गुज़र गए दौर अब वो , दिल लगाने के ।
अब दिन है ही कितने ? जिंदगी के ।
आज या कल हम , घड़िया हर पल ।
उंगली में , अब गिना करते है ।
और खो जाते हैं हम , गुजरे हुए जमाने में।
उन हसीं यादों में जो , आज से तब दिन ।
कई बेहतर, हुआ करते थे ।😥
अब न लौटेंगे दिन वो कभी , वक्त के तरकस से उम्र के बाण निकल गए ।
बचे हो शायद कुछ बे-दम, बाण उम्र के ।
जुड़ते जुड़ाते उन्ही से ही , कुछ दिन और जी लेंगे हम ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।
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