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मन भर आया किसने , मन भरमाया है ।

 मन भर आया किसने , मन भरमाया है ।

आज तूफान उठा कैसा ये ,बिन हवा के ज़ोर पर ।

बिन बारिश की , ये बरसात कैसी है ।

 यही सोचता हूँ , सुमति कैसे बदली कुमति में ।

 कौन बना है , वो काल धरा का ।

 जिसने ये , झमेला जोड़ा है ।

कुछ अच्छा तो , किया था उसने ।

उस अच्छे में , क्या बुरा है ।

बड़े शातिर है जानते है , सब वो अत्याचारी ।

 इस अच्छे में , कोई नही बुरा है ।

 पर ये है हारे जुआरी , बड़े सडयंत्रकारी ।

जल गई रस्सी , फिर भी बल पड़ा है ।

अभी थोड़ा , वक्त और लगेगा ।

आस्तीनों में जो , सांप धुसे है ।

चूस कर लहू वर्षो से , जन का ।

मुख में लाली जो , लिए फिरे है ।

रखो भरोसा उस रक्षक पर तुम ।

उनका फन वो , जरूर कुचलेगा ।

मसल कर रख देगा वो  , राख भी उनकी ।

वो क्या उनकी परछाई तक भी , वो भेद लेगा ।

अभी तो दिन , हुए ही कितने है ।

हाहाकार ,मचा हुआ है , 

देश के शत्रुदल के खेमों में ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी



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