इक इंतज़ार ही है तेरा !
बस और कुछ भी तो नही मकसद , अब जीने का मेरा ।
इक बार आ जाओ , तुम्हें तुम्हारी अमानत लोटा दूँ ।
जो रखी है मैंने , दिल में संभालकर ।
तेरी , यादों को बनाकर ।
वो मोहब्बत तेरी , जो रह रह कर मुझे बे चैन किये जाती है ।
बस एक बार जी भर लग जाऊँ , मैं गले से तेरे ।
मिट जाए रंज उठाये है दिल ने जो , तेरी इदासिनी में ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
इदासिनी = बेपरवाही
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें