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मेरा कहा ही रहा बाकी , याद शायद उनको ।

मेरा कहा ही रहा बाकी , याद शायद उनको ।

अपनी कही वो क्या , हर कोई भूल जाते है ।

यही उम्मीद भी थी मुझे , उनसे के इश्क में ।
 
चंद रोज़ का ही , जुनून था उनका ।

वो ही क्या हर कोई , मतलब निकलते ही भूल जाते है ।

लो आज फिर धुंआ धुंआ सा , होने लगा है सहर ।

शायद रात भर फिर किसी के , अरमान जल उठे हो ।

शबनम पिघल कर , शायद टपक रहे हो उन शोलों पर ।

जो जल उठे हो शायद , किसी की बिरहा में ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी


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