता ।  बड़ी मुश्किल से तो , अभी ज़ख्म भरे ही थे ।  चुप से हो जाते सामिल , मेरी तन्हाईयाँ में तो, अच्छा होता ।  लो फिर शुरू हो गया दिल का सिसकना ,  सुर्ख आंखों में शबनम का पिघलना ।  यूँ ही समझ लेते मेरे , हाल ए दिल तो अच्छा होता ।  न पूछते तुम मेरे , राज़ ए गम तो अच्छा होता ।  ऐसा नही कि गम ए दरिया से , गुजना नही आता हमें । देता गर वो साथी साथ मेरा तो , इस गम ए हाल से , हम पार हो जाते ।  चलो सकून है मुझे , अपनी इस दिल की तन्हाईयो में ।  मिलती जो हर खुशी तो, तेरा साथ फिर कहाँ पाते ।  न पूछते तुम मेरे राज़ ए गम तो अच्छा होता ।  चुप से हो जाते सामिल मेरी तन्हाईयाँ , में तो अच्छा होता । ✍️ज्योति प्रयास रतूड़ी

मुझे तुम से , कुछ नही चाहिए ।

मुझे तुम से ,  कुछ नही चाहिए । बस तेरा साथ ,  उम्र भर चाहिए । रहे तुम खुश सदा ,  मुझे तेरा गम चाहिए।  बस यूं रहना सदा ,  करीब मेरे दिल के । मुझे तेरा दर्श चाहिए । आ जाये करीब ,  वक्त की महर हो । लगा के गले से हमें ,  तेरी खुश्बू की महर चाहिए । यूँ तो समय की है,  बिसात ये जहाँ । मुझे तेरे प्यार का इक छोटा सा ,  जहाँ चाहिए । है चाहत तू मेरे दिल की ,  यूँ ही ये बनी रही उम्र भर । मुझे अपनी चाहत की , तुम से उम्र चाहिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वक्त का पता ही न चला ..

वक्त का पता ही न चला , के वो कब गुजर गए  । बड़ा जादू है , तेरी दोस्ती में ऐ दोस्त ! गम बे सुमार थे दमन में मेरे ,  तेरे छूने से ही न जाने वो गम , कहाँ  चले गए  ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दिल के मुआमले में नाजुक बड़ा हूँ मैं ..

 दिल के मुआमले में नाजुक बड़ा हूँ मैं , प्यार का यह प्यासा है । बस जाता है जो इस दिल की  गहराईयों में तुमसा , और कोई नही है । मोहब्बत भी नही तो और क्या है ये ? के तेरे सिवा इससे , और कोई जचता ही नही है । इश्क ही परवान हुए हुश्न की समा पर , परवाने अक्सर मिट जाया करते है  । मिट जाए समा गर परवाने के साथ ही , दुनिया ऐसी मोहब्बत को ही सदा , याद किया करते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मेरा दिल हो तुम , मेरी धड़कनों की आवाज़ हो ।

मेरा दिल हो तुम , मेरी धड़कनों की आवाज़ हो । मेरे मन का गीत हो तुम , मेरे गीत का साज़ हो । दिल ने दिल को चाह ,दिल ने दिल से प्यार किया । भूल गए हम गम अपने सारे , तूने मुझे इतना प्यार दिया । दिल का बंधन प्रीत से ये , ये टूटेगा क्या । जन्मों का है ये साथ हमारा , ये भला छूटेगा क्या । मेरी आरजू हो तुम, मेरे दिल की चाहत हो तुम । कैसे जी लूंगा मैं तुम बिन, मेरे जीवन की रसधार हो तुम ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

रो लेंगे याद बनकर आएगी तू , मेरे अश्कों की कतारों में ।

रो लेंगे याद बनकर आएगी तू , मेरे अश्कों की कतारों में । दिल तड़प उठेगा कराह लेंगे , तन्हां ए नज़्म मेरी नाम तेरा होगा , थी मोहब्बत तू मेरी ,  और न दूजा कोई होगा । न खफा हूँ मैं तुझसे ऐ जिंदगी , बस हैरां हूँ मुकद्दर से । छोड़ चले वो आज हमें , जिन्हें चाह था हमने मुकद्दस से ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मुझ पर इलज़ाम , नज़र अंदाज़ी का ।

