हां यही तो तुम्हारी ख्वाइश थी कि , हम गैर हो जाएं । तभी तो हमारी मजबूरियों का तुमने , फसाना बना दिया । गर समझते तुम हमें अपना , तो कब का माफ कर देते । मगर.... मगर तुम ने तो हमारा , बज़्म ए महफ़िल में तमाशा बना दिया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
कुछ गलतफमियां पाल ली है , तुमने अपने जहन में इस कदर । कि चाहकर भी अब हम , खुद को बेगुनाह साबित , कर सकते नही ।। खास तू थी , है और रहेगी , हमारे लिए सदा । रूठ कर तुम गई हो , हम नही ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
उसने कहां था कभी , दोस्त बनते वक्त । मुझे न चाहना कभी बेइंतेहा...! मेरा भरोसा नही , कभी भी छोड़ कर , चली जाऊंगी ।। आज देख भी लिया है और, जी भर रो भी लिया है । सिसकियां भरते रहे हम रातभर , और सोचते रहे यही । के हस्र यही होना था "मलंग" दिल लगाकर उम्रभर रोना था । ये तो होना ही था , हो लिया , हो लिया , हो लिया । .....ज्योति प्रसाद रतूड़ी
हां ख्याल तो बहुत रहा , उनको मेरा बस । मैं ही , बेख्याल निकला । कि उनका किया इंतजार हमने ,बेसब्र होकर । और वो हरजाई सनम , न मिले कसम से । वो बड़ा दगा बाज निकला । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
तुमसे ना हो सकी मुलाकात जी भर , बस यही मलाल रहेगा मुझे उम्र भर । नादान भी तुम इतनी ना बनो, कि तुम जो समझ न सको । दायरे भी है कुछ , खामोशी से गुजर कर । समझ लो दिल की सदा , आहें भी सामिल है इसमें। तू मेरा दिलवर तो नही , मगर तेरे बैगर मेरा , दिल भी तो नहीं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी