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आखरी नज़्म , पेश करूँ ये तुम्हें मैं ।

आखरी नज़्म , पेश करूँ ये तुम्हें मैं ।

अपने , ख्वाब ओ ख्यालों का ।

आखरी पेश करूँ , 

तुम्हें मैं नज़्म अपनी ।

ये हाल ए दिल अपना ,

दिल ए ज़ज़्बात का ।

रहूंगा दर्द में मैं, 

न अब आहे भरूँगा ।

न यादों में तेरी अब मैं , 

कोई नज़्म लिखूंगा  ।

दिख रही है तेरी , न यकीनी । 

रुख तेरा , मेरी नज़्मों पर ।

अब न मैं तुम्हें , कोई अपनी । 

दिल ए नज़्म , पेश करूँगा ।😭😭😭

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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