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तुझमे तू न होता , और मुझमे मैं ।

तुझमे तू न होता  , और मुझमे मैं ।

फिर ये तू तू , मैं मैं कैसे होता ।

हम से है प्यार , जग हम से है ।

फिर नफरत का ये बीज , आया 

कहाँ से ?

फिर ये तेरा मेरा , हुआ कहाँ से ।

जब सब कुछ , पाया यहाँ से ।

न संग में , लाया है कोई ।

न संग ले कर , गया है कोई ।

सब कुछ भान है , फिर भी ।

 क्यों अभिमान , भरा है ।

 सावन के अंधे को ,

दिखता क्यों हरा है ।

फिर क्यों ये , कलह है जग में ।

किसने हरी मति है ,जीवों की ।

किसने मति में ये , विष भरा है ।

नियति है यह या , साजिश कोई ।

मैं भी अछूता नही , इस दोष से ।

फिर क्यों मष्तिष्क में मेरे , 

यह सवाल खड़ा है ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूडी



 

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