यह वही , रहगुजर है ।
जहाँ यारों संग , हँसी खेल में ।
वक्त , गुजरता था कभी ।
आज अकेला ही हूँ यहाँ ,
आया मैं वर्षों बाद ।
कुछ बीते हुए वक़्त की ,
यादों के साथ ।
खो गया हूँ मैं कुछ घड़ी ,
कुछ पल , हाँ कुछ पल ,
सकून मिला जरूर ।
मगर लौटा फिर यादों से ,
मायूस होकर ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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