चाहत मैंने बदली थी सिर्फ ,
उनकी चाहत आज़माने के लिए ।
वो भी बदल गए , हमें आज़माने के लिए ।
यूँ ही आज़माते रहे हम , इक दूजे को और ।
एक दूजे से , दूर होते चले गए ।
अब जतन हो , तो क्या हो , पास आने की ।
सोचती हूँ अब के , कैसे फिर सुलह हो ।
हमें इंतज़ार रहा , उनकी पहल का ।
वो करते रहे इंतज़ार , हमारी पहल का ।
अपने ही गरूर में चूर , हम होकर राह गए ।
अब हुआ भान तो क्या , जब उम्र ही निकल गयी ।
कहती हूँ सबसे के , रखना ख्याल रिश्तों में ।
प्रेम बंधन , नाज़ुक होता है बहुत ।
भरोसा इसकी ताकत है ।
इसकी ताकत को , आज़माने की भूल ।
हमारी तरह तुम , कभी न करना ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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