आये अकेले ,जाएंगे अकेले ।
यहां सभी है अकेले ।
संग भी हो , तो भी अकेले ।
जिस्म का साथ है जो ,भ्रम जाल है ।
उस जाल में सभी , फसे हैं अकेले ।
स्पर्श तन का हो जो , किसी का ।
क्षण भंगुर है भक्ति , शक्ति ,
जीवन की क्रियाकलाप हो ।
या रण का मैदान हो ।
भाव में भगवन भले ,
विधि का विधान हो ।
काल भी , पल पल नए रूप में ।
अकेले ही , बनाता और बिगड़ता है ।
सूर्य चंद्र नभ के , तारे ,
ग्रह धृतरी आदि गगन के सारे ।
अकेले ही , विचरण में है प्यारे ।
सोचो तो यही सत्य है ।
न सोचो तो हम साथ है ,
इसी भ्रम में जी रहे सारे ।
अंत में ज्योति कहे भय्या ,
मानो या न मानो दुलारे ।
किन्तु जग में है सब न्यारे न्यारे ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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