खामोश राहों में खड़ा हूँ मैं, खामोशी से
इंतज़ार कर रहा हूँ मैं ।
उन आहटों की जो तोड़ दे , खामोशी मेरी ।
उन आहटों का , इंतज़ार कर रहा हूँ मैं ।
लव खुले न खुले फर्क नही , नज़र न झुके एक पल भी मेरी ।
न जाने कब , गुज़र जाए सामने से वो ।
खफा हैं जो , खामोश होकर ।
टूट जाये खामोशी उनकी , और मुझे आवाज दे ।
मुद्दतों से इंतज़ार है मुझे , उनकी पुकार का बेसब्र होकर ।
मोहब्बत !...भी क्या कमाल की है , जी नही लगता उनके बिगैर ।
लगी हो लग्न जब , किसी से दिल ।
तो दिल अपना कहाँ , और हम कहाँ दिल के बिगैर ।
✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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