बहुत परेशाँ है अब जिंदगी , उम्र के इस पड़ाव में ।
थकते कदम फूलती सांसे , मानो वक्त मुझसे मेरी ।
जवानी का , हिसाब मांग रही है ।
यूँ तो कर्म बुरे भी नही किये थे कोई खास , जहाँ तक है याद हमें ।
होंगी तो सही कोई न कोई ,नादानियां खामियां शरारत जरूर जो हमें याद नही ।
सज़ा ये शायद मेरे ऐबों की हो , जो अब तक पकड़ कर जकड़े है मुझे ।
लाख कोशिशें की पीछा छुड़ाने की कम वक्त ऐब , धूम्र का छूटता ही नही ।
भला न हो सका मुझसे , कभी किसी का तो न सही ।
दिल से हमने कभी किसी का , बुरा भी न चाह ।
कुछ तो मुनाफा होता मुझे , मेरे इस ख्याल का ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।
वैद्यानिक चेतावनी : धूम्रपान स्वस्थ्य के लिए हानिकारक है ।
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