होती कैसी है , तन्हाइयों का आलम ।
यह हमसे पूछों तुम ।
दिन ओ रात का ख्याल न , शाम ओ सुबह की खबर ।
सदियाँ गुजार दी हमने ,बस किसी के इंतज़ार में ।
अजीब सा नशा है इन , तन्हाइयों का भी ऐ दोस्त !
यादों के प्याले पी कर , झूमता है दिल हर उस रहगुजर ।
जो राह जाती थी कभी , मोहब्बत के मुकाम पर ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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