प्रतीक्षा में रहूँगा मैं , प्रतिक्षार्थी बन कर ।
कभी तो होगा अगम तेरा , मेरे हृदय में ।
आशाओं की किरण , अमृत जली है ।
तज्यो न शरीर जब तक , आत्मा मेरी ।
प्रेम मूल्यों में देय नही , क्रय-विक्रय हो जो हाटों में ।
प्रेम दिव्य अनुभूति है , जन्में जो हृदय में ।
मैं निश्चल अडिग हूँ , अपने प्रयासों में ।
पाऊँगा अवश्य एक दिन , तेरी प्रेम की छाओं मैं ।
होगी तू भी आतुर , इक दिन मुझे से मिलने को ।
प्रेम-पथ पर तेरी प्रतीक्षा में , कुछ ऐसा कर जाऊंगा मैं ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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