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ज़रा संभल कर बचकर रहना इन तिलसमकारों से ।

ज़रा संभल कर , बच कर रहना ।

इन तिलस्म कारों से ।

कहीं का नही छोड़ते यह , अपनी नैनों के वारों से ।

घायल करके रख देते है , ये दिल इश्क का ।

जरा संभलकर रखना कदम , इन हुश्न के बाज़ारों में ।

न रही कभी भी यह , अपनी वफाओं में कायम ।

देख न जाना मर मिट , इनकी भोली सूरत पर ।

कंचन काया , मधुर मुस्कान लिए है ।

ज़ुल्फ़ों में , काली घटाओं के सायें

फितरत में है , इनकी जफ़ा भरी ।

कातिल , इनकी है अदाएं ।

ज़रा संभल कर , बच कर रहना , 

इनकी कातिल अदाओं से ।

✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी

 

 

 

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