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मुझे चलना होगा , चलना होगा

मुझे चलना होगा, हां चलना होगा, अभी खत्म कहां सफर जिंदगी का? तपिश ठंडी न पड़ जाए उमंगों की, मुझे अभी और जलना होगा, हां मुझे अभी और जलना होगा। खैर! अभी तो कुछ बंदिशें हैं मुझ पर, जमाने की रस्मों रिवाजों की। कड़ी जब खुलेगी ये मेरी बेड़ियों की, तो देखना! हम उड़ते पंछी हैं एक दिन, अपनी मौज पा लेंगे। हां मगर हमें तब तक, यूं ही घुट घुट कर जमाने में जीना होगा। ____ज्योति प्रसाद रतूड़ी

रोना चाहूं भी मैं ,मगर...

रोना चाहूं भी मैं, मगर रो नहीं सकता, कुछ दिल में दबा है तूफान, कहीं उमड़ गया तो? मुश्किल होगी। ​किया बहुत कुछ जिंदगी में, खुद को हासिल हुआ ही क्या? आज सुनने में आ रहा है यह— "तुमने किया ही क्या?" ​माना कि हुआ भी होगा, कुछ चूक नादानी में, कौन है वो धुला दूध का? ज़रा सामने तो आ! ​इतना भी निर्दय नहीं था मैं, जो अब— विषाक्त शब्द-स्वरूपा बाण चलाने में न चूक रहे हो तुम। ​दिल पर हाथ रखकर खाओ कसम, कि क्या हकीकत में... बेपरवाह रहे थे हम? ​ — ज्योति प्रसाद रतूड़ी