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गोपी , संग ग्वाल बाल , हट छोड़ गियों री के नाही ?

  गोपी , संग ग्वाल बाल , हट  छोड़ गियों री के नाही ? 

कहे उ कुछु एहि , लाज न उकु आये ।

 

रहूँ मैं संग किसके अकेले  , जो मोरे कान्हा आयों  नाही ।

तरशु , देखूं संग जो मैं , मिथुन इन नैनन सो बिरह में , जी मोरा जल जाए ।

ढूंढू मैं बन श्याम चकोरी , कान्हा की मैं आश लगाए ।

बृंदावन रही साक्षी , कान्हा संग मैं हूँ रास रचाये ।

दिन सर चढ़ गयो रे सखियों आज 

कान्हा मोरे , क्यों न आये ?

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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