ज़रा संभल कर के , न एहसास होने देना अपनी खुशी बहारों को ।
बड़ी जालिम है ये बहारे भी , अश्क देकर खुद मुस्कुराई करती है ।
मेरे गम का बोझ न सह सकोगे तुम , ऐ जान ए बफा ।
अश्कों के समंदर दिल मे समेटे हुए हूँ ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
ज़रा संभल कर के , न एहसास होने देना अपनी खुशी बहारों को ।
बड़ी जालिम है ये बहारे भी , अश्क देकर खुद मुस्कुराई करती है ।
मेरे गम का बोझ न सह सकोगे तुम , ऐ जान ए बफा ।
अश्कों के समंदर दिल मे समेटे हुए हूँ ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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