मुझे चलना होगा, हां चलना होगा, अभी खत्म कहां सफर जिंदगी का? तपिश ठंडी न पड़ जाए उमंगों की, मुझे अभी और जलना होगा, हां मुझे अभी और जलना होगा। खैर! अभी तो कुछ बंदिशें हैं मुझ पर, जमाने की रस्मों रिवाजों की। कड़ी जब खुलेगी ये मेरी बेड़ियों की, तो देखना! हम उड़ते पंछी हैं एक दिन, अपनी मौज पा लेंगे। हां मगर हमें तब तक, यूं ही घुट घुट कर जमाने में जीना होगा। ____ज्योति प्रसाद रतूड़ी