देखा है माँ ! मैंने तुझे ।
दुःख में भी , मुस्कुराते हुए ।
मुझ में भी वो , शक्ति दे दो माँ !
मैं भी तेरी तरह रहूँ सदा , हंसते मुस्कुराते हुए ।
और अंत में गुमसुम होकर , इस जहाँ से रुख़सत हो जाऊं ।
किसी को खबर भी न हो , और मैं तेरे पास आ जाऊँ ।
✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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