सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अब बुझने पर आ गया है , उम्मीदों का दीया ।

 अब बुझने पर आ गया है , उम्मीदों का दीया ।

 जब तक टिम टिमाते हो , ऐ दिल ! आशाओं  के दीये ।

 स्वास जब तक  बाकी हो , रहना तो पड़ेगा ही ।

शायद अभी हिसाब मुझ पर , जिंदगी का कुछ बाकी हो ।

ये लाचारी भी तो देखनी , बाकी थी शायद ।

तभी रेंगता ,गिरता और लड़खड़ाता हुआ ।

 सरक राह हूँ , आहिस्ता आहिस्ता ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

 

टिप्पणियाँ