मुझ पर इलज़ाम ,  नज़र अंदाज़ी का । बे बुनियाद , है यह तेरा । हम तो इंतज़ार में ही , रहे हर वक्त । के तू आये संग मेरे  । कुछ घड़ी ही सही , एक मुलाकात के लिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

इंतज़ार ए नज़र रखना ।

इंतज़ार ए नज़र रखना , सब्र ए दिल रखना । छट जाएगी एक दिन,  कयामत की यह बदली , दिल मे मोहब्बत कायम रखना । कहाँ चैन हमें भी तेरे बगैर ,  तड़पता है दिल बहुत मिलने को तुमसे  , मेरे दिल पर तुम एतबार रखना ।  ✍️ज्योति प्रयास रतूड़ी

नही है तेरे सिवा "कोई और मेरा"

नही है तेरे सिवा  "कोई और मेरा" तू मेरा दिल है , मैं प्रीत हूँ  तेरा। भूल कैसे जाऊं मैं , "साथ तेरा" वफ़ा से निभाया है , जो तूने "साथ मेरा" तुझ से ही रौशन हुआ , इश्क का वो , बुझता हुआ "चिराग मेरा" मिले कोई राह मोहब्बत की,  हुश्न की वादियों में , तलाशता रहा ये "दिल मेरा"  पाया है सकून मेरे दिल ने , तेरी आगोश में । बना खुश नशीब "ये दिल मेरा" रहेगी चाहत में तू ही  "सदा मेरी" आखरी साँसों , तलक मेरी । नही है आरज़ू में मेरे , कोई और "सिवा तेरे" जियूँ जब तक तेरा ही ख्याल हो , इस "दिल में मेरे" नही है तेरे सिवा  "कोई और मेरा" तू मेरा दिल है , मैं प्रीत हूँ  तेरा। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

चला था खुशियों की तलास में ,

चला था खुशियों की तलास में , मेरा मुकद्दर भी मेरे साथ हो लिया । खुशियां तो मिली नही मगर , इक गम से रिश्ता और जोड़ लिया । इक नजर मेरी थी, इक नजर तेरी थी । आशाओं के समंदर में डूबी जो कश्ती , कोई और नही वो मेरे दिल की थी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

न जाने कब होगा मिलना ,अब तुमसे ।

न जाने कब होगा  मिलना ,अब तुमसे  । शायद हो वो घड़ी, कोई  नशीब में मेरे । मालूम नही की क्या मंजूर है , ऊपर वाले को । पता नही जिंदगी गुजर न जाये, यूँ ही दूर दूर रह कर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जानते हो जब तुम कि ,

जानते हो जब तुम कि , हमें मनाना नही आता । फिर क्यों तुम हमसे , रूठ जाते हो । सीख लेते तुमसे , गुर मनाने के मगर , हमें रूठना नही आता । फिर क्यों तुम हमसे ,  रूठ जाते हो । दिल से चाहते है हम तुम्हें , चलो यह झूठ ही सही । फिर दिल क्यों बे चैन होता है , तुम्हारी खामोशी पर । क्यों रो देता है ये दिल ,  जब इसे आँसू , छुपाना नही आता । जानते हो तुम हमें , मनाना नही आता. .. ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मुहब्बत मिली भी थी ...

मुहब्बत मिली भी थी , और खत्म भी हो गयी ।  बस , अब तो यादों के सैलाब बाकी है ,  आंखों के समंदर  में ।   उनकी जफ़ाओं से हैरान नही हूँ  मैं ,   मेरी वफाओं में  कमी क्या रही  होगी ?  इसलिए थोड़ा परेशान हूँ मैं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वक्त का पता ही ना चला कि..

वक्त का पता ही ना चला कि, करीबियां कब इतनी बढ़ गयी । के उनकी बेरुखी भी अब , दिल को अखरने लगी है , शायद यही ठीक रहेगा कि,  दूरियां ही बनी रहे अब । यही शायद हो उनकी खुशी भी । नही उतरे खरे हम शायद , उनके पैमाने में । कमियां मुझ में ही है बहुत ,  नही है खोट कोई उनके पैमाने में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ऐ सबा जा , उनको मेरा पयाम कहना ।

ऐ सबा जा ,  उनको  मेरा पयाम कहना । वो ना मिले तो ,  उनके शहर को मेरा सलाम कहना । ठहर जाएगी यह सांसे तब तलक ,  जब तलक उनके दीदार ना हो । उस फरिश्ते को मेरी सांसों की ,  रफ्तार बता देना । वो खफा रहे या ना याद करे मुझे , ये हो तो सकता नहीं । फिर भी हम है , उनको यह अहसास दिला देना । ऐ सबा जा , उनको मेरा पयाम कहना । वो ना मिले तो ,  उनके शहर को मेरा सलाम कहना । वो मसरूफ है अपनी , रंग ए महफ़िल में शायद । एक रंग हम भी है , उनकी महफ़िल के , धुंधला ही सही । हमारी हाजरी ,उनके दिल मे लगा देना । ऐ सबा जा,  उनको मेरा पयाम कहना ।  वो ना मिले तो, उनके शहर को मेरा सलाम कहना । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

चला गया तू , कभी न लौट आने के लिए ।

चला गया तू , कभी न लौट आने के लिए । छोड़ गया तू , अपने निशान दिल में मेरे , अपनी यादें दिलाने के लिए । तेरे दम से रही मैं बे-फिक्र , तुझे देख कर करार आ जाता था । होती था जब कभी मैं उदास , तू मनाने आ जाता था । थी रौनक तेरे से मेरे आंगन में , वो बाहर तू ले गया । खुश रहे तू उस दुनिया में , अपनी यादें तू , मुझे उम्र भर दे गया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

राहें इश्क की फ़ना हो गयीं है आज..

राहें इश्क की फ़ना हो गयीं है आज, धुंआ धुंआ सा है  दिल में आज । कह दो न आये वो अब , इस रहगुज़र से । ये राहें अब जाती नही ,  दिल के उस मुकाम पर ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मैं तुम्हें , कभी नही भूल पाऊंगा ।

मैं तुम्हें , कभी नही भूल पाऊंगा । बस तेरी बज़्म से , मैं तो चला जाऊंगा । ढूंढेगी तेरी नज़र मुझे ,  मैं नज़र नही आऊंगा। यादें बनकर तेरे दिल में, रह जाऊंगा । थी चाहत मुझे तेरी मोहब्बत की , वो हासिल मुझे हो न सकी । इक तरफा ही रहा इश्क मेरा , उसको  मैं अपने दिल मे , दफ़न किये जाऊंगा ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

थी गुम-शूम खामोश सी , अब तलक जिंदगी ।

थी गुम-शूम खामोश सी , अब तलक जिंदगी । आप क्या आये , जीने की हसरत जाग उठी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हाल ए उलफत ए दास्ताँ..

हाल ए उलफत ए दास्ताँ, क्या बयाँ करे हम अपनी । उनकी तमनाओं ने , मेरी हसरत को शिकस्त दी है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बेज़ार नही हम तुझसे मेरे मौला , मगर शिकवा जरूर है तुझसे ।

बेज़ार नही हम तुझसे मेरे मौला , मगर शिकवा जरूर है तुझसे । जिन्हें चाहते है हम जी भर कर , काश के उनको मेरे मुकद्दर में,  बनाया होता । यूँ तो जिंदगी के हर पहलुओं में , मुझे तुझसे शिकायत रही है मगर ।  हो जाती यलगार मेरे,  आसुओं की तुझसे अगर ।  जो तूने मुझे मेरे महबूब से,  मिलाया न होता । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

नही चाह था मैंने कि , तेरा ख्याल आये कभी ।

नही चाह था मैंने कि , तेरा ख्याल आये कभी । न जाने आज क्यों , तेरा ख्याल आ गया । अब सहारा ही यादों के है, "शायद"  मिलना अब मुहाल है । जीना मुश्किल है तेरे बिन । हाल-ए-दिल बेहाल है । रह रह के आता रहा,  मैं तेरे कूचे में । कहीं तू मिल जाए मुझे , इक मुलाकात के लिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मिल जाये वक्त तो , मुझे याद कर लेना ।

मिल जाये वक्त तो ,  मुझे याद कर लेना । दिल से नही तो यूँ ही,  बस मुलाकात कर लेना । दिल में हमने तुम्हें ही बसाया है,  इस कदर । के हर तरफ तुम ही तुम,  नज़र आती हो । आ जाएगा चैन मेरी रूह को , अपनी रूह से मेरी रूह में, मिला कर देख लेना । है मोहब्बत तुमको भी हमसे , यह बयाँ तुम, कर के तो देख लेना । खामोश है अभी तक , राहें ये इश्क की । बदल जायेगी तकदीर, हमारी मोहब्बत की । अपने हुस्न को, मेरे दिल की राह में । तुम ज़रा चला के तो देख लेना। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

कुछ तो बात है , ऐ जिंदगी ।

कुछ तो बात है , ऐ जिंदगी । वरना तू यूँ न , बदली बदली सी रहती । न जाने वो क्या बात है ? जो सबब बन गयी है  , मुझसे रूठ जाने की ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जिंदगी क्या आजमाएगी तुझे ।

जिंदगी क्या आजमाएगी तुझे ,  उसे तेरी हैसियत  से , नहीं कोई भी वास्ता । जो खुद है परेशान अपने ही वजूद से दिल ,   जिंदगी, कैसे तुझे सताएगी । बन चुका हो नसीब खुद का ही , जिसका संग आंसुओ के  । जिंदगी भला तुझे कैसे रुलाएगी । ये तो सिर्फ तुझसे तेरी, वफा चाहती है ऐ दिल । जिंदगी ,जो खुद ही घिरी हो ,अंजमस में ऐ दिल ! जिंदगी भला तुझे क्या आजमाएगी । है प्यार जिंदगी का, इक तरफा ही सही ,  मगर दिल को चाहता बहुत है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जिसे जैसा भी मौका मिला ।

जिसे जैसा भी मौका मिला ,  हर कोई मेरे दिल से खेलता ही रहा । कुछ देर ठहर तो जा , अरे ! ओ बे दर्द जमाने । अपने टूटे हुए दिल को , जोड़ तो लूं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

रहे रात भर, उनके आगोश में ।

रहे रात भर,  उनके आगोश में । एक गुल खिला था मेरे ख्वाब में । देखता ही रहा मैं उन्हें ,और वो हमें । जो नही होना था,  वो हो गया । हम भी थे मस्ती में, वो भी थे मस्ती में । और , प्यार हो गया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मेरे ख़यालों ने आज मुझे, सकून की वो रातें दी है ।

मेरे ख़यालों ने आज मुझे, सकून की वो रातें दी है । रहा मैं संग उनके , हसीन पलों की वो बातें दी है । मेरे ख़यालों ने आज मुझे , सकून की वो रातें दी है । रहा मैं संग उनके , हमसफ़र बनकर । वो बिछौना मेरे मन का , वो हसीं शरारतें दी है । मेरे ख़यालों ने आज मुझे, सकून की वो रातें दी है । रहे मदहोश हम दोनों , जाम ए खुमार मोहब्बत में । नाजुक सी पंखुड़िया गुलाब की ,  उनके होठों ने मुझे, वो खुमारी दी है । उतरा नही है नशा ए इश्क , उनके हुश्न का । उनके हुश्न ने मुझे वो , आशिकी दी है । मेरे ख़यालों ने आज मुझे , सकून की वो राते दी है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मेरे ख्यालों में, तुम ही रहती हो ,

मेरे ख्यालों में,  तुम ही रहती हो , इस कदर । कि रहता हूँ खुद से ही , अजनबियों की तरह । ❤️ वो जो ख़यालों में आये , बनके हमसफ़र मेरे । कोई और नही वो ,  सिवा तेरे  । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तन्हाइयों से पूछा मैंने अक्सर ।

तन्हाइयों से पूछा मैंने अक्सर ।  क्यों याद ले आती है तू उनकी ? जिसे मेरी याद कभी आती नही । भरे गले से तन्हाई बोली ,  नही तू उनके जहन में इस कदर । के तुमको वो याद करे । वो तो हवा के झोंके थे , वक्त तेरे संग मुलाकात के ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ तो करीब है उनसे ।

कुछ तो करीब है उनसे , हम ही दूर हुए तकदीर । दिल में ही बसा कर,  हम रखेंगे उन्हें । ख्वाबों में पास आ कर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ तो बात है ,उनकी ख़ामोशी में।

कुछ तो बात है ,उनकी ख़ामोशी में।  वरना वो, यूँ न खामोश रहती । खोल देते वो काश, राज़ ए उलफत। दिल  में फिर हमारे , कोई उलझन न होती। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दिल से न जुदा होने देंगे प्रीत तेरी ..

दिल से न जुदा होने देंगे प्रीत तेरी ,  दिल में बसा के रखेंगे हम प्रीत तेरी ।  याद तेरी आती है बहुत , जीना दुस्वार हो जाता है ।  तुमसे मुलाकात को यह दिल,  तड़प जाता है । हो जाती है गुफ्तगू तुमसे जब,  हो वो थोड़े ही । करार आ जाता है , दिल को हो वो थोड़े ही । हसरत है दिल की , कुछ ऐसा हो जाये । आरजू हो जाये पूरी जो,  तुम मेरी हो जाये । हकीकत न सही , ख्वाबों में ही सही । तु मेरी दुल्हन हो जाये । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

चांद ही नहीं उगा आज , शब ए गम में ।

चांद ही नहीं उगा आज , शब ए गम में । बड़ी मुश्किल से गुजरी है , आज जिंदगी तन्हाई में । हाल ए दिल देख कर , रोया न गया । बहुत थे अल्फ़ाज़  ए गम,  बेबस ही रहे उन्हें देख कर हम । आये ख्याल उनको, न जाने कब तलक।   की हम भी है , उनके इंतज़ार में।  देखकर उनकी बेरुखी, लौट आये वापस हम।   अलविदा भी हमसे, फिर बोला न गया। हाल ए दिल देख, कर रोया न गया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

गुजरता हूँ अब भी मैं , उन राहों से ।

गुजरता हूँ अब भी मैं , उन राहों से । जहां हमकदम बन कर ,चले थे  तुम संग कभी । शायद मिल जाये वो निशाँ  , हमारी मोहब्बत के । हाँ मौजूद है वो डाली आम की, जिसकी छांव में , वक्त गुजारा करते थे हम कभी ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बढ़ रहे है हम , कदम दर कदम ।

बढ़ रहे है हम ,  कदम दर कदम । न मंज़िल ही है ,  न कोई ठिकाना । चले जा रहें है हम , राह ए मोहब्बत में । आहिस्ता आहिस्ता ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दस्तूर ब दस्तूर निभाये जाते है हम ..

दस्तूर ब दस्तूर निभाये जाते है हम , गमों को दफन किये जाते है हम । मिल जाये खुशी थोड़ी सी भी , उसी में ही झूम जाते है हम । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मुलाकातें ही तो सहारा है ,

मुलाकातें ही तो सहारा है , मेरे टूटे हुए दिल का । तुम क्या मिले की , मेरी जिंदगी बदल गयी  । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुझ पर भरोसा है बहुत , ऐ मेरी जिंदगी ।

 तुझ पर भरोसा है बहुत , ऐ मेरी जिंदगी । और तुझसे बिछुड़ने का, डर भी बहुत है । यूँ ही नही आते है ऐसे ख्यालात किसी के लिए ,  तुमसे प्यार इस दिल को बहुत है । मिलकर बिछुड़ना तो, हर किसी को है यहां । जीने के लिये "दिल" तेरी याद बहुत है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कू कू कोयल राग प्यार का गीत मधुर यह गाती है ।

#कू  कू-कू कोयल राग प्यार का , गीत मधुर यह गाती है । बैठी है दूर डाल पर , सबके मन को भाती है । नही बैर इसको किसी से , मस्ती में यह रहती है । कू-कू कोयल राग प्यार का,  गीत मधुर यह गाती है । बसंत अलबेला देखो आया , मस्त फूलों की हर डाली है । चहक रहे पंछी सारे ,  उत्सव बड़ा निराला है । जंगल में है आज मंगल, कोयल रानी आयी है , हुए सब "मंत्रमुग्ध" कू -कू ने ऐसा , गीत प्यार का गया है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ तो कसक है , दिल में भी उनके , मेरे दिल के लिए ।

कुछ तो कसक है ,  दिल में भी उनके , मेरे दिल के लिए । वरना वो हमें मिलने को , यूँ न बेकरार रहते । करके अपना दीवाना वो हमें ,  हमें यूँ न तड़पते । बहुत प्यारी है , उनकी झील सी आंखें । बस उनकी आंखों में रहूँ मैं , उम्र भर यह जी चाहता है । दिल से दिल मिला हो जब तो,  प्यार का अहसास , उम्र भर रहता है । चाहे पास रहें या दूर वो साथी , उम्र भर दिल मे ही रहता है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यदि कभी जुदा हो जाए हम तो ,

यदि कभी जुदा हो जाए हम तो ,  समझ लेना वक्त इतना ही था । फिर चाहे उम्र की मेरी ,  या साथ आपका  । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अब लौट के जाना, मुमकिन नही ।

अब लौट के जाना, मुमकिन नही । "दिल ए गुलज़ार !" बहुत सकून है यहां तेरी , मोहब्बत की छांव में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कायदे कई थे मेरे , मेरी जिंदगी के पन्नों पर ।

 कायदे  कई थे मेरे ,  मेरी जिंदगी के पन्नों पर  । उनमें से कुछ रह गए ,  कुछ बिखर गए । हब ए दस्तूर ही है अब ,  रंग ए महफ़िल में ।  मेरा जाना और मुस्कुराना ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

गर्दिश ए हाल , थोड़ा उठ तो जा ।

गर्दिश ए हाल , थोड़ा उठ तो जा । देख तो सही के , तकदीर में तेरी , और लिखा क्या है ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वफ़ा सिर्फ नाम ही रह गया है ।

वफ़ा सिर्फ नाम ही रह गया है ,   इस रहगुज़र में । मोहब्बत में हमकदम कहां कोई, चलता है आजकल  । थक जाते हुए कदमों को, छोड़ देते है वो ही अक्सर । जिस पर हमें ,हमकदम होने का । गुमान होता है अक्सर । ✍️ज्योति पर रतूड़ी

कुछ हालात ही बन गए है इस कदर ..

कुछ हालात ही बन गए है इस कदर , कि हम अब उनसे कुछ कह नही सकते । भूल भी कैसे जाएं हम उन्हें , दिल ए फिरदौस ए गुल वही तो है , ये भी हम उनसे कह नही सकते । कल ही कि बात है अभी तो , नज़रअंदाज़ हुए हम । शायद यह आगाज हो , खिंज़ा ए बाहर का मोहब्बत के,  इस गुलिस्तां में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कोशिशें कर के देख तो ज़रा ।

 कोशिशें कर के देख तो ज़रा ,  बढते कदम को जो रोक न सके । सुना है कुछ कर गुजरने से ही ,  इश्क में मंजिल मिला करती है। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

🤔आपको देख के लगता नहीं कि आप ऐसी बातें भी करते होंगे?

 🤔आपको देख के लगता नहीं कि आप ऐसी बातें भी करते होंगे? 👦अब आपको क्या बताऊं मैं , कभी जवानी के दिनों में , शायरी का शौक रखता था मैं । वही शौक मेरा ,आज मेरे काम आ गई । बड़ी मुद्दतों से आज यह , मस्तानी शाम आ गई ।।  ❤️मोहब्बत का वक्त ,ओर जोड़ लो उस घड़ी में। जब तुम सिमट रही होगी , मेरी बाहों में । रुक जा अब ये हवा , आग तो भड़का चुकी है । नही रहा अब कोई खौफ दिल मे मेरे , हर खौफ को अब हम जला चुके है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हम ख्यालों की , दुनिया बसाए हुए है ।

हम  ख्यालों की ,  दुनिया बसाए हुए है । तुमको अपना ,  बनाये हुए है । तुम न मानो यह ,  यह बात अलग है । तुम होगी मेरी कभी ,  हम यह "उम्मीद" , दिल में जागये हुए है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मैं क्या मेरी चाहत क्या ?

मैं क्या मेरी चाहत क्या ? होगी उन्हें जिसकी, जुस्तजू ।  "इश्क " वो मुझसे , बेहतर होगा । टूट गए हैं हर ख्वाब , सुन कर हाल ए उलफत । मरहम लगाने वाले ही,  आज जख्म दे गए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मोहब्बत इश्क से शुरू होती है ..

 मोहब्बत इश्क से शुरू होती है ,  और कभी रूबरू रह कर । तो कभी याद बनकर , साथ रहती है । मुझे नही जचता , कोई और तेरे सिवा । बस तू ही मेरे , ख़यालों में रहती है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मचलती है जवाँ दिलों में,मोहब्बत तो क्या ?

मचलती है जवाँ दिलों में,  मोहब्बत तो क्या ? हम भी इश्क में डूब जाने का ,  हुनर रखते है ।😘😘 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

इजहार ऐ मोहब्बत, हमें करना न आया ।

इजहार ऐ मोहब्बत,  हमें करना न आया । उन्हें ही देखते ही , रहे नज़र भर ।। न लव खुले, कुछ कहने को । न नज़र हटी,  चेहरे से । थी ये इक मेरे , ख्यालों की दुनिया । लौट कर जब हम ,वापस आये तो । खुद को हमने , यहाँ तन्हा पाया ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

👧धड़कनों में बसते है कुछ लोग।

👧धड़कनों में बसते है कुछ लोग,  नाम जुबा पर लाना जरूरी नहीं होता । 👨होगा कोई खुश नशीब वो जो , वजह बन जाये ,  तेरे दिल के धड़कने की । हो जाऊं मैं वो खुश नशीब ,  ऐसी तो मेरी तकदीर कहां । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

क्यों ख़यालों में ,बस गए है वो इतना ।

क्यों ख़यालों में ,बस गए है वो इतना । के उन्हें भुलाने की ,तमाम कोशिशें भी , नाकाम हो गईं है । रग रग में है समाये वो ,  ख़्वावो में भी वो ही है अक्सर । इक तरफा ही है यह इश्क मेरा , जिएंगे जब तलक । रहेंगे उन्हीं के ही यार बन कर ,  सांसों की आखरी रफ्तार तलक । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

लौटते हुए कदम मेरे , कुछ घड़ी थम से गए थे ।

लौटते हुए कदम मेरे ,  कुछ घड़ी थम से गए थे । कही आवाज दे दे वो मुझे ,  कह दे दिल की वो बात , अपनी जुबाँ से । था इंतज़ार मुझे , उनकी रज़्ज़ा का ,  क्या में हूँ ?  उनके दिल के , किसी कोने में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कहाँ बस चल हैअपना कि , हो जाये तमन्ना इस दिल की ।

कहाँ बस चल हैअपना कि ,  हो जाये तमन्ना इस दिल की । कि तू मिल जाये मुझको , मेरी आरजू के लिए । आरजू है सीने में , प्यार तेरा पाने को । हसरते ही रह जायेगी इस जन्म, क्या पता फिर , जन्म हो के न हो । 😢😢 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यदि यही बंधन हम, जान पाते ।

यदि यही बंधन हम, जान पाते ।  न इश्क होता, न तन्हाई ही । अब दर्द हो या बेकसी , नजदीकियां , बढ़ती ही जाएंगी । हुनर छुपाने का इश्क , हम जानते नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सोच था इस मुकाम में ।

सोच था इस मुकाम में ,  मुलाकात हो शायद । मगर कहाँ वक्त है , उनके पास हमारे लिए । पूछा भी था कई सवालात,  हमने उनसे । और उनके ,  तबियत ए हाल भी । शायद मुनासिब ,  न समझा होगा उन्हेंने । हमें कुछ , बतलाने की । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यूँ भी कम ही हो गया है ।

यूँ भी कम ही हो गया है , हमारा आना जाना उस ओर । दिल ही दिल में रो लेता हूँ । कभी कभी याद जब , ज्यादा सताने लगे तो । एक आध , फेरा लगा लेता हूँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मानो सदियां गुज़र गईं हो ।

मानो सदियां गुज़र गईं हो, उनसे मुलाकात हुए ,  अभी कुछ ही रोज़ की तो, बात थी । एक छोटी सी, मुलाकात हुए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मेरे दिल की , रुबाई हो तुम ।

मेरे दिल की , रुबाई हो तुम । मेरी शायरी का, आगाज़ हो तुम । तसरुब में बसी है ,जिसकी सूरत । मेरे दिल का वो,  पारवाज हो तुम । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ये चाँद रखना तू , "महफूज़ मेरे महबूब को"

ये चाँद रखना तू  , "महफूज़ मेरे महबूब को" अपने पलकों की छाओं में । "कभी न बिछुड़े हम" सदा रहें हम , इक़ दुजे की बाहों में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

है नम मेरी पलकें के...

 है नम मेरी पलकें के , तुम बहुत याद आ रही हो । दिल से निकल रही आहें ,  और छवि मन में , तेरी उभर रही है । कुछ तो लिखकर भेज के , यह बेचैनी मिट जाए । मेरे तड़पते दिल को , करार आ जाये । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ तो असर है, तेरे संग रहने का ।

कुछ तो असर है, तेरे संग रहने का । वरना ऐसी बात, पहले कहाँ थी । के खिल उठा है, रंग मेरे चेहरे का । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ऐ मेरे बेकरार ए दिल ..

ऐ मेरे बेकरार ए दिल , आखिर तुझे हुआ क्या है ? अभी तो कुछ लम्हें ही हुए , उनसे मुलाकात हुए । और तुझे उनकी याद आ गयी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी आखिर तुझे हुआ क्या है ? अभी तो कुछ लम्हें ही हुए , उनसे मुलाकात हुए । और तुझे उनकी याद आ गयी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दिल ने जज़्ब कर लिया है..

दिल ने जज़्ब कर लिया है, तेरे अक्स को । मिट जाए ऐसा कभी ,  हो सकता नही । इस दिल की धड़कनें, तुम्हारे दम पर है । धड़क जाए यह दिल , "बिन तेरे अहसास लिये"  ऐसा कभी हो सकता नही ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मेरे अश्कों की , कतारों से समझ लो ।

मेरे अश्कों की , कतारों से समझ लो । मेरी चाहत की, गहराइयों को । बंद पलकों में ,रहती है तस्वीर तेरी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बस यही तकल्लुफ़ है मेरे इश्क का ,

बस यही तकल्लुफ़ है मेरे इश्क का , हुश्न इसे दीवाना कह कर बुलाते है । मेरे बीमार ए दिल का इलाज़ है , पास उनके , और वो कि इलाज देने से डरा करते है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कहूँ क्या अब मैं ,दर्द ए हाल एक है ।

 कहूँ क्या अब मैं , दर्द ए हाल एक है ।  फर्क सिर्फ रास्तों का है,  हमारी मंजिल एक है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हर वक्त की हर कड़ी में , शामिल हो तुम ।

हर वक्त की हर कड़ी में , शामिल हो तुम ।  दूर हो तुम मगर , मेरे दिल के करीब हो तुम ।  वेवजह नही ये बेचैन मेरा दिल ,  मेरे बेचैन दिल की प्यास हो तुम । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बेवजह की भी, कोई वजह होती है ।

बेवजह की भी, कोई वजह होती है । वेवजह कभी कुछ,  होता नही ।। कशिश होती है जरूर , तमन्नाओं के समंदर में । न आये उफान तो क्या ,  " लहरें कभी "  साहिल से मिलना , छोड़ती नही है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ऐ जिंदगी बना हूँ, मैं तेरा दीवाना ।

 ऐ जिंदगी बना हूँ, मैं तेरा दीवाना । और तू है कि , चली जा रही है । कभी खामोश सी और , कभी मुस्कुरा रही है ।  जरा ठहर तो सही , आ पास बैठ । कुछ तू अपनी कहो, कुछ हम अपनी सुनाए । आ चलो कही दूर , इक दूजे में खो जाएं ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तेरी इस अंजुमन में , आ तो गए हम ।

तेरी इस अंजुमन में , आ तो गए हम । अब मुझको तुम , संभाल लेना । मुद्दतों से खुश्क ही रहा है ये दिल,  इक़ घुट ही काफी है । तेरे मयकदे से छलके है जाम , और ज़ियादा । पी जाएं कुछ ज़ियादा हम , "जाम ए हुश्न"  तेरे होंठों के प्यालों से । चढ़ जाए अगर कहीं ज़ियादा ,  तो उतार कर लेना। होंगे कई और भी मेहमाँ ,  तेरी इस महफ़िल में । कहीं हम बहक न जाए ,  तेरी इस महफ़िल में । अपना करम मुझ पर, बनाये रखना । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी