नशीब में तू न सही पर , नशीब हो तो सही ।
तुझे हासिल करना , मुश्किल फिर कहाँ ।
तिलिस्मी आंखों से तेरी जो , इक टक मेरी ओर पड़ जाए ।
मेरे चेहरे का नूर बन , आफताब बिजली चमक उठ जाए ।
तेरे दमकते बदन को , अपनी आगोश में लपेट कर ।
चंचल चपला सी बन , घनघोर घटाओं को चीर कर ।
मन की अलौकिक दिव्य ज्योति को पा जाऊं ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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