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समझौतों में ढली चुकी है , मेरी जिंदगी अब ।

 समझौतों में ढली चुकी है , मेरी जिंदगी अब ।


प्यार शायद गुजरे जमाने की , बात हो गयी है ।


याद है कुछ धुंधला धुंधला सा , वो फसाना मेरे इश्क का  ।

जिस पर जम चुकी है अब गर्त , बेबसी की ।


हाँ खुश हूँ अब भी , चलो इतना काफी है ।


अजनबियों की तरह ही सही ,  थोड़ा सी गुफ़्तगू काफी है ।

चलो चलते है , सांझ ढलने को है अब ।


तन्हाई का वक्त मेरा  , शुरू हुआ जाता है अब ।


आदत सी हो गयी है अब , खुद से खुद को बतियाते हुए ।


जिंदगी क्या है ? बहुत वक्त लगा यह सब खुद को समझाते हुए ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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