कभी तो पलट लिया करो पन्ने , उदासियों के ।
जब भी देखता हूँ , तुम उन्हीं को ही पढ़ा करती हो ।
क्या याद कर रही हो ऐसा , जो ख़ामोश बैठी हो ।
उठो तो ! देखो बाहर , एक ठहर के बाद दुनिया फिर चलने लगी है ।
गुलशन में , गुलों ने खिलना और मुस्कुराना शुरू कर दिया है ।
तितलियाँ और भवरों को , फूलों ने रिझाना शुरू कर दिया है ।
खग , मृग - वनचर सारे , झूम रहे है मिलकर सारे ।
जलचर भी मस्ती में झूमें रहें है , उठो ! करो तुम भी साहस ।
नए दिन का करो स्वागत , हँस कर मुस्कुराकर ।
अपनी तनहाइयाँ को मिटाकर , गम अपने बुलाकर ।
✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